Friday, 22 April 2022

Story of Life : सच्चा सोना (भाग -3)

 सच्चा सोना (भाग - 1) और

च्चा सोना (भाग -2) के आगे...

सच्चा सोना (भाग -3) अंतिम भाग



रितेश सब लेकर अपनी माँ‌ के पास पहुंँचा। माँ की आंखें इतना सोना देखकर फटी की फटी रह गई, वो बोली बेटा, हमारे दुःख के दिन बीत गए हैं। तुझे देवता पुरुष मिला था जा उसी के पास जा, वह तुझे अच्छा काम देगा।

 अगले दिन रितेश रतन सिंह के पास पहुंचा।

आओ आओ, रितेश मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।

रितेश ने रतन सिंह को धन्यवाद दिया और बोला, मेरी मां ने कहा है कि मैं आपसे काम मांगू पर मैं आपके यहाँ, काम करने से पहले आपकी आपबीती सुनना चाहता हूँ।

 क्या आप मेरी यह विनती स्वीकार करेंगे?

रतन सिंह हंस कर बोला, बिल्कुल, तुम्हें पूरा अधिकार है, तुमने मेरे जीवन को बचाया था।

बात तब की है, जब मैं भी तुम्हारी तरह गरीब, सीधा-साधा, कर्मठ व्यक्ति था।

एक दिन मैं काम की तलाश में निकला था, तो मुझे एक बड़े से घर से एक व्यक्ति निकलता हुआ दिखाई दिया।

वो व्यक्ति, घर से निकलकर थोड़ी दूर गया और एक जगह रुक गया और वहीं जमीन पर बैठ गया।

मैं उसके नजदीक गया तो देखा कि वो तो हमारे गांव के महेंद्र सिंह सुनार हैं। 

वो बहुत थके और बीमार लग रहे थे।

मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूँ?

तो उन्होंने कहा कि, मुझे एक सच्चे और ईमानदार इंसान की तलाश है, जो उनके सोने के व्यापार को अच्छे से चला सके। जिससे वो आगे का जीवन सुख से बिता सकें।

मैं, काम की तलाश में था, मैंने कहा, आप मुझे आज़मा सकते हैं।

सेठ जी खुश हो गये, उन्होंने मुझे अपने यहाँ रख लिया। मैंने भी पूरी मेहनत और ईमानदारी से उनका काम सम्भाल दिया। साथ ही उनकी खूब सेवा की, जिससे वो पूर्णतः स्वस्थ भी हो गये।

मैं खूब जतन से सोने का व्यापार चलाता और सेठ जी चैन से सोते। सेठ जी और मैं दोनों खुश रहने लगे। 

कुछ साल बाद सुख पूर्वक दिन व्यतीत कर के सेठ जी स्वर्ग सिधार गए और फिर मुझे व्यापार का मालिक बना दिया गया।

मैंने दिन-रात मेहनत कर के सोने के व्यापार को चार गुना बढ़ा दिया। पर इस कारण से मेरा सुख-चैन, नींद सब कहाँ चला गया, मुझे पता ही नहीं चला।

बस मुझे इसी बात की धुन रहती कि थोड़ा और सोना इकठ्ठा हो जाए।

इससे मेरी तबियत ख़राब रहने लगी। 

उस दिन भी मैं एक जगह से सोना लेने के लिए ही निकला था, वो जगह पास ही थी, अतः मैं पैदल ही निकल गया था। पर मेरी तबियत ख़राब होने के कारण मैं, भटक गया था और किस रास्ते आ गया था, मुझे नहीं पता।

और तब तुम मुझे मिले, तुमने खाने के लिए, मुझे रुखी-सूखी रोटी, आलू-प्याज नमक मिर्च, और पीने के लिए कुंए का ठंडा पानी दिया। उसके बाद मैं शाम तक सोता रहा।

उस दिन मैंने समझा, कि सच्चा सोना, बहुत सारा gold नहीं है, बल्कि भूख मिटाने वाला भोजन, और चैन से सोना (नींद) ही है।

जो मैंने महेंद्र सिंह जी को दी थी, जिसके बदले वो मुझे अपना सोने का व्यापार दे गये।

यह है, मेरी आप बीती। रितेश क्या तुम मेरे साथ काम कर के, मुझे सच्चा सोना ( चैन की नींद) दे सकते हो?

रितेश बोला, दे तो सकता हूँ, पर अगर आप यह ना सोचो कि मैं भी आपकी तरह सोना बढ़ाने में अपना सच्चा सोना (भरपूर नींद) खो दूंगा।

मुझे अपनी नींद से बढ़कर कुछ नहीं चाहिए। वो भी तब तो मैं बिल्कुल नहीं छोड़ूंगा, जबकि मैं जान चुका हूँ कि सच्चा सोना (चैन की नींद) ही है।

रतन सिंह, जोर से हंसा और बोला, भाई जो गलती मैंने की थी, मैं नहीं चाहता हूँ कि कोई भी और व्यक्ति करें। हमें जीवन उपयोगी धन अवश्य अर्जित करना चाहिए। पर अपनी कभी नहीं खत्म होने वाली इच्छाओं को इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि उसको पूरा करने में जीवन के सच्चे सोने (चैन की नींद) को ही खो दें।

मुझे बस एक सहायक चाहिए, जिसके साथ मिलकर मैं अपना अब तक का जितना व्यापार है, उसे सुचारू रूप से चला सकूं। साथ ही किसी एक को सक्षम भी बना सकूं। 

और उसके लिए, मुझे तुम उपयुक्त इंसान लगे। अगर तुम चाहो? रितेश ने खुशी-खुशी हामी भर दी।

उसके बाद रतन सिंह और रितेश दोनों को हमेशा के लिए सच्चा सोना (चैन की नींद) मिल गया था।

Thursday, 21 April 2022

Story of Life : सच्चा सोना (भाग -2)

सच्चा सोना (भाग - 1) के आगे...

सच्चा सोना (भाग -2)


रतन खाना, खाकर संतुष्ट हो गया, आज उसे रुखी-सूखी रोटी भी बहुत स्वादिष्ट लग रहीo थी।

उसने रितेश से कहा, मैं कुछ देर सोना चाहता हूँ, क्या मैं जब तक यहांँ सो रहा हूँ। तुम यहाँ खड़े रहोगे?

रितेश, हकलाता हुआ सा बोला, जी.. जी...

रतन बोला, तुम परेशान ना हो, मुझे पता है तुम काम के लिए निकले हो, मैं तुम्हें आज का पूरा मेहनताना दूंगा।

रितेश, ने सोचा, जब मेहनताना मिलना ही है, तो कहीं और क्या जाना। कितने देर सोएगा? 1 से 2 घंटा...

भला आदमी घड़ी दो घड़ी आराम कर लेगा, तो चंगा हो जाएगा। उसमें मेरा क्या बिगाड़ जाएगा। वो राजी हो गया। 

रतन, पेड़ के नीचे ही, गहरी नींद में सो गया...

सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम हो गई और रतन सिंह सोता ही रहा, रितेश का सब्र जवाब देने लगा।

अरे... यह तो उठ ही नहीं रहा। शाम हो चुकी है, भूख भी लग रही है और मांँ भी इंतजार कर रही होंगी, इसे उठा देता हूँ। यह सोचते हुए, रितेश ने रतन सिंह को उठाने के लिए, उसे जोर से आवाज दी।

अरे, रतन सिंह जी, उठिए, सुबह से शाम हो चुकी है और आप सोकर नहीं उठे...

रतन सिंह, आंख मलते हुए बोला, शायद थोड़ा ज्यादा ही सो गया?

ज्यादा?.. सुबह से शाम हो गई है, मैंने आधा पेट खाना खाया था, तो मुझे भूख भी लग रही है और मेरी माँ इंतजार भी कर रही होंगी... रितेश सब-कुछ एक सांस में बोल गया।

माफ़ करना भाई, कहते हुए उसने, अपनी दो सोने की अंगूठियाँ, एक सोने का और एक हीरे का हार, रितेश को दे दिया। 

यह किस लिए, सेठ जी... रितेश के मुंह से अनायास ही निकल गया।

मैंने कहा था ना कि मेहनताना दूंगा...

इतना क्यों, ऐसा भी मैंने क्या किया है?

तुमने मेरी जान बचाई, मुझे खाना दिया और एक अनमोल सी मीठी नींद... उसी सब के लिए।

नहीं सेठ जी, मुझ गरीब का मज़ाक ना उड़ाएं, मुझे दिन भर का मेहनताना 150 रुपए दे दीजिए।

खाने-पीने, सोने का कोई मोल होता है क्या? और जान तो ऊपर वाला बचाता है, हम और आप उसके आगे क्या हैं।

हाँ, पूरे समय आप की चौकीदारी में गुजर गया, तो काम पर नहीं जा पाया। तो घर जाकर माँ के हाथ में क्या दूंगा।

इसलिए दिनभर की मजदूरी मांग रहा हूँ, बस वही दे दीजिए।

अरे भाई, वही दे रहा हूँ। मैं एक दिन में इतना ही कमा लेता हूँ। जो अनमोल है, उसके लिए तो मैं तुम्हारी ज़िंदगी भर ऋणी रहूंगा। 

जब तुम्हें काम की जरूरत हो आ जाना। हमेशा तुम्हारी राह देखूंगा। यह कहते हुए रतन सिंह रितेश को सब पकड़ाते हुए आगे बढ़ गया।

अरे, सेठ जी अपनी आपबीती तो सुनाते जाओ...

जब मिलोगे, तब सुनाऊंगा.... कहते हुए रतन सिंह आगे बढ़ता गया...

क्या थी रतन सिंह की आपबीती? क्या रितेश, रतन सिंह के पास जाएगा?

जानिए के लिए पढ़ें, सच्चा सोना (भाग -3) में....

Wednesday, 20 April 2022

Stories of Life : सच्चा सोना

 सच्चा सोना

रितेश, बहुत ही सीधा, सच्चा, कर्मठ व्यक्ति था। 

हमेशा की तरह वो काम की तलाश में घर से निकला था। उसकी माँ रीता ने उसके खाने के लिए, 8 रोटी, 2 उबले आलू, नमक, मिर्च और प्याज रख दिए थे।

अभी रितेश, गांव से बाहर की ओर निकला ही था, कि उसने देखा एक आदमी उसकी तरफ लहराता हुआ सा चला आ रहा था।

रितेश ने उसे संभालने की कोशिश की, पर तब तक वो उसकी बाहों में बेसुध होकर झूल गया।

रितेश उसे पेड़ की छांव में लिटा कर, अपना खाने का सामान उसके पास रखकर, लोटा लेकर पानी की तलाश में निकल गया।

पास ही कुंआ दिखाई दे गया। रितेश ने लोटे में ठंडा पानी भरा और उस अजनबी के पास आ गया।

उसने अजनबी के मुंह में पानी के छोटे-छोटे छींटें मारे। थोड़ी देर में वो अजनबी अपनी मुर्छित अवस्था से जाग उठा। 

क्या हुआ भाई? कौन हो तुम? रितेश ने अजनबी से जानना चाहा...

वो बोला मैं, सुनार रतन सिंह हूँ।

सुनार! और ऐसी अवस्था में?

हाँ? रतन ने धीरे से कहा..

मगर कैसे? रितेश अचरज में पड़ कर बोला...

वो मैं बाद में बताऊंगा, पहले यह बताओ, तुम्हें, मेरे पास इतना सारा सोना देखकर लालच नहीं आया?रतन ने प्रश्न भरी नजरों से देखा...

सोना! यह बोलकर, रितेश ने, रतन को देखा...

रतन की दस ऊंगली में से 6 ऊंगली में सोने की अंगूठियाँ थी। कान में सोने के कुंडल और गले में एक हीरे का हार, 2 सोने के हार और एक मोती का हार भी था। वेशभूषा भी बहुत कीमती थी।

रितेश बोला, जब तुम, मेरी बाहों में आकर मुर्छित हो गये थे। तो मेरा ध्यान, तुम से ज्यादा तुम्हारी अवस्था पर था। मैं तुम्हें पुनः ठीक करने का प्रयास कर रहा था।

वैसे, मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस श्रेणी के हो, कोई गरीब भी होता, तो भी मैं सहायता अवश्य करता।

अगर तुम्हें भूख लगी हो तो मेरे पास आठ रोटी, आलू-प्याज, नमक, मिर्च हैं। हम दोनो लोग मिल बांट कर खा सकते हैं। 

पर अगर तुम रूखी सूखी रोटी खा सको तो।

रतन सिंह भूख से तड़प रहा था, उसने खाना देने के लिए, हामी भर दी।

रतन सिंह, एक सफल सुनार था, फिर उसकी यह हालत क्यों हुई, जानने के लिए पढ़ें... सच्चा सोना (भाग - 2) में...