Friday, 21 August 2020

अनहद नाद (भाग -5)

 अब तक आप ने पढ़ा, अनहद नाद (भाग-1), अनहद नाद (भाग -2), अनहद नाद (भाग-3)अनहद नाद (भाग -4).....

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 अनहद नाद (भाग - 5)


आंटी का हाथ थामे बाहर निकलेI मेरे क़रीब आयेI

मैं शून्य थीI मेरी आँखें नम थींI अंकल ने मेरे सिर पर हाथ रखाI उनका हाथ रखते ही मेरा दिल भर आयाI मैं कुछ कह पाती उससे पहले ही वो बोल पड़े-

“ये हमारी ज़िन्दगी का तीसरा दौर शुरू I”

और फिर वो अपने घर से दूर बाहर गेट की तरफ़ चल दिएI सबसे वैसे ही मिले जैसे रोज़ हँसते-मुस्कुराते हुए मिलते थेI किसी को भनक भी नहीं लगी कि पिछली रात उनके साथ क्या हुआ और अगली बार वो कब मिलेंगेI अब उनके चेहरे पर वो तनाव नहीं था, वो हताशा नहीं थेI वो आंटी जी का हाथ थामे अपनी ज़िन्दगी के तीसरे पड़ाव की ओर चल दिएI  मैं उन्हें जाते हुए तब तक देखती रही जब तक वो मेरी आँखों से ओझल नहीं हो गएI

मैंने वापस अपने घर की ओर रुख किया तो महसूस किया कि मैं चल नहीं पा रहीI मेरे पैर डगमगा रहे थेI किसी तरह मैं लडख़ड़ाते हुए अपने घर के दरवाज़े तक पहुँची और दरवाज़ा खटखटायाI

 मेरी छोटी बहन ने दरवाज़ा खोलाI मैं अंदर गईI देखा माँ खाना बना रहीं हैं,  पिताजी अख़बार पढ़ रहे हैं, बड़ा भाई चाय पी रहा है और छोटी बहन चहल पहल कर रही हैI

 मैं चारों तरफ़ अपने रिश्तों को सवालिया नज़र से देख रही थी और अपने विश्वास को ढूँढ रही थीI

 मैं किसी से कुछ कहे बिना अपने कमरे में आ गईI बेचैन मन से बिस्तर पर लेट गईI मुझे अब नींद नहीं आ रही हैI  बस अंकल की कही बातों ने मेरे दिलो दिमाग़ पर एक छाप छोड़ दीI

उनके विश्वास और दिल के टूटने की आवाज़ मैं अभी भी महसूस कर रही हूँI

 क्या सच में अपने लिए जीयूं, अपनों के लिए नहीं…………..?

Disclaimer:

इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।


Thursday, 20 August 2020

अनहद नाद( भाग - 4)

 अब तक आप ने पढ़ा, अनहद नाद (भाग-1), अनहद नाद (भाग -2) अनहद नाद (भाग- 3).....

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अनहद नाद (भाग -4)


उन्होंने जवाब दिया- “इसका अर्थ है कि अब मैं कहीं भी रह सकता हूँI कहीं भी सो सकता हूँI सारा जहान मेरा है, 

सिवाय वीरेंद्र की ज़िन्दगी केI”

फिर कुछ देर के लिए ख़ामोशी छा गईI 

मैं उठी और अपने बैग से पानी की बोतल निकालकर अंकल की तरफ़ बढाईI

 उन्होंने पानी का एक घूंट पिया और बोतल को अपने सिराहने रख लिया I जैसे ही मैं उनके सामने बैठी फिर मेरा सवाल-

“अंकल घर तो आपका है न?”

मेरा सवाल अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि उन्होंने बीच में रोकते हुए....

 कुछ पन्नें मेरे सामने रख दिएI मैं एक-एक पन्ना पढ़ती गयी और पलटती गयीI मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल चुके थेI

वो पन्नें चीख-चीख कर कह रहे थे कि ‘अपने लिए जियो पर अपनों के लिए मत जियोI’

धोखे से वीरेंद्र अंकल ने कौशिक अंकल का सब कुछ अपने नाम कर लिया थाI कौशिक अंकल और आंटी से उनकी छत तक भी छीन ली थी, उन्हें इस संसार में अकेला कर दियाI

मेरे मन में यही आ रहा था कि कोई अपना भी इस हद तक नीचता पर उतर सकता है!

मैं अंकल से कुछ कह पाती इतने में चिड़ियों की चहचहाहट ने हमारा ध्यान भंग किया तो मैंने महसूस किया कि भोर हो चली हैI आसपास फिर से ज़िन्दगी की चहल पहल शुरू हो गयीI

अंकल उठे, अंदर गए........

आगे पढ़े अंतिम भाग, अनहद नाद ( भाग -5)


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Wednesday, 19 August 2020

अनहद नाद (भाग -3)

अब तक आप ने पढ़ा, अनहद नाद (भाग-1) और अनहद नाद (भाग -2)......

अब आगे........

अनहद नाद- भाग 3


उनकी बातों और तनाव की गहराइयों को अंदर तक महसूस कर पा रही थीI  वे आगे बोले- “जब मैं ग्यारह वर्ष का था तभी से मैंने अपने घर को सम्भाल लिया था I”

अंकल के चेहरे पर एक संतुष्टि झलक रही थीI  पता चल रहा था कि उन्होंने अपने कर्त्तव्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया हैI अंकल का बोलना जारी था –

“गाँव मे मैं पहला लड़का था जिसकी नौकरी दिल्ली में लगी थीI नौकरी  की बात सुनते ही वीरेंद्र ख़ुशी से बोला- ‘अरे वाह भैया अब तो आप दिल्ली में रहोगेI 

मैं भी आपके साथ चलूँगाI आप जानते हो न मैं आपके बिना नहीं रह सकताI’

मैंने हामी भर दीI मेरे हामी भरते ही उसने पूरे गाँव में शोर मचा दियाI

‘हु हु हु  रे रे रे हुर्र….. मैं भी भैया के साथ शहर जा रहा हूँI’ तब से लेकर आज तक वीरेंद्र मेरे साथ ही हैI  

मैंने हमेशा उसका साथ दियाI हर चीज़ में हमेशा पहले उसको रखाI उसकी हर इच्छा का सम्मान किया। उसकी शादी भी मैंने अपने हाथों से ही कीI 

धीरे-धीरे उसके रवैये में बदलाव तो आ रहा था पर मैंने सोचा कि शायद समय की यही माँग हैI वक़्त के हिसाब से हमें भी बदलना चाहिएI”

मैंने उनको बीच में ही रोकते हुए कहा- “पर अंकल वीरेंद्र अंकल ने आज ऐसा क्या किया जो आपको इतनी निराशा हो रही हैI”

अंकल ने हँसते हुए कहा- “आज उसने मुझे अपने आप से आज़ाद कर दिया I”

“क्या?” मैं भौचक्की सी रह गई I

“आज़ाद कर दिया इसका क्या अर्थ है?” मैंने तपाक से पूछा......

आगे पढ़े, अनहद नाद (भाग - 4)....


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