Tuesday, 27 August 2019

Story Of Life: मैं भी बहू थीं (भाग- 2 )

 Story Of Life: मैं भी बहू थीं  (भाग- 1) के आगे.....

Story Of Life: मैं भी बहू थीं (भाग- 2 ) 



कामना के इतना बोलने और पैसे की तंगी के चलते रचित माँ से बात करने चला गया।

लक्ष्मी कैसे भी, रचित की बात नहीं मान रही थी।  पर जब रचित ने कहा, अगर कामना ने job join नहीं की, तो मजबूरन उसे बीमारी में ही job ढूंढनी पड़ेगी। 

उससे ऐसा भी हो सकता है, अधिक बीमार होने से hospital में admit होना पड़े। 

बेटे की ऐसी बात सुनकर लक्ष्मी ने कह दिया, ठीक है, कामना job कर सकती है

कामना को जल्दी ही job मिल गयी। चंद दिनों में रचित ठीक हो गया, और उसने दूसरी company join कर ली।  पर उसने कामना को job continue ही रखने को कहा।

Job के साथ घर के सारे काम manage करना कामना के लिए भारी पड़ने लगा। लक्ष्मी चंद दिनों के लिए अपनी बहन के घर गयी थी।

तो एक दिन कामना ने रचित से कहा, अब तो हम दोनों job कर रहे हैं। पैसे की तंगी नहीं है, तो क्यों ना अब हम लोग घर के काम के लिए maid रख लें।

रचित इस बात के लिए, खुशी खुशी ready हो गया। कामना ने एक maid रज्जो को घर बुला लिया। रज्जो बहुत अच्छा काम करती थी, साथ ही बहुत सीधी और ईमानदार भी थी। 

उसके काम करने से कामना को अपना घर बहुत अच्छा लगने लगा था, क्योंकि अब वो चैन के दो पल रचित के साथ भी बिता रही थी।

लक्ष्मी जब घर वापस आई, तो रज्जो को देखकर उसने घर सिर पर उठा लिया। बोली आज कल की बहुयें कुछ काम नहीं करना चाहती हैं। 

वहाँ दीदी की बहू अलका ने काम वाली लगा ली है, और यहाँ कामना ने। हद हो गयी इन लोगों की कामचोरी की। 

मैं भी बहू थीछतीसों काम कर डालती थी, कुएं से पानी भरना,  गेहूँ पीसना, फिर बर्तन, झाड़ू-पोछा, 10-10 लोगों के लिए खाना बनाना, सब अकेले कर लेती थी। और आज हाथ नही हिलता इन बहुओं से।

रज्जो, लक्ष्मी की बातों से डर कर भाग गयी। कामना भी सहम कर खड़ी हो गयी। कामना को सहमा देखकर रचित माँ के पास गया।
आगे पढ़ें   मैं भी बहू थीं  (भाग- 3)...... 

Monday, 26 August 2019

Story Of Life: मैं भी बहू थीं


मैं भी बहू थीं


लक्ष्मी पुराने ख्यालों वाली थी, जिसका मानना था, घर में गृहणी को सभी काम अपने आप करने चाहिए, घर के कामों के लिए नौकर रखना, आलस और बर्बादी दर्शाता है।

इसलिए उसने घर के कामों के लिए कोई भी नौकर नहीं रखे थे।

उसका एकलौता बेटा रचित शादी योग्य हो चला था। कई रिश्ते आ रहे थे, पर ज्यादातर नौकरीपेशा थीं।

लक्ष्मी सबको इंकार करती जा रही थी, आखिर उसे बिना job वाली पढ़ी- लिखी कामना मिल ही गयी।

बड़ी धूमधाम से विवाह सम्पन्न हो गया।

कामना के गृह-प्रवेश के साथ ही लक्ष्मी ने सभी कामों को हाथ लगाना बंद कर दिया। और सब कामना के कंधों पर डाल कर अब वह दिन भर आराम करती, और जब देखो तब कुछ ना कुछ कामों के फरमान यह कह कर जारी कर देती, कि मैं भी बहू थी, तो कितना काम करती थी, आजकल की जैसी ना थी।

कामना के मायके में बर्तन, झाड़ू- पोछा वाली लगी हुई थी। फिर पढ़ने में भी बहुत प्रखर थी, तो घर के कामों को कम ही हाथ लगाती थी। 

ससुराल में आ कर एकदम से पड़े इतने काम और सास के ताने उसे जीने नहीं दे रहे थे। पर उस पर पहाड़ तो तब टूट गया, जब रचित की बीमार के कारण नौकरी चली गयी।

रचित बहुत दुखी था, कामना ने रचित से कहा, private company थी, तो वो आपके ठीक होने का wait तो नहीं करती, पर आप परेशान क्यों हो रहे हैं? आप इतने होनहार हैं, ठीक हो जाइए, दूसरी मिल जाएगी। और अगर आप कहे, तो मैं भी job ढूँढने का प्रयास करूँ।

तुमको, माँ करने नहीं देगी।

आप मनाइए ना, माँ जी को। अगर जरूरत पड़ने पर काम ही ना आ सके, तो इतने पढे-लिखे होने का क्या लाभ?

आगे जानने के लिए पढ़ें मैं भी बहू थी (भाग-2) 


Saturday, 24 August 2019

Poem : ओ कान्हा मेरे, तुम तो हो गिरिधारी

नन्हे कान्हा के पावन जन्मदिवस की सबको हार्दिक शुभकामनाएँ 

ओ कान्हा मेरे, तुम तो हो गिरिधारी



ओ कान्हा मेरे,
तुम तो हो, गिरिधारी। 
 पर मुझको लगती,
 तेरी, बाल-लीला ही प्यारी
 
ओ कान्हा मेरे,
   तुम तो हो, गिरिधारी 

 कालिया मर्दन किया तुमने,
  पूतना भी मारी। 
     पर मुझको लगती,   
  तेरी, बाल लीला ही प्यारी
 
ओ कान्हा मेरे,
  तुम तो हो, गिरिधारी। 

कंस वध, करके तुमने,
पाप से, दुनिया तारी। 
  पर मुझको लगती,  
तेरी, बाल लीला ही प्यारी
ओ कान्हा मेरे,
   तुम तो हो, गिरिधारी। 

गोवर्धन कनिष्ठा में उठाकर,
की पूरे गोकुल, की रखवारी। 
  पर मुझको लगती,  
तेरी बाल लीला ही प्यारी
 
ओ कान्हा मेरे,
तुम तो हो गिरिधारी। 

जब फोड़कर, मटकी तुमने,
माखन खा ली सारी। 
तब मुझको लगती,
  यही, बाल-लीला ही प्यारी। 
 
  ओ कान्हा मेरे,
   तुम तो हो गिरिधारी

बांसुरी की, मधुर तान पर,
गोपियाँ हो गईं बांवरी सारी। 
तब मुझको लगती,
  यही बाल-लीला ही प्यारी। 
 
ओ कान्हा मेरे,
  तुम तो हो गिरिधारी। 

कुछ ना चाहूँ, तुमसे प्रभुवर,
तेरे चरणों में, दुनिया सारी। 
बस मुझको दे दो,
 इन चरणों की रखवारी। 
 ओ कान्हा मेरे,
 तुम तो हो गिरिधारी। 

बोलो बांके बिहारी की जय 

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