Friday, 27 April 2018

Kids Story : नीति first नहीं आई


              समस्या:बच्चा पढ़ता नहीं है; school की बातें घर में नहीं बताता।


                

           कहानी: नीति first नहीं आई





नीति और निखिल दोनों ही best friend थे। नीति बहुत ही intellegent थी, निखिल भी intellegent  था, पर नीति से कम, लेकिन निखिल मेँ एक habit  बहुत अच्छी थी, कि वो घर आते ही अपनी Mumma  को स्कूल में क्या हुआ, वो सब बताता था, lunch  finish   कर के, अपना homework  complete  करता था, और स्कूल में जो पढ़ाया है, वो भी पढ़ता था, उसके बाद ही खेलने जाता था।


जबकि नीति, school  की कोई भी बात, अपनी mumma  को हीं बताती थी। और अपना homework  भी बड़ी मुश्किल से finish करती थी, और जब उसकी mumma उसे  पढ़ने को बोलती, वो बोल देती मैं बहुत intellegent  हूँ, मुझे सब आता है।


कुछ दिन बाद exam आ गए। दोनों के exam  बहुत अच्छे हुए थे।

पर exam  का result  देखकर नीति रोने लगी, निखिल first और वो second आई थी।

नीति को रोता देख कर teacher  नीति के पास गयी, उन्होने नीति से पूछा, बेटा आप क्यों रो रहे हो?

नीति बोली, जब मैं ज्यादा intellegent  हूँ, तो निखिल कैसे first  गया?

तब, Mam  बोली, हाँ तुम ज्यादा intellegent  हो, पर तुम्हारी Mumma बता रही थीं कि तुम उन्हें school में क्या हुआ? वो नहीं बताती हो, जिससे तुम्हारी mumma  तुम्हें पढ़ा नहीं पाती हैं, जब की निखिल अपनी Mumma को सब बताता भी है, और घर में पढ़ता भी है, इसलिए ही वो first  आ गया।

अब से नीति ने भी अपनी mumma को सब बताना शुरू कर दिया, और घर में पढ़ना भी शुरू कर दिया, अब वो फिर से first आने लगी। 

Thursday, 26 April 2018

Article : “सोन चिरईया “

                       “सोन चिरईया "





आज स्मरण हो आई वह प्रभात जब कानों में मां की आवाज के बाद गौरैया के चहचहाने की आवाज अरुणोदय की शीतलता को और बढ़ा देती थी। आंखें मलते मलते जब आंगन में आ कर बैठते थे, तो इधर उधर फुदकता गौरैया का झुंड आमोद-प्रमोद के साथ सुबह के नाश्ते का आनंद उठा रहा होता था, जो माँ ने उनके लिए डाले होते थे। कुछ आँगन में यहां से वहां, कुछ आम के पेड़ों की डाल पर, कुछ हौज़ के मुंडेर पर, कुछ खटिया की पाटी पर डोल रही होती थी। कितनी आश्वस्त और  भयमुक्त जैसे अपने

परिजनों के संग हों। बबुनी, बुच्ची, लाडो, बाबा जी  के तमाम संबोधनों में मेरे लिए “सोन चिरईया “ भी शामिल हुआ करता था ।कितने मनोरम थे वे दिन .....1999 में शादी के बाद जब ससुराल के दर्शन हुए तो फूलों की बगिया और आँगन जैसे ईश्वर ने सौगात में दिए हो मुझे। अब भोर में केवल गौरैया के चहचहाने की आवाज ही शेष रह गई थी, जो माँ की आवाज का स्मरण भी करा दिया करती थी। उन दिनों भी चिड़िया का झुंड पूरे आंगन में बेखौफ घूमता नजर आता था। कभी वाश बेसिन के शीशे पर अपने प्रतिबिंब को चोंच मारते हुए, कभी चारदीवारी पर चढ़कर इधर-उधर निहारते  हुए  और कभी कूलर पर। चीं चीं  के कलरव से पूरा आँगन गुलज़ार रहता था। अपनी माँ और सास दोनों को ही यह कहते सुना था कि  गौरैया का आगमन शुभ होता है। खुशहाली और समृद्धि लाता है।....पर क्या हम अपने नौनिहालों को गौरैया के आगमन का महत्व बता पाएँगे? क्या हमारे बच्चे गौरैया के चहचहाने का, उनके आश्वस्त होकर इधर-उधर फुदकने का आनंद उठा पाएँगे ? क्या वह उस कौतूहल को महसूस कर पाएंगे जब माँ गौरैया अपनी चोंच से अपने बच्चों को खाना खिलाती थी? शायद नहीं!
 ...ये कैसी विडंबना है कि जिस मोबाइल पर 20 मार्च 
‘ चिड़िया दिवस’ के संदेश इधर से उधर भेजे जा रहे थे, उसी मोबाइल कंपनी के बढ़ते एंटीना और ट्रांसमीटर टॉवरों से जो विद्युत चुंबकीय विकिरण पैदा होता है वह गौरैया के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण माना गया है। ....भौतिकता की अंधी दौड़, मानव का निजी स्वार्थ, पेड़ों की कटाई, कंक्रीट के जंगल और ख़ामोश मृतप्राय सभ्यता ने  ईश्वर की इतनी सुंदर कृति का अस्तित्व ही ख़तरे में डाल दिया है। .....
आह! कितनी सार्थक प्रतीत होतीं हैं वर्तमान में प्रचलित गीत की ये पंक्तियाँ ....” ओ री चिरईया , नन्ही सी चिड़िया , अँगना में फिर आ जा रे .... “
                          लेखिका : ऋतु श्रीवास्तव

Disclaimer:


इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Wednesday, 25 April 2018

Story of life : बहू–बेटी (भाग-2)

अब तक आपने पढ़ा, दिव्या ने अपने ससुराल मेँ क्या व्यवहार किया, अब आगे
                     
           बहू–बेटी (भाग-2)   


स्नेहा ने आते ही ससुराल का सारा कार्यभार संभाल लिया, सारे काम खत्म करके वो ऑफिस निकाल जाती, और घर आते ही सारे काम निपटा डालती, व्यवहार भी उसका इतना अच्छा था कि, अब रंजना के घर दोस्तों रिश्तेदारों का तांता ही लगा रहता था, पर हाँ रविवार के दिन स्नेहा को जल्दी उठना बिलकुल पसंद नहीं था, ना उस दिन उसे  काम करना पसंद था, क्योंकि, उस दिन वो अपने पति और परिवार के साथ पूरा समय बिताना पसंद करती थी- दिन में कहीं घूमने जाना और रात में साथ dine-out.

पर रंजना को ये सब पसंद नहीं था, उसे बर्दाश्त नहीं था कि स्नेहा, एक दिन भी मस्ती करे, काम ना करे।

वो, उसके हर काम में मीनमेक ही निकालती रहती, सब से कहती फिरती, ना जाने कैसी कुलछनी बहू मिली है, इसे तो बस आराम चाहिए, सुबह 9 बजे से पहले तो ये मैडम उठेंगी नहीं, फिर घूमने निकल जाएंगी, दुनिया का पैसा बर्बाद करेंगी, सो अलग, इनसे तो बस ऐश करवा लो, और तो और मेहमानों की भी लाइन लगवा दी है।   

एक दिन स्नेहा का ऑफिस से आते समय accident हो गया, पैर में काफी चोट आई थी, रंजना ने उसे तुरंत उसके मायके भेज दिया। रंजना, स्नेहा की एकदम भी सेवा नहीं करना चाहती थी।

स्नेहा, हफ्ता भर के लिए पहली बार आई थी, वरना वो रजत के साथ जब आती थी, तो एक दिन में ही लौट जाती थी, रंजना एक दिन से ज्यादा स्नेहा को रुकने ही नहीं देती थी, पहले ही कह के भेजती थी, मिलने जा रही हो,  रहने के लिए रुक ना जाना।

हफ्ते भर मे उसका घाव भी भर आया था, आज दिव्या का स्नेहा के पास फोन आया था,
कैसा पैर है स्नेहा?

दीदी, अभी तो आराम है।

तो वहाँ क्या कर  रही हो, माँ और भाई को कितना परेशान करोगी, अब वापस भी आ जाओ।

ये सुन कर स्नेहा की माँ सन्न रह गयी, क्या बिना दुख दर्द के बेटी माँ के पास नहीं रुक सकती?
स्नेहा वापिस चली आई।

दिव्या भी आई हुई थी, एक भी काम को तो वो वैसे भी हाथ नही लगाती थी, पर स्नेहा को देख कर तो उसके हाथ पैर बिलकुल भी नहीं चलते थे।

हर काम के लिए स्नेहा को आवाज़ लगा देती, पैर की चोट के कारण स्नेहा, उतनी फुर्ती से काम नहीं कर पा रही थी, तो दिव्या उससे ये कहने से नहीं चूकी, स्नेहा तुम्हारे पैर का नाटक कितने दिनों तक चलेगा, रंजना ने भी ये कह कर कि, स्नेहा तो है ही कामचोर दिव्या का ही साथ दिया।

आज रजत की सहनशक्ति ने जवाब दे दिया था, उसने माँ और बहन दोनों को आड़े हाथ लिया।
जब उसके पैर मे चोट लगी है तो, क्या दीदी एक ग्लास पानी भी अपने आप नहीं ले सकतीं हैं?
माँ अच्छा है, स्नेहा की माँ आप नही हैं, अगर होती, तो जो हाल दीदी के ससुराल का है, वही यहाँ का भी होता।

मैं तो धन्य हो गया, जो मुझे स्नेहा मिली है, घर का सारा काम इसने संभाल लिया है, इसके आने से किसी को कोई काम नहीं करना पड़ता है। जिन लोगो ने बरसों से हमारे घर आना छोड़ दिया था, वो आज हम से फिर जुड़ गए हैं।

क्या हुआ अगर वो एक दिन रविवार को आराम करना चाहती है, इंसान है, मशीन नहीं, उसकी ऐसी सोच ने ही हम सबको साथ समय गुजरने का मौका दिया है, उसी कारण से हम लोग एक दूसरे को अब ज्यादा समझने लगे हैं।

माँ, बहू भी बेटी बन सकती है, जब उन्हें इस संस्कार के साथ भेजा जाए, कि जिस घर जा रही हो ,वो तुम्हारा अपना घर है, तुम्हें ईश्वर ने वो वरदान दिया है कि, तुम्हारे दो माता-पिता, भाई बहन हैं, ये घर परिवार छूटा नहीं है, बल्कि एक और घर परिवार मिल गया है।

और ससुराल वालों को भी ये ही सोचना चाहिए, कि उन्हें एक और बेटी मिल गयी है, जिसको उन्हें उतने ही जतन से रखना है, जैसे अपनी बेटी को रखते हैं।

साथ ही बहू बेटी दोनों का सही गलत एक ही तराजू में रखना होगा, दोनों में से जो कुछ गलत करे तो उसे ठीक करें और दोनों में से जो भी कुछ सही करे, तो उसकी तारीफ करें।  

जब बहू बेटी दोनों को एक सा मान और प्यार मिलेगा, और बेटियाँ भी बहू बन कर दोनों घर को एक सा मान और प्यार देंगी।

तब न बहू होगी न बेटी होगी,मायका होगा ना ससुराल।

होंगे तो बस दो खुशहाल परिवार।