आज आप सब के साथ मुझे भोपाल के मेजर नितिन तिवारी जी की कविता को साझा करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है।
आज नितिन जी ने इस कविता में माध्यम से कहा है कि, दुःख अवसाद को भूलकर आगे बढ़ना ही जीवन है, और जीवन की इस सच्चाई को उन्होंने बहुत खूबसूरती से उकेरा है।
आइए, इसका आनन्द लेते हैं…
जीवन के दिन चार बचे हैं
जीवन के दिन चार बचे हैं,
आग बुझी अंगार बचे हैं।
दबे उम्मीदों की राखड़ में,
बुझी आग के सार बचे हैं।
भीतर ही जो रहे सुलगते,
गढे हुए दो चार बचे हैं।
हमने खूब सजाया उपवन,
मानो सदा रहेगा यह तन।
थे बसंत उत्सव के भागी,
चले गये सब उजड़ा मधुवन।
पत्ते छीन लिये पतझड ने,
फूल नहीं बस खार बचे हैं।
कर कमजोर थाम पतवारें,
नौका जब मझधार भंवर है।
है पुरुषार्थ सिर्फ शब्दों में,
जीवन नैया भी जर्जर है।
सांसे है गिनती की बाकी,
भोगे जो व्यवहार बचे हैं।
चार रोज तो काफी हैं यदि,
कुछ करने को संकल्पित हों।
बीती बातें सभी भुला दें,
जियें जैसे आज को ही अर्पित हो।
कल का क्या जो होगा सो हो,
जियें यही सुख सार बचे हैं।।
