Wednesday, 15 December 2021

Story of Life : ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग- 4)

अब तक आपने पढ़ा,

ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग- 1)..,

ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग- 2)... और

ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग- 3)...


अब आगे...

ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग- 4)


मुझे शहर की हवा रास नहीं आई...

दो क्षण तो राघव कुछ नहीं बोला, फिर उसने गीतिका को गले लगा लिया और कहा, मैं भी यही चाहता था कि गांव लौट जाऊं, पर मुझमें तुम सा साहस नहीं था। 

मैं चलने को तैयार हूँ, पर अब हम वहांँ जाकर क्या करेंगे?

खेती-किसानी तो अपने बस की है नहीं...

हम वही करेंगे जो हम यहांँ करते थे, बस तब हम अपने मालिक खुद होंगे। वहाँ सबको भी यह काम सिखाएंगे।

थोड़ा समय लगेगा पर हमारा भविष्य सुनहरा ही होगा।

और इन सबके लिए पैसे कहाँ से आएंगे?

जो हमारे हैं, हम लगाएंगे, बाकी कुछ पिता जी व भैया से लेंगे। मुझे पता है अच्छे काम के लिए कोई मना नहीं करेगा।

दोनों गांव लौट आए। शहर से बहुत सारा सामान ले गये। उन्होंने वहाँ factory लगाई।

गांव आकर उन्होंने अपनी scheme सभी को बताई। जो गांव में बहुत लोगों को पसंद आई।  

जिससे पिता जी और भैया के साथ ही कुछ गांव वालों ने भी पैसे लगा दिये।

राघव और गीतिका के साथ ही बाकी सब की भी मेहनत रंग लाई...

कुछ ही दिनों में पूरा गांव, उस factory से फलने-फूलने लगा। 

अब तो गांव के विकास के लिए अन्य योजनाओं के लिए राघव और गीतिका ने सरकार से सहयोग प्रदान करने की मांग रखी।

सरकार ने देखा कि गांव के लोग परिश्रमी और लगनशील हैं तो उन्होंने गांव को अन्य योजनाओं के लिए सहयोग प्रदान करना आरंभ कर दिया...

गांव के लोग अपने भाई भतीजों और बेटों को शहर से वापस आने को कहने लगे। वो कहा करते, शहर की धूल फांकने से अच्छा है, गांव लौट आओ।

राघव भैया ने factory लगाकर गांव में भी ज़िन्दगी आसान कर दी है। अब यहाँ भी बहुत जल्दी सब सुविधाएं आती जा रही हैं। साथ ही अपनों का साथ भी है।

कहीं, कोई भी यह नहीं कहता कि वाह रे! राघव उतर गया, शहर का भूत? 

हाँ सब किशन सिंह जी से यह ज़रुर कहते थे, आप के बेटे ने शहर से आकर गांव की काया पलट दी।

तब किशन सिंह जी बड़े गर्व से बोलते, अरे राघव शहर गया ही इसलिए था कि शहर से काम सीख आए और गांव को खुशहाल बना दे।

राघव और गीतिका पिताजी के चरणों में गिर कर आशीर्वाद लेते हैं और कहते कि जिनके सिर पर आप जैसे पिताजी का हाथ हो, वहाँ अवगुण भी गुण बन जाता है और जीवन सफल।

किशन सिंह जी बड़े प्यार से उन्हें गले लगाते और कहते, मेरे बच्चे मेरे पास हैं, इससे बढ़कर हमारे लिए कुछ नहीं...

और फिर राघव एकाएक कहता है,  ज़िन्दगी गांव और अपनों के साथ है, बड़े-बड़े शहरों में नहीं...

यह सुनकर सब हंसने लगते हैं..

Tuesday, 14 December 2021

Story of Life : ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग -3)

अब तक आपने पढ़ा, 

ज़िन्दगी बड़े शहरों की  (भाग -1)  और

ज़िन्दगी बड़े शहरों की  (भाग -2)...

अब आगे....

ज़िन्दगी बड़े शहरों की  (भाग -3)



सबको छोड़कर आना, फिर work load बढ़ना। इससे राघव और गीतिका दोनों चिड़चिड़े रहने लगे थे। वो जब भी आपस में बात करते झगड़ते ज्यादा थे।

ऐसे ही एक महीना बीत गया। Sunday की एक रात band बाजे की आवाज आ रही थी, उसे सुनकर गीतिका उत्साह से भर गई, अपनी खिड़की से झांक झांक कर देख रही थी कि दूल्हा कैसा है...

 फिर मायूस होकर बोली, हमारी जिंदगी कितनी नीरस हो गई है, ना कोई हमें जन्मदिन में बुलाता है, ना ही कोई विवाह बारात में शामिल करता है।

इन खुशी भरे माहौल की तो छोड़ो, ना ही कोई हमें अपने घर बुलाता है ना हम किसी को बुलाते हैं।

दिन भर काम करते रहो, फिर भी खर्चे पूरे नहीं पड़ते हैं। हमारे पास एक-दूसरे के लिए भी समय नहीं है। कहीं घूमने-फिरने के लिए हम साथ हैं ही नहीं! हम चाहकर भी बच्चे को अपनी जिंदगी में लाने की नहीं सोच सकते हैं...

हम जी क्यों रहे हैं, बस दौड़ते रहने के लिए?

क्या इसी बेरंग जिंदगी की चाह थी तुम्हें? 

क्या यही है बड़े शहर की जिंदगी? 

राघव मैं थक गई हूँ, यहाँ ना हमारे पास एक दूसरे के लिए समय है, ना कोई अड़ोसी-पड़ोसी हमारा अपना है। ना कोई सुख में है ना दुःख में। ना हंसी, ना ख़ुशी, ना कोई उमंग।

बस दौड़ते रहो, दौड़ते रहो...

और अंत क्या, खर्चे तब भी पूरे नहीं होंगे, हाथ आएगी केवल हताशा...

मुझे अपने गांव वापस जाना है, मुझे फिर से सुकून चाहिए। मुझे अपना बच्चा चाहिए। मुझे उसका बचपन जीना है। बस यह दे दो मुझे, फिर कभी कुछ नहीं मांगूंगी।

राघव बोला, तुम्हें यह क्यों नहीं दिखता, शहर कितना advance है, हर सुख-सुविधा है यहाँ। क्या रखा है गांव में?  

फिर गांव किस मुंह से जाऊंगा? लोग सिर्फ मज़ाक ही उड़ाएंगे कि बड़ा सीना फुलाकर गया था।

गीतिका ने गर्व से ओत-प्रोत होकर कहा, गांव में जिंदगी है! 

तुम्हें advance और सुख-सुविधा दिखती है, मन का सुकून नहीं...

पिता जी ने यहांँ आने के पहले ही बोल दिया था, जब आना हो आ जाना। कोई कुछ नहीं बोलेगा और अगर कोई कुछ बोलेगा तो कह देना कि मेरी सबके बिना तबियत बिगड़ गई थी।

मुझे शहर की हवा रास नहीं आई...

दो क्षण तो राघव कुछ नहीं बोला...

आगे पढ़े, आखिर अंक, ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग -4) में

Monday, 13 December 2021

Story of Life : ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग - 2)

 अब तक आपने पढ़ा जिंदगी बड़े शहरों की (भाग- 1) में...

अब आगे...

 ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग -2)



पर चौथा क्यों? राघव ने पूछा...

वो हिस्सा उसके लिए, जिसको ज़िन्दगी के किसी पड़ाव में अचानक से आवश्यकता हो।

पर जो भी उसे लेगा, जरुरत पूरी होने के बाद, उसे उस भाग को दुगना करना होगा। क्योंकि वो भाग मैंने आने वाली पीढ़ी के लिए रखा है, हमारे किसी भी ग़लत फैसले का असर उनके भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए।

पिता जी, जिसके इतने समझदार दादा जी हों उनका भविष्य हमेशा सुदृढ़ ही रहेगा। और ऐसे पिता जी को छोड़ कर जाने से बढ़कर, मूर्खता तो कुछ है ही नहीं। राजन ने गर्व से ओत-प्रोत होकर कहा।

मेरे जब भी बच्चे होंगे, उनके पहले गुरु आप ही होंगे। क्योंकि जिसके गुरु आप होंगे, उसे जिन्दगी में सच्ची जीत मिलेगी।

और हाँ आप जो बंटवारा कर रहे हैं, उसमें मेरे हिस्से में मुझे आप और माँ चाहिए।

बाकी आप जानिए...

राघव, राजन की बातें सुनकर शर्मिंदा हो गया। पर उसके बड़े शहर जाने की हूक नही मिटी। किशन सिंह जी ने राघव को उसका हिस्सा देकर शहर भेज दिया।

राघव अपनी पत्नी गीतिका के साथ शहर में आ गया। वहाँ आकर उन लोगों ने एक घर लिया, कुछ घर की व्यवस्था के सामान और खाने-पीने के बनाने और खाने का सामान लिया। कहीं आने-जाने के लिए एक bike ली। इस सबमें उन लोगों के बहुत सारे पैसे खत्म हो गये। अब चंद रुपए ही बचे थे।

वहाँ उनके जान-पहचान का कोई नहीं था। ना ही किसी को उनसे कोई मतलब था।

दोनों ही बहुत होनहार थे तो दोनों ही अपने-अपने field में job करने लगे। 

चंद दिनों में ही दोनों इतने busy हो गये कि उन का आपस में मिलना मुश्किल होने लगा। क्योंकि गीतिका की morning shift थी और राघव की night.

बस एक Sunday था, जब दोनों साथ होते थे। उस दिन सोने और घर का सामान लाने में चला जाता था।

एक दिन, किशन सिंह जी ने, राघव को समाचार भेजा कि राजन के जुड़वां बच्चे हुए हैं। कुछ दिनों के लिए आ जाओ।

यह समाचार सुनकर दोनों खुशी से झूम उठे। दोनों ने अपने अपने office में छुट्टी के लिए बात की , पर राघव और गीतिका दोनों को ही मुश्किल से सिर्फ चार दिन की ही छुट्टी मिली। जब वो घर पहुंचे, घर मेहमानों से भरा था।

सबके साथ दोनों को बहुत अच्छा लगा, दोनों बच्चे चीकू-पीकू खूब सुन्दर और स्वस्थ थे। 

गीतिका को देखकर सब बोल रहे थे कि, क्या हुआ है बिटिया, इतनी थकी हुई क्यों लग रही हो?

दिन भर काम करने, व अकेलेपन के कारण उसके चेहरे पर वो पहले सी रोनक नहीं रह गई थी।

गीतिका ने एक फीकी सी मुस्कुराहट दे दी।

मौसी सास तो पूछ भी बैठीं, अरे, तुम कब खुशखबरी दे रही हो?

यह सुन गीतिका, राघव को देखने लगी, राघव शांत रहा।

चार दिन बाद दोनों मेहमानों से भरे घर को छोड़कर जाने लगे तो सब बोले, लो जी क्या ज़माना आ गया है, घर वाले ही सबसे पहले चल दिए?

माफ़ कीजियेगा बुआ, इससे ज्यादा छुट्टी नहीं है। राघव दुःखी होते हुए बोला...

चाची ने मखौल उड़ाते हुए कहा, वाह! गांव के मालिक, शहर के नौकर हो गये। ऐसे मूर्ख हमने तो कहीं नहीं देखे।

राघव कुछ नहीं बोला, बस खून का घूंट पी कर रह गया, क्योंकि चाची सच ही कहा रही थी।

दोनों शहर लौट आए। गांव जाने के कारण, उनका work load बढ़ चुका था। 

आगे जानने के लिए पढ़ें...

ज़िन्दगी बड़े शहरों की (भाग -3)