Saturday, 28 September 2019

Story Of Life : एक श्राद्ध ऐसा भी


एक श्राद्ध ऐसा भी


मंगलू अपनी ही धुन में साइकिल पर सवार बहुत सारी कॉपी, पेन्सिल और मिठाई ले कर चला जा रहा था, सामने से रामदीन पंडित चले आ रहे थे।  मंगलू को देखकर बोले, अरे मंगलू कहाँ चला जा रहा है अपना हवाईजहाज उड़ाते हुए?

अरे! पगले तुझे नहीं पता, आज कल पितरपक्ष चल रहे हैं। कितने दिन हो गए तेरे बाबू जी को गए हुए, उनके नाम से कब श्राद्ध कराएगा? बेचारे कितना चाहते थे तुझे, तू भी तो बहुत चाहता था उन्हें। अब जरा भी चिंता नहीं है, तुझे कि उन्हें स्वर्ग में सुख मिले।

पंडित जी जानते थे, मंगलू अपने बाबू जी को बहुत चाहता था, तो एक बार भी बातों में फंस गया, तो जीवन भर श्राद्ध कराएगा, इसलिए जब से उसके बाबू जी गए थे, पंडित जी को जब भी मंगलू पितरपक्ष में दिख जाता, वो उसे समझाते जरूर।

दो पितरपक्ष निकल गए थे, कहते-कहते, पर मंगलू एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता। पर आज मंगलू का धैर्य जवाब दे गया। वो बोला, आ जाओ पंडित, आज हिसाब समझ ही लेते हैं। 

हाँ तो पंडित, पहले तो ये बताओ, प्रभू श्री राम जी और भगवान श्री कृष्ण जी के श्राद्ध की कौन सी तिथि आई है, इस साल?

राम राम राम! कैसी नीच जैसी बात करते हो, वो तो भगवान हैं, उनका भी कोई श्राद्ध करता है। पंडित गुस्से में बोला। 

काहे, जन्म-मरण तो उनका भी हुआ था ना?

का भाई, भांग खाकर आए हो? कैसी मूर्खता भरी बात कर रहे हो! पंडित का गुस्सा बढ़ने लगा।

वही तो पंडित, हम तो भगवान राम, कृष्ण को देखे नहीं हैं, तुम भी नहीं देखे हो, तब 
भी भगवान मानते हो। हम तो बाबू जी को देखे हैं, उही हमको जन्म दिये, पाले-पोसे, का-का नहीं किए, तो हमारे तो उही भगवान हैं। जब तक बाबू जी जिंदा थे, हम खूब सेवा किए। तुम भी जानते हो, कि किए हैं। का हम झूठ बोल रहे हैं?

नहीं, बहुत सेवा किए हो, सारा गाँव जानता है, पंडित ने हामी भरी।

तो ये बताओ भगवान का श्राद्ध कहाँ होता है?

पर, पंडितों को इन दिनों में खिलाना, दान देना बहुत पुण्य होता है, तुम्हारे पिता जी की आत्मा तृप्त हो जाएगी, पंडित अपनी बात पर अड़ा था।  

अच्छा, तुम जे बताओ कि, तुम जानते हो, हमारे बाबू जी को सबसे ज्यादा का भाता था?

पंडित, चुप रह गया।

अरे भाई, जब तुम्हें पता ही नहीं है, तो हम तुम्हें काहे भोजन कराएँ, दान दें? बाबू जी टीचर थे, तो उन्हें कॉपी, पेन्सिल बहुत पसंद थी। इसी कारण हर साल, जे सब, अनाथ बच्चों को देने जाते हैं। साथ ही बाबू जी को हमारे हाथ के बने लड्डू बहुत पसंद थे, इसलिए प्रसाद के लिए वो भी ले जाते हैं

हमारे बाबू जी, हमारे भगवान हैं। जब थे, तब तक उनकी खूब सेवा की, अब नहीं हैं तो हम उनका श्राद्ध नहीं करते हैं, उन्हें बस तिथि में याद करते हैं। उन्होंने, हमारे लिए जो किया उसके लिए उन्हें धन्यवाद देते हैं। दान भी देते हैं, प्रसाद भी देते हैं, पर गरीब और अनाथ बच्चों को।  

तो पंडित तुम तो, बहुत तेज़ निकल लो, किसी ने अगर हमारी बात सुन ली, और वो भी मात-पितृ भक्त हुआ, तो तुम्हारी पंडिताई वहाँ से भी जाएगी।

पंडित तेज़ी से आगे बढ़ गया, उसने फिर कभी मंगलू को नहीं रोका, आज उसे एक नयी परिभाषा पता चली - एक श्राद्ध ऐसा भी

Friday, 27 September 2019

Story Of Life : सास बहू और वो (भाग-3)




सास बहू और वो (भाग-3)

एक दिन दादी सास का आना हुआ। वो बड़ी ही रौबदार और समझदार थीं। उनकी बात सास और बहू दोनों ही सुनते थे।
दो दिन में ही उन्हें चतुरी की सारी चतुराई समझ आ गई। उन्हें अपनी बहुओं पर बहुत क्रोध आया।

फिर मन शांत करके उन्होंने सास बहू दोनों को बुलाया, और बोलीं, मुझे तुम दोनों की सोच पर बहुत तरस आ रहा है।

ऐसा क्यों बोल रहीं हैं आप? दोनों एक साथ बोले।

वो बोलीं बहू तुम्हें कितने दिनों का अनुभव है, और पोता बहू, तुम कितनी पढ़ी लिखी हो, बाहर नौकरी भी करती हो।

दोनों फिर एक साथ बोलीं, "हाँ।"

तब भी, तुम दोनों को चतुरी कितने दिनों से बेवकूफ बना रही है। अब दोनों एक दूसरे का मुँह देखने लगीं।

एक दूसरे को क्या देख रही हो, कभी दो बिल्ली और बन्दर की कहानी नहीं सुनी तुम लोगों ने?

वही कहानी इस घर में चल रही है, तुम दोनों बिल्लियों की लड़ाई में चतुरी बंदरिया लाभ उठा रही है।

आप क्या कह रहीं हैं? हमे कुछ समझ नहीं आ रहा है। दोनों उत्सुकता से उन्हें देख रहीं थीं।

अरे ये चतुरी अपना उल्लू सीधा करने के लिए, तुम दोनों से एक दूसरे की बुराई करती है, और तो और जब एक से लड़ती या चिल्लाती है, तो दूसरी चुप रह कर उसका ही support करती हो।

तुम लोगों में मतभेद है, वो तो समझ आता है, पर इतना भी क्या कि दूसरे उसका लाभ ले जाएँ। जब भी घर के किसी भी सदस्य पर कोई बाहर का हावी हो, तो सबको मिलकर उसे नीचा कर देना चाहिए।

दोनों सास बहू को सब समझ आ गया। अब तो वो चतुरी को किसी पर चिल्लाने या चढ़ने नहीं देती थीं। जब भी ऐसा होता, सास-बहू दोनों एक हो जातीं।

जिसका नतीजा ये हुआ, कि थोड़े ही दिन में चतुरी सुधर गयी, अब वो बहुत कम छुट्टी लेने लगी, और काम भी सफाई से करने लगी।

और उसके बाद से वो कभी भी सास और बहू के बीच नहीं आई।

Thursday, 26 September 2019

Story Of Life : सास बहू और वो (भाग-2)



सास बहू और वो (भाग-2) 





जब कभी बहू kitchen में होती, तो कहती, क्या भाभी आपके माँ-बाप ने ठीक से देखा नहीं था? कैसे कंगलों में शादी कर दी।

कभी कहती, आपकी तो किस्मत ही खराब है, ऐसी हट्टी-कट्टी सास के रहते हुए भी आपको उनका काम करना पड़ता है। अब छोटे-मोटे काम तो वो खुद भी कर सकती हैं, जब देखो, तब आपको हर काम के लिए आवाज़ लगा देती हैं। 
बहू को सास पहले ही पसंद नहीं थीं, ऊपर से चतुरी की बातें और दिमाग खराब कर देती थीं।
कुछ ही दिनों में चतुरी ने गंदा काम करना, और आए दिन छुट्टी लेना शुरू कर दिया। दोनों सास-बहू उससे कुछ ना कहते, दोनों की मुँहलगी जो हो चुकी थी।

और कभी बहू इतनी छुट्टी के लिए कुछ बोलती, तो चतुरी खूब तेज़ - तेज़ चिल्लाने लगती, गरीब का दुख - दर्द भी समझ लिया करो, एक - एक छुट्टी ना गिना करो भाभी, अच्छा नहीं लगता। यह देखकर सास का मन घी के दीपक जलाने लगता, कि चलो कोई तो है, जो बहू पर चिल्लता है।

और कभी सास गंदे बर्तन देखकर मीन-मेख निकालती, तो चतुरी उस पर चढ़ बैठती, बर्तन तो भिगोते नहीं हो आप लोग, और मुझको बोल रहीं हैं। ये देखकर बहू का मन बल्लियों उछलने लगता, चलो कोई तो है, जिससे दबती हैं।

ऐसे ही दिन कट रहे थे। एक दिन दादी सास का आना हुआ। वो बड़ी ही रौबदार, समझदार थीं, उनकी बात सास और बहू दोनों ही सुनते थे। दो दिन में ही उन्हें चतुरी की सारी चतुराई समझ आ गयी। उन्हें अपनी बहुओं पर बहुत क्रोध आया।

फिर मन शांत करके उन्होंने सास बहू दोनों को बुलाया, और बोलीं...... 

आगे पढ़िए सास बहू और वो (भाग-3 )