Monday, 15 April 2024

Article : पोहेला बोइशाख

पोहेला बोइशाख



आज का article, हमारी‌ एक मीठी सी याद है और उस याद को हमारा कोटि-कोटि नमन भी....

बात उन दिनों की है, जब हम शादी कर के अपने जीवन साथी के साथ उस जगह पहुंचे थे, जो हमारे दाम्पत्य जीवन का प्रथम साक्षी था। जो साक्षी था, एक परिवार के हिस्सा होने से एक परिवार के बनाने की शुरुआत का...

एक शहर छोड़कर आए थे, एक township में...  पश्चिम बंगाल का एक शहर दुर्गापुर...

जो पूरी तरह से अलग था। ना केवल facilities wise बल्कि वहां की संस्कृति, वहां के लोग, उनका खान-पान, आबोहवा और बोली, सब ही कुछ तो अलग था...

आज जब दिल्ली, अपनों के बीच, अपनी सी संस्कृति, बोली और आबोहवा में लौट आए हैं तो ईश्वर से प्रार्थना है कि वो सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।

पर क्योंकि वहां जीवन के नये पड़ाव की शुरुआत में रहे थे, तो वो जीवन की मीठी यादों में शामिल है।

और आज पोहेला बोइशाख है तो सोचा, आपको ले चलें, वहां की खूबसूरत संस्कृति में, पोहेला बोइशाख (बांग्ला: পহেলা বৈশাখ) यानी, बंगाली पंचांग का प्रथम दिन, जो बांग्लादेश का आधिकारिक पंचांग भी है। यह उत्सव 14 अप्रैल को बांग्लादेश में और 15 अप्रैल को भारतीय राज्यों पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, झारखण्ड और असम (बराक घाटी) में बंगालियों द्वारा धार्मिक आस्था के निरपेक्ष मनाया जाता है। 

पोहेला बोइशाख के उत्सव की जड़ें मुगल शासन के दौरान पुराने ढाका के मुस्लिम समुदाय की परंपराओं से जुड़ी हैं, साथ ही अकबर के कर संग्रह सुधारों की घोषणा से भी जुड़ी है।

यह त्यौहार जुलूसों, मेलों और पारिवारिक समय के साथ मनाया जाता है। नए साल में बंगालियों के लिए पारंपरिक अभिवादन শুভ নববর্ষ (बंगाली) "शुभो नोबोबोरशो" है जिसका शाब्दिक अर्थ है "नया साल मुबारक"। 

बांग्लादेश में उत्सव मंगल शोभा यात्रा का आयोजन किया जाता है। 2016 में, UNESCO ने ढाका विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय द्वारा आयोजित इस उत्सव को मानवता की सांस्कृतिक विरासत घोषित किया। 

बाकी states में जहां जिंदगी भाग रही है, किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है, सब अपने-अपने स्वार्थ के निहित हैं, वहां पश्चिम बंगाल में आज भी जिंदगी जीवन्त है। 

वहां अन्य प्रदेशों की तरह कोई भी त्यौहार आने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया भर के नियम-कानून और घर में बहुत सारा काम और दुनिया भर के पकवान...

वहां त्यौहार का मतलब है उत्साह, उमंग और साथ... वहां कोई भी त्यौहार लोग घरों में रहकर सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि वहां पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला, पूरी community, पूरा शहर शामिल होता है।

किसी एक परिवार में नहीं, बल्कि पंडाल में पूजा-पाठ, उत्सव, खाने-पीने और मस्ती-मज़ा का प्रबंध किया जाता है।

आज भी यहां त्यौहार में रौनक है, फिर चाहे शारदीय नवरात्र हो, रथ पूजा या पोहेला बैशाख ...

क्योंकि आज पोहेला बैशाख है, तो क्या बताएं उस दिन के लिए, लोगों में उत्साह देखते ही बनता है।

जगह-जगह मेला होता है, बड़े-बड़े sound boxes लगे होते हैं। उस दिन लोग, अपने कामकाज में व्यस्त नहीं होते हैं। बल्कि अपने पूरे परिवार के साथ, quality time spend करते हैं। 

नया वर्ष आने के 15 दिन पहले से market में festival की चहल-पहल और रौनक दिखाई देने लगती है। 

बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी नव वर्ष का स्वागत, नये वस्त्र, नयी उमंग और उत्साह से करते हैं। 

वहां ऐसा लगता था कि आज भी जिंदगी, जिंदगी है। लोगों को इंतज़ार रहता है, त्यौहार के आने का, वहां कोई कठिन नियम नहीं है, बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी है। बस नियम है तो यह, कि festival वाले दिन festival celebration करना है, काम कहकर व्यर्थ की व्यस्तता नहीं दिखानी है, सब कुछ मिलकर करना है, जिससे festivity भी बढ़े और आपसी प्यार और एकता भी...

और वहां पहुंच कर पंडित जी जो भी नियम कानून बताएं, उसका पूरी आस्था और विश्वास के साथ पालन करना है।

हम सबको सीखना चाहिए उन से, कि कैसे अपनी संस्कृति, अपने त्यौहार को महत्व देना चाहिए और कैसे उसको पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाना चाहिए...

शुभ नववर्ष 💐

Sunday, 14 April 2024

Poem : अम्बेडकर अपना अपना

अम्बेडकर अपना अपना 


जाति कोई छोटी नहीं,

ना ही है कोई बड़ी।

ना अमीरी-गरीबी,

रास्ता रोक सकती कोई।

जिसके हों इरादे फ़ौलाद,

वो मंजिल अपनी,

पा ही लेता है।

लाख रोड़े हो राह में,

वो अपना मुकाम,

बना ही लेता है।

और गर फिक्र हो,

अपने से ज्यादा अपनों की।

वो सफलता का परचम,

लहरा ही लेता है।

हैं इस बात की मिसाल,

भीमराव अम्बेडकर

जिन्होंने बस एक ही,

शस्त्र शामिल किया था।

आरक्षण का, संविधान में,

आज तक भुगत रहा है,

सामान्य वर्ग का युवा,

बस इस इंतज़ार में।

शायद कोई एक,

अम्बेडकर,

आएगा पुनः।

जो खत्म कर देगा,

आरक्षण,

तब ही तो देश,

मुक्त होगा,

जात-पात से।

उस दिन होगा सशक्त,

सम्पूर्ण देश,  विकास से।

Friday, 12 April 2024

India's Heritage : माँ कूष्मांडा

आज विरासत के segment में एक ऐसी कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं, जो कि भारत की केवल विरासत के अंतर्गत नहीं आती है, बल्कि वो हमारे भारत की शक्ति हैं, प्रेरणा हैं, आस्था हैं, आत्मा हैं, प्रार्थना हैं, पूजा हैं।

विरासत अंक में इसे शामिल करने का कारण यह है कि आने वाली पीढ़ियों को सभी माता रानी के नाम और उनकी विशेषता पता चले...

आज नवरात्र का चौथा दिन है और हमारी कहानी की मुख्य नायिका भी हमारी कूष्मांडा मातारानी ही हैं।

आप कहेंगे, सीधे चौथी माता रानी के विषय में लिख रहे हैं, उससे पहले की क्यों नहीं? और क्या अब हर माता रानी के विषय में लिखेंगे?

बिल्कुल लिखेंगे... 

पर शुरुआत कूष्मांडा माता से ही क्यों, यह पहले बताते हैं आपको, क्योंकि प्रारंभ हम वहां से भी कर सकते हैं, जहां से सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी।

सृष्टि की उत्पत्ति या सृजन से कूष्मांडा माता रानी का क्या संबंध है? और क्यों माता रानी के इस स्वरूप को कूष्मांडा माता कहते हैं...

क्या संबंध है, यही आज की कहानी का सार है...

Maa Kushmanda

आज यानि 12 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन है और इस दिन मां कूष्मांडा का पूजन किया जाता है। 

सनातन शास्त्रों में निहित है और सदियों से सबको यही विदित है कि त्रिदेव ने सृष्टि की रचना करने की। 

पर क्या यही सत्य है? क्या सृष्टि के निर्माण में किसी देवी का कोई हाथ नहीं? 

जबकि स्त्री को तो सृजनकर्ता, सृष्टि कर्ता भी कहा गया है हैं। 

आइए जान लेते हैं…

बात उस समय की है, जब समस्त ब्रह्मांड में अंधेरा छाया हुआ था, पूरा ब्रह्मांड स्तब्ध था। इसमें न कोई राग, न कोई ध्वनि थी। हर ओर केवल सन्नाटा छाया हुआ था। 

उस समय त्रिदेव ने, सृष्टि निर्माण की कल्पना की। परन्तु सृजन की कल्पना जननी के बिना... यह असंभव था।

अतः जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा से सृष्टि के सृजन के लिए सहायता मांगी।

जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा ने तत्क्षण ब्रह्मांड की रचना में सहायता प्रदान की। 

कहते हैं कि ब्रह्मांड की रचना मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से की। 

मां के मुख मंडल पर फैली मंद मुस्कान से समस्त ब्रह्मांड प्रकाशवान हो उठा। 

ब्रह्मांड की रचना अपनी मुस्कान से करने के कारण या दूसरे शब्दों में कहें कि अंड अर्थात् ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने के कारण ही जगत जननी आदिशक्ति को मां कूष्मांडा कहा गया है। 

मां का चौथा रूप 'कूष्मांडा' नाम का शाब्दिक अर्थ है ‘कू’ का अर्थ छोटा, ‘ऊष्म’ का अर्थ ऊर्जा (heat energy)है, अंडा आकृति है। अर्थात् कूष्मांडा का शाब्दिक अर्थ हुआ- ‘छोटा और अंडाकार ऊर्जा पिंड’।

मां की महिमा निराली है। मां का निवास स्थान सूर्य लोक है। शास्त्रों में कहा जाता है कि मां कुष्मांडा सूर्य लोक में निवास करती हैं। ब्रह्मांड की रचना करने वाली मां कूष्मांडा के मुखमंडल पर उपस्थित तेज से सूर्य प्रकाशवान है। मां सूर्य लोक के अंदर और बाहर सभी जगहों पर निवास कर सकती हैं। 

वैसे तो मुख्यतः लोग, पहले और आखिरी दिन का व्रत रखते हैं, पर बहुत से लोग पूरे 9 दिन का व्रत भी रखते हैं। तो जो नौ दिन का व्रत रखते हैं, वो तो नौ दिन तक माता रानी के हर रुप की पूजा अर्चना करते हैं। लेकिन जिन्हें नहीं पता, उनके लिए बता देते हैं कि कूष्मांडा माता रानी की कैसे पूजा अर्चना की जाती है।

चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा माता की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मत है कि मां कूष्मांडा की पूजा करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। साथ ही सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। 

इसलिए मां के उपासक, श्रद्धा भाव से कूष्मांडा माता की पूजा उपासना करते हैं। अगर आप भी मां कूष्मांडा की कृपा के भागी बनना चाहते हैं तो विधि पूर्वक मां कूष्मांडा की पूजा करें। साथ ही पूजा के समय व्रत, कथा अवश्य पढ़ें। इस व्रत कथा को सुनने मात्र से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। मां कूष्मांडा माता की पूजन विधि और व्रत कथा। 

कूष्मांडा माँ की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना :

देवी कूष्मांडा की पूजन के लिए उनकी तस्‍वीर को चौकी पर विराजमान करें।

फिर मां को रोली, अक्षत, पीले फूल, पीले वस्‍त्र अर्पित करें। 

कुछ लोगों का कहना है कि देवी को बलि प्रिय होती है, देवी कूष्मांडा को भी है। लेकिन जो सृजनकर्ता हो, माँ हो, वो अपनी ही सृष्टि का हनन कैसे कर सकती है। अतः कूष्मांडा माता रानी को बलि में किसी जीव को नहीं, बल्कि कुम्‍हड़ा यानि कद्दू जरूर अर्पित किया जाता है। देवी मां को कुम्‍हड़े की बलि प्रिय है। 

इसके अलावा मां कूष्मांडा की पूजा में 'ॐ बुं बुधाय नमः' मंत्र का जाप करते हुए हरी इलायची के साथ सौंफ चढ़ाएं।

बेहतर होगा कि जितनी आपकी उम्र हो माता को उतनी ही इलायची अर्पित करें।

पूजा के बाद माता को समर्पित की गई इलायची को साफ हरे वस्त्र में बांधकर, पूरे नवरात्रि तक अपने पास रखें। ऐसा करने से जीवन में सुख और समृद्धि बढ़ती है।


जय माता दी 🚩🙏🏻 बोलो सांचे दरबार की जय 🙏🏻

माता रानी की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे 🙏🏻😊