Tuesday, 23 October 2018

Kids Story : जलन

जलन


रचना के पापा का Bombay में नया नया transfer हुआ था। उसका school  में admission  होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। एक तो उसके पापा IAS Officer थे। दूसरा वो पढ़ने में होशियार भी बहुत थी। जल्दी ही उसकी दो दोस्त भी बन गयीं। उनका भी new admission था। उनके school में सुनन्दा का बहुत नाम था। वो सभी field में expert थी। रचना अभी तक जितनी भी cities में गयी थी, सभी जगह उसके पापा के कारण उसे special treatment मिलता था। जिससे वो थोड़ी घमंडी भी हो गयी थी।
पर इस school में सुनन्दा के आगे उसकी कोई value नहीं थी। जिसके कारण वो सुनन्दा से चिने लगी। एक दिन स्कूल में रंगोली competition  था। रचना और सुनन्दा दोनों ही रंगोली में expert थे। जब दोनों की पूरी रंगोली बन गयी, तो ये समझ पाना मुश्किल हो रहा था, कि first  कौन आएगा। निर्णायक लोगों को ½ घंटे में आ कर निर्णय लेना था।
तभी रचना को एक युक्ति सूझी। उसने वहाँ लगे fan को सुनन्दा की रंगोली की तरफ मोड़ दिया, जिसका नतीजा ये हुआ कि सुनन्दा की रंगोली के सारे रंग mix हो गए। ये देख कर सुनन्दा मायूस हो गयी। उसे ठीक करने का समय भी उसके पास नहीं था। सुनन्दा का मायूस चेहरा देख कर रचना बहुत खुश हुई। और अपनी रंगोली के पास आकर खड़ी हो गयी।
निर्णायक गण आ गए। सब की रंगोली के पास आ कर वो देखते जा रहे थे। पर एक रंगोली ऐसी थी, जिसको देखने के बाद वो आगे बढ़े ही नहीं।
अब result की बारी थी। 3rd, 2nd का नाम घोषित हो चुका था। पर अब तक रचना और सुनन्दा दोनों में से किसी का भी नाम नहीं पुकारा गया था। सब सोच रहे थे, कि अब किसका नाम पुकारा जाएगा। पर रचना अच्छे से जानती थी, कि अब वो ही 1st आएगी। और फिर 1st का नाम भी बुलाया गया, रचना का सोचना एकदम सही निकला, रचना 1st आई। सुनन्दा आज पहली बार हारी थी। उसके आँसू थम नहीं रहे थे। सब वापस अपनी class की ओर जाने लगे। तभी एक आवाज़ आई। आप सब जानना नहीं चाहेंगे, इस बार से एक extra ordinary award भी शुरू किया गया है, वो किसे मिला है? extra ordinary means first से भी आगे!
सब वहीं रुक गए। वो है सुनन्दा!
सुनन्दा! पर उसकी रंगोली तो खराब हो गयी थी ना? रचना बुदबुदाई।
जी हाँ, यही वो बच्ची है, जिसने ये prize जीता है। आइये, आप सब मेरे साथ। सबने जा के देखा, मिले हुए रंगों से बहुत सुंदर back ground  में सफेद रंग से राधा- कृष्ण की नृत्य की रंगोली बनी थी। निर्णयक ने सबसे बोला। आप सब इस रंगोली को ध्यान से देखें तो लगेगा, जैसे यहाँ सच में राधा-कृष्ण रासलीला हुई हो, इस बच्ची ने कितना सुंदर रंग बिखेरा है।
सब अद्भुत अद्भुत कह उठे। सच, सारे टीचर भी बोल उठे, आज तक तो सुनन्दा ने भी इतनी अच्छी रंगोली कभी नहीं बनाई थी। रचना किसी को नहीं बता पा रही थी, रंगों की छटा सुनन्दा ने नहीं उसने बिखेरी है। आज तो सुनन्दा को और भी ज्यादा वाह-वाही मिल रही थी। जैसे आग में तप के सोना निखर गया हो।
रचना तो सुनन्दा को down करना चाह रही थी, पर आज उसकी जलन ने सुनन्दा को और ज्यादा famous कर दिया

Monday, 22 October 2018

Story Of Life : सोने का पिंजरा

सोने का पिंजरा

गौरी, अपने नाम सी बेहद गोरी, सुंदर और चुलबुली लड़की थी। उसके गाँव में उस सा सुंदर कोई भी नहीं था। उसे अपने रूप का बेहद घमंड भी था। जितनी वो सुंदर थी, उतनी ही नकचड़ी भी थी। उसके पैर तो कभी एक जगह टिकते ही नहीं थे। कभी नदी में, कभी आम के पेड़ पे, तो कभी किसी के खेत में, उछलकूद करती ही मिलती। और शाम में दोस्तों के साथ कभी चाट-पकौड़ी, कभी नाटकनौटंकी में चल देती। कुम्हार की बेटी थी, पर उसके सपनों का तो क्या कहना, रानी कैसे बन जाए बस यही दिन रात सोचा करती।
दोस्त, रिश्तेदार उसे heroine कहा करते थे, तो वो भी सोचा करती कि, क्यूँ ना फिल्मों के लिए जाया जाए। पर उसके पिता इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थे, फिर मुंबई दूर भी बहुत था।
पर कभी कभी भगवान भी मेहरबान हो जाते हैं, शायद यही कारण था, कि एक hit director ने अपनी shooting  की location में उसी के गाँव को चुन लिया।
सभी बड़े प्रसन्न थे, कि गाँव में shooting होगी। जब shooting चल रही थी। तब गौरी, एक भी दिन बिना देरी किए आकर, सबसे आगे खड़ी होती, और heroine की नकल किया करती। अपनी सुन्दरता और नौटंकी के कारण director की भी नज़र उस पर पड़ गयी थी।
गाँव के हवा-पानी में heroine की तबीयत खराब होने लगी, तो उसने director से गाँव में shooting करने को मना कर दिया।
Heroine इस फिल्म में नई थी, और शायद गौरी की किस्मत भी बुलंदी पर थी। director ने heroine को निकाल दिया और role गौरी को offer किया। गौरी को भी रोज रोज सुनकर dialogue याद हो गए थे। उसने तुरन्त एक ही take में seen ok कर दिया
Director गौरी के पिता के पास आ गए, कि वो उसे acting कर लेने दें। पर उसके पिता नहीं मान रहे थे। जब director बोले वो गौरी को 75 लाख देंगे। तो उसके पिता और गौरी दोनों कुछ देर के लिए सुन्न पड़ गए। पर फिर उसके पिता तैयार हो गए।
गौरी की shooting का एक हिस्सा खत्म हो गया था। बाकी भाग के लिए उन्हें मुंबई जाना था। गौरी बहुत खुश थी, वो अपने सपनों की नगरी जा रही थी। गौरी ने director से कहा, उसके पिता भी चलेंगे। Director ने कोई आपत्ति नहीं उठाई। सब लोग मुंबई आ गए।
मुंबई में shooting शुरू हो गयी, बहुत कड़ी मेहनत थी, दिन रात का कोई ठिकाना नहीं था। मौसम के थपेड़े भी झेलने होते और साथ ही शुरू हो गयी गौरी पर पाबंदी। वो कहीं अकेले नहीं जा सकती थी। चाट-पकौड़ी मना हो गयी, केवल diet food ही खाने की हिदायत थी, और मुंबई के समुद्र में भी जाने को नहीं मिल रहा था।
इन सब बातों से गौरी तंग हो गयी। आज उसे समझ आ रहा था, कि जिसे वो ऐश कि ज़िंदगी समझ रही थी, वो तो सोने का पिंजरा था। जहाँ सोने-चाँदी, एशो-आराम के साधन की तो कोई कमी नहीं थी। पर उनके लिए अपनी आज़ादी, अपनी पसंद, अपने लोग, सबसे दूरी हो गयी थी। जिस गाँव से उसे बेहद लगाव था, कई महीनों से वो वहाँ जा तक नहीं पा रही थी। उसके कोई दोस्त आते, तो उन्हें मिलने नहीं दिया जाता, क्योंकि director नहीं चाहते थे, कि फिल्म के release होने से पहले फिल्म की story leak होउन्हें डर था, कहीं गौरी excitement में अपने दोस्तों को film की story न बता दे।
उसने advance में पैसे ले लिये थे, जिससे वो फिल्म ख़त्म होने तक नहीं निकल सकती थी। पर उसको अब हर दम इस सोने के पिंजरे से निकलने की लालसा थी।

Friday, 19 October 2018

Poem : हर साल दशहरे में हम

हर साल दशहरे में हम



हर साल दशहरे में हम,
रावण को जलाते हैं
पर क्या उसका रत्ती भर 
भी अधिकार हम पाते हैं?

प्रभू राम सरिखे पुत्र 
क्या हम कभी बन पाएंगे
जिन्होंने राजमहल को क्षणभर में
मात्र, पिता के वचनों की
खातिर था त्याग दिया,
वनवास जानें से पहले, 
ना एक भी सवाल किया

हर साल दशहरे में 
हम रावण को जलाते हैं
पर क्या उसका रत्ती भर 
भी अधिकार हम पाते हैं?

प्रभू राम सरिखे शिष्य
क्या हम कभी बन पाएंगे
जिन्होंने अपने गुरुओं के कथनों 
को, सर्वोपरि स्थान दिया
उनकी जीवनपर्यंत रक्षा हेतु
राक्षसों का संहार किया 

हर साल दशहरे में 
हम रावण को जलाते हैं
पर क्या उसका रत्ती भर 
भी अधिकार हम पाते हैं?

प्रभू राम सरिखे पति
क्या हम कभी बन पाएंगे
जिन्होंने सीता जी ‌की हर इच्छा
को मान दिया, सम्मान दिया
उनको अपने से पहले
संसार में स्थान दिया
इसीलिए हम उन्हें सदा
सीता राम बुलातेे हैं
संसार में अपने गुणों के ही
कारण वो पुरषोत्तम कहलाते हैं

हर साल दशहरे में 
हम रावण को जलाते हैं
पर क्या उसका रत्ती भर
भी अधिकार हम पाते हैं?

जब हम में एक भी
गुण नहीं, तो किस अधिकार से
हम खुद राम बन जाते हैं
हर साल दशहरे की पावन बेला
हम रावण को जलाते हैं
गर प्रभू राम के एक दो गुणों
को भी हम, अपने भीतर ला पाते हैं
तब रावण को जलाने के हम, 
शायद कुछ अधिकार पा जाते हैं