Wednesday, 10 May 2023

Memories : वो दिन

वो दिन  


कल गाज़ियाबाद में निकाय का election होना है, इसलिए अलग अलग पार्टी के नेता अपने चुनाव का प्रचार प्रसार कर रहे हैं।

सभी नेताओं के आदमी, लाउडस्पीकर ले, जीप में बैठ कर उनके नाम व उनके चुनाव चिह्न के विषय में सबको बताते हुए जा रहे थे।

उनके प्रचार प्रसार को देखकर, हम पहुंच गए अपने बचपन में...

तो इस बात का किस्सा कुछ यूं है कि..

हमारे पापा जी,  Allahabad (Prayagraj)  University से PhD करने आए थे।

इलाहाबाद में ही हमारा ननिहाल है, तो हम लोग वहीं रह रहे थे।

नाना जी का घर, allahabad university के science department के एकदम पास है। 

और जैसा कि आप सब जानते हैं कि Allahabad University, नेताओं की जन्मस्थली या गण है। दूसरे शब्दों में कहें तो allahabad university की सरजमीं से बहुत से नेताओं का उद्भव हुआ है।

तो बस आए दिन चुनाव के प्रचार प्रसार होते ही रहते थे। पर उन दिनों के प्रचार-प्रसार ही अलग थे।

निकलते तो वो लोग भी जीप में या ट्रक में होते थे, पर उनमें एक खासियत थी। 

वो लोग जब सड़क से गुजरते थे तो वो 5 or 10 रुपए के नोट के जैसे बहुत सारे रंगीन कागज़ उड़ाया करते थे।

वो कागज़, पीले, गुलाबी, हरे, नीले बहुत से रंगों के light shade के होते थे। 

जिसमें बहुत भीनी-भीनी, और तेज खुशबू होती थी। यह खुशबू, हर कागज़ में अलग तरह की होती थी। 

उस कागज़ में नेता का नाम और उसका चिन्ह अंकित रहता था, फिर भी कागज़ के रंग और खुशबू से‌ भी यह निर्धारित रहता था कि फलां कागज़, फलां नेता का है। 

पर हम बच्चे, हमें क्या कि कौन से नेता का कौन सा कागज़ है। 

अब आप कहेंगे कि, तो इस याद का जिक्र क्यों? 

क्योंकि हमें इससे बात से तो कोई मतलब नहीं रहता था, कि किस नेता का कौन से रंग का कागज़ का टुकड़ा है। पर कागज़ के टुकड़े!..

उन कागज़ के टुकड़ों के तो हम सब दीवाने थे। जैसे ही प्रचार प्रसार की आवाज़ आती, हम सब बच्चे दौड़कर घर से बाहर होते थे।

क्योंकि हमें वो कागज़ के टुकड़े चाहिए होते थे, वो भी ज़मीन में गिरने से पहले...

तो बस, वो लोग उड़ाते थे और हम लोग लपकते थे। वो एक बार में ही 50-60 के करीब कागज़ के टुकड़े उड़ा दिया करते थे और उनमें से 5- 10 हमारे हाथ लग जाया करते थे। बाकी जमीन पर गिर जाया करते थे, जिन्हें कुछ और लोग उठा लिया करते थे।

पुष्पा में तो यह dailog बहुत बाद में आया, पर हमारा तो बचपन से ही यही उसूल था " झुकेगा नहीं...

अब आप को बताते हैं कि आखिर क्यों था, इतना craze, उन रंगीन कागज़ के टुकड़ों का? 

जब हम छोटे थे तब, हम सभी बच्चों को अपनी कापियों में बहुत कुछ रखने का बड़ा शौक हुआ करता था। शायद आप को भी याद होगा, अपने बचपन का वो शौक...

उन दिनों चिड़ियों के रंगीन पंख अगर मिल जाते थे, तो उनका तो कहना ही क्या... उनको हम विद्या कहते थे और बहुत जतन से रखते थे, याद आया?..

हाँ तो, उन रंगीन कागज़ के खुशबूदार टुकड़े, हम लोग अपनी कापियों में ही रखते थे। इस बात का विशेष ध्यान रखकर कि, एक काॅपी में, एक ही तरह के खुशबू के कागज़ रखें।

उससे होता यह था कि हमारी सारी कापियां अलग-अलग खुशबू से महकती थीं। 

जब हम स्कूल जाते थे तो जिन बच्चों के घर की तरफ यह कागज़ नहीं उड़ाए जाते थे, वो हमारी खुशबूदार कापियों की बहुत तारीफ करते, तो हमें उससे बहुत गर्वानुभूति होती थी।

आज भी बहुत याद आते हैं, वो दिन... रंगीन और खुशबूदार, खुबसूरत बचपन के वो दिन...

आपको भी याद आ गए होंगे, अपने बचपन के रंगीन और खुबसूरत वो दिन...

याद आ गये ना?

Tuesday, 9 May 2023

Article : बड़ा मंगल

 बड़ा मंगल  



ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले सभी मंगल की लखनऊ में अलग ही विशेषता है। इस मास में पड़ने वाले सभी मंगल को बड़ा मंगल कहते हैं। इन सभी मंगल में पूरे शहर में, अलग ही धूम रहती है, अलग ही रौनक रहती है। 

क्या शहर, क्या मंदिर, क्या गली, क्या कोई घर, हर एक जगह आपको, घंटे-घड़ियाल, पूजा-पाठ, भंडारे देखने और सुनने को मिलेंगे।

इन दिनों एक अलग सी शांति, एक अलग सी शक्ति मिलती है। 

बड़ा मंगल, ऐसे विशेष मंगल जो विशिष्ट है, अलग है, सिद्ध हैं। 

पर क्यों? 

ऐसी क्या विशेषता है? और क्या है बड़ा मंगल? 

हिन्दू धर्म में, प्रकृति से जुड़े सभी, महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। फिर वो चाहे सूर्य हो चंद्र हो, नदी हो, , पर्वत हों, वृक्ष हो, या वो दिन ही क्यों ना...हर एक का विशेष स्थान है।

सनातन धर्म में प्रत्येक दिन विशिष्ट देवता को समर्पित होता है। सोमवार महादेव को, मंगल बजरंगबली को, बुध गणेशजी को, बृहस्पति श्रीहरि को, शुक्र माता रानी को, शनिवार शनि देव को और रविवार सूर्य देव को समर्पित है।

जैसा कि सबको विदित ही है कि मंगल का दिन, संकट मोचन हनुमान जी को समर्पित है। मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। 

पर सभी मंगल में, ज्येष्ठ महीने के मंगलवार को विशेष माना गया हैं। इसलिए इसे बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल कहा जाता है। 

इस साल मई महीने में 4 बड़ा मंगल पड़ रहा है। जिसमें प्रथम बड़ा मंगल आज 9 मई को है। यह चारों बुढ़वा मंगलवार बजरंगबली को समर्पित करने के लिए अधिक विशेष हैं।

जानते हैं, क्यों कहते हैं ज्येष्ठ मास के मंगल को बड़ा मंगल

बड़ा मंगल 

हिन्दू धर्म में त्रेतायुग और द्वापरयुग का विशेष महत्व है, और बड़ा मंगल, दोनों युगों से जुड़ा है।

सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले मंगलवार को बुढ़वा मंगल या फिर बड़ा मंगल कहे जाने के पीछे दो धार्मिक कथा का जिक्र मिलता है।

मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास के मंगलवार को भगवान हनुमान पहली बार भगवान श्री राम से मिले थे।

जिस देवता को समर्पित है मंगल, जब उस देवता के लिए ही, यह दिन बड़ा है, जिसमें वो अपने ईष्ट देव से मिले हों, तो वो मंगल तो बड़ा मंगल हुआ ना? इसलिए तब से, इस महीने के सभी मंगलवार को बड़ा मंगल के नाम से जाना जाता है। 

वहीं महाभारत काल में भी इस ज्येष्ठ मास के मंगलवार को बजरंगबली ने बूढ़े वानर का रूप धारण करके भीम के अभिमान को दूर किया था, तभी से इस मंगल को बुढ़वा मंगल कहा जाने लगा। 

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में बड़ा मंगल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है और माना जाता है कि इसकी शुरुआत भी यहीं से हुई थी। इस पावन पर्व पर बड़ी विधि-विधान से बजरंगी की पूजा का विधान है। 

अब जान लेते हैं कि इस बड़ा मंगल का महत्व क्या है।

महत्व

मान्यता है कि इस दिन बजरंगबली को चोला चढ़ाने, दान पुण्य करने से हर तरह की बाधा दूर हो जाती है। हनुमान जी को चिरंजीवी कहा जाता है, बड़ा मंगल के दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ उन्हें याद करता है तो वे उसे बचाने के लिए दौड़े चले आते हैं। आर्थिक, मानसिक और शारीरिक पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए इस दिन संकटमोचन की व्रत-पूजा अचूक मानी गई है। 

बड़ा मंगल के दिन हनुमान जी की पूजा करने वाले लोगों की रक्षा स्वयं हनुमान जी करते हैं। इस दिन हनुमान जी की पूजा-पाठ करने से भक्तों के दुख-दर्द तो दूर होते ही हैं, साथ ही मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। बड़ा मंगल को बुढ़वा मंगल भी कहा जाता है। 

इस दिन, हनुमान मंदिर में जाएं और हनुमान जी के दर्शन करें। हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का पाठ करें।

लाल रंग का पुष्प, लाल रंग के वस्त्र, लाल रंग के फल, बूंदी, सिंदूर आदि चढ़ाएं। 

अगर आप लखनऊ में हैं तो कोशिश करें कि हनुमान सेतु मंदिर अवश्य जाएं। यहां के मंदिर की विशेष मान्यता है 🙏🏻🙏🏻

आप सभी को ज्येष्ठ मास के प्रथम बड़ा मंगल पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🏻💐 

संकटमोचन, हम सब के संकट हरे, और अपनी कृपा दृष्टि बनाएं रखें🙏🏻🙏🏻

Monday, 8 May 2023

Short story: शोर

 शोर  



रुपल, क्या कर रहे हो बेटा?

माँ, क्रिकेट खेल रहा हूं।

आय हाय! बड़ी मुश्किल से नींबू का अचार डाला है, बरनी कहीं फूट ना जाए...

रिशिता, देखो ना, वहां से बरनी उठा लाओ, वरना आज अचार डाला है और आज ही मिट्टी में मिल जाएगा...

माँ, वो खेल रहा है ना, उसी से बोल दीजिए...

अरे मेरी रानी बिटिया! उसके गंदे हाथ हैं, उससे कैसे उठवा लूं बरनी? तू ही जा ना ... 

क्या माँ! आप हमेशा यही करती हैं... रिशिता भुनभुनाती हुई जाने लगी‌...

झनाक!... 

हाय रे! तोड़ डाला रे... रुपल, तू कब सुधरेगा? सब बर्बाद कर दिया, मेरी मेहनत का तो तूने कभी मोल समझा नहीं, फिर कितनी मुश्किलों से रामू काका ने, गांव से कागज़ी नींबू मंगाएं थे, उनका ही मोल समझ लेता...

माँ, बड़बड़ाती रही, पर रुपल पर इस का लेश मात्र भी असर नहीं पड़ा।

हर दूसरे दिन माँ बच्चों पर चिल्लाती रहतीं, कभी चादर बर्बाद करने के लिए, कभी पर्दा पकड़कर झूलने के लिए, कभी टूट-फूट के लिए, कभी पूरे घर को अस्त-व्यस्त करने के लिए तो कभी धमा-चौकड़ी और आपसी लड़ाई के लिए...

माँ का कहना- चिल्लाना, बच्चों पर क्षण भर ही असर डालता, और फिर थोड़ी देर बाद वही, बच्चों की मस्ती और मां की रोक-टोक.... 

बस ऐसे ही दिन कट रहे थे।

रिशिता के 11th में आने से बच्चों के झगड़े थोड़े कम हो गए थे, क्योंकि रिशिता को पढ़ाई से ही फुर्सत नहीं थी।फिर उसका engineering में selection हो गया और वो दूसरे शहर चली गई।

रिशिता के जाने और रुपल के 11th में आ जाने से झगड़े तो पूरे ही बंद हो गए, पर चादर बर्बाद करना, कमरा अस्त-व्यस्त होना अभी भी बरकरार था और माँ का टोकना भी...

पर रुपल के भी engineering में selection के बाद तो घर में जैसे जान ही नहीं बची।

चादर, पर्दे, कमरा, सब व्यवस्थित, ना कोई शोर-शराबा, ना कोई टूट-फूट, ना मां का कहना- चिल्लाना, सब एकदम शांत या यूं कहें वीरान हो गया था सब कुछ...

सब व्यवस्थित था, नहीं था तो, बस माँ का मन..

उसके कान अब बच्चों का शोर सुनने को तरस जाते थे...

बच्चों को थोड़ा धमा-चौकड़ी और शोर भी मचाने देना चाहिए, क्योंकि यही ज़िंदगी है, यही यादें...

एक बार, यह पल गुज़र जाते हैं तो जिंदगी में वीराना ही रह जाता है।