Sunday, 11 November 2018

Story Of Life : क्यूँ नहीं वो स्वाद - (भाग -२)

क्यूँ नहीं वो स्वाद - (भाग -२)


अब तक आप ने पढ़ा,अनंत के घर खाना बनाने वाली खाना बनाती है, वो बहुत अच्छा खाना बनाती है, फिर भी अनंत को कुछ कमी सी लगती है..... अब आगे   
रात को अनंत माँ के कमरे में आ गया, और उनसे पूछने लगा। माँ आप ने भी तो वही सब डाला था, जो कुंता दीदी डालती है, तो स्वाद में अंतर क्यूँ था?

नहीं बेटा, खाना मसाले से नहीं भाव से बनते हैं। और हम दोनों के खाने में उसी का अंतर था।
माँ मैं कुछ समझा नहीं? देख बेटा जब मैं आटा गुँधती हूँ, तो जो तुम्हें पानी दिखता है, वहाँ मेरा प्यार होता है, जिससे मैं आटा गूँध रही होती हूँ।

जब सब्जी बनाती हूँ, तब मेरे मन में ये भाव रहते हैं इसे मेरा बच्चा खाएगा, तो ऐसी सब्जी बने कि वो उसे बहुत ही स्वादिष्ट लगे। उसके लिए चूल्हे की मद्धम आंच रखनी होती है और थोड़ी आंच अपने प्यार की देनी होती है। 

वो दो रोटी ज्यादा खा ले, पर भूखा नहीं रहे। और मेरा बनाया खाना ऐसा हो, कि इसे खाकर मेरा बच्चा सेहतमंद हो जाए। उसके लिए सही मात्रा में तेल मसाले डालेंगे। जो बच्चे को नहीं पसंद है, उसे नहीं डालेंगे।  

जबकि जो खाना बनाने आती हैं, वो इस सोच में आती हैं, कि जल्दी से खाना बने, और वो अपने घर जाएँ, अपने बच्चों के पास। उसके लिए वो जल्दी जल्दी तेज़ आंच पर खाना बनाएँगी, उसके लिए वो ज्यादा तेल मसाला डाल देती हैं। 
उससे खाना जल्दी बन जाता है, उन्हें सेहत की कोई परवाह नहीं रहती। और अगर उनसे एक भी ज्यादा रोटी बनाने को बोल दो तो, वो तुरंत टाइम देखेंगी। अब और नहीं बना पाऊँगी, कल जल्दी आकर करती हूँ। और वो कल आए, ऐसा ये कभी नहीं चाहती हैं। अनंत को कुछ समझ आया और कुछ नहीं। 

आज माँ को लेकर नीति हॉस्पिटल गयी थी। मैं घर पहुंचा, तो पाया, आज कुंता दीदी नहीं आयीं थी। फोन किया तो, वो बोली साहब, आज सिर्फ आपका ही खाना बनना है, माँजी और मेमसाहब तो वहीं खाएँगी, आप मेरे घर से खाना ले जाइए। आज मेरा मुन्ना बीमार है। रहने दीजिये, मैं मैनेज कर लूँगा। अरे साहब, आज हम गरीबों के घर का ही बना खा लीजिये, मैंने आपके लिए भी बना लिया है।

मैं वहाँ से खाना ले कर आ गया। आज के खाने में माँ के हाथ जैसा ही स्वाद था। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, कि ऐसा खाना ये घर में क्यूँ नहीं बनातीं हैं। उनके घर से ज्यादा अच्छे तेल-मसाले और सब्जी हम देते हैं।

तभी माँ भी आ गईं। क्या हुआ? तू इतने गुस्से में क्यूँ है? माँ आप खाना खाइये, आज मैं कुंता दीदी के घर से खाना लाया हूँ। इसमें बिलकुल आपके हाथ जैसा ही स्वाद है।

होगा ही बेटा, वो खाना उन्होंने अपने बेटे के लिए जो बनाया है, तो वो उसी भाव में बना होगा जिसमें मैं तुम्हारे लिए बनाती हूँ।

आज समझ आया, कि माँ क्या समझा रहीं थीं। माँ के हाथ के खाने जैसा स्वाद क्यूँ नहीं आता है। वैसे भी जहाँ भी प्यार होगा, हीं संतुष्टि और तृप्ति रहेगी।

Saturday, 10 November 2018

Story Of Life : क्यूँ नहीं वो स्वाद

क्यूँ नहीं वो स्वाद


अनंत और नीति दोनों ही job करते हैं। तो खाना बनाने के काम को manage करना बहुत difficult होता था। तभी पड़ोस की भाभी जी से नीति की बात हुई। वो बोली, कुंता मेरी खाना बनाने वाली अच्छा खाना नाती है, मैं उसे भेज दूँगी।
उन्होंने उसे भेज दिया। साफ-सुथरी सी अच्छे स्वभाव की थीं वो। उम्र में बड़ी थीं, तो हम उन्हें दीदी कह कर बुलाते थे। Time की बड़ी ही पाबंद थीं। खाना भी अच्छा ही बनाती थीं। पर ना जाने क्यूँ, वो स्वाद नहीं आता था।
समय यूं ही कट रहा था। एक दिन माँ ने बताया कि वो आ रही हैं। मैं उन्हें लेने station पहुंच गया। माँ देखते ही गले लग गयी। रास्ते भर माँ से घर की ही बात हो रही थी। वो बोली, बहू बता रही थी, अच्छी cook मिल गयी है। तब क्या हो गया रे? तू क्यूँ दुबला हो रहा है? वो अच्छा खाना नहीं बनाती है?
नहीं माँ, कुंता दीदी तो अच्छा खाना ही बनाती हैं। पर ना जाने क्यूँ वो स्वाद नहीं आता है। मन संतुष्ट नहीं होता है।
अच्छा चल, मैं आ गयी हूँ, मैं ही बना के कुछ दिन खिला दूँगी। अरे, नहीं माँ, आप यहाँ आराम करने के लिए आयीं हैं। मेरी तो छोड़ दीजिये, नीति भी आपको खाना नहीं बनाने देगी। हाँ घर तो चल, मैं बात कर लूँगी बहू से भी।
घर पहुंचे, तो नीति भी जल्दी ही आ गयी थी। उसकी मुझसे भी ज्यादा माँ से पटती थी। जब माँ ने उसे देखा, तो गुस्सा ही हो गईं। नीति तुम लोगों ने क्या हाल बना लिए हैं। कैसे लग रहे हो? अब जब तक मैं हूँ। खाना मैं ही बनाऊँगी। नीति बोली माँ, आप खाना बनाने के लिए हमें जबरदस्ती डांट ना लगाएं। हम बिलकुल ही ठीक हैं। अनंत तो हैं ही ऐसे, आपको देखेंगे और बस आपके हाथ का ही खाना चाहिए।
अच्छा एक दिन छोड़ के बना दूँगी, माँ ने कहा। नीति बोली-अच्छा आप तीन दिन के gap में बनाएँगी। और हाँ वो भी एक दम हल्की-फुलकी चीज़ें। ठीक है मेरी माँ, आराम ही कराती रहा कर मुझे, माँ ने प्यार से नीति के सिर पर हाथ फेरा।
तीन दिन बाद माँ ने रोटी और आलू- टमाटर की सब्जी बनाई। उस दिन अनंत ने दो और नीति ने एक रोटी ज्यादा ही खा ली। और तृप्ति तो ऐसी हुई, कि लगा ये स्वाद तो, 5 स्टार के खाने में भी नहीं आता है।
रात को अनंत माँ के कमरे में आ गया, और उनसे पूछने लगा। माँ आप ने भी तो वही सब डाला था, जो कुंता दीदी डालती है, तो स्वाद में अंतर क्यूँ था?
नहीं बेटा, खाना मसाले से नहीं, भाव,से बनाते हैं। और हम दोनों के खाने में उसी का अंतर था।
माँ मैं कुछ समझा नहीं?

माँ ने अनंत को क्या समझाया, जानते हैं, क्यूँ नहीं वो स्वाद भाग -२  में 

Friday, 9 November 2018

Kids Story : मिठास नहीं आई


मिठास नहीं आई


माँ, माँ चिल्लाता हुआ राजू अपनी माँ से चिपक गया। बोला माँ, बाबा क्या काम करते हैं? क्यूँ, क्यों जानना है तुझे? चल भाग यहाँ से, मुझे काम करने दे। माँ मैं अपने दोस्तों के साथ ही खेल रहा था, कि हरिया बोलने लगा कि राजू तेरे बाबा तो गन्ना बोते हैं। उनसे हम सब दोस्तों के लिए 15-20 गन्ने ले के आ आना, सब दोस्तों की मीठे की दावत हो जाएगी।
उसने कहा, और ये भोलेशंकर चले आए, मांगने। ये हरिया तो है ही एक नंबर का लालची, और मुफ्तखोर, अरे राजू तेरी क्या शादी हो रही है? जो तेरे दोस्तों को दावत चाहिए। 
पर माँ, बाबा करते क्या हैं? हाँ वो गन्ना किसान ही हैं। तो क्या कुछ गन्ने हमे नहीं मिल सकते? राजू ने मासूमियत से भरकर पूछा।
बेटा, दोस्तों को यूंही खिलाता रहेगा, तो हमारे पास खाने को क्या रहेगा? इस बार गन्ने की फसल अच्छी हुई है, अगर इस बार मिल वाला सही पैसे दे दे तो, शायद तेरे बाबा तुझे दिवाली में कुछ मीठा खिला सकें। कब से फटी कमीज़ पहन रहा है, शायद नई कमीज़ दिला सकें। माँ तेरी साड़ी भी तो जगह जगह से सिली हुई है। वो पहले चाहिए। मैं कमीज़ तो फटी भी पहन लूँगा। मिठाई अगली दिवाली में भी खा लेंगे, अपने मुँह में आते हुए पानी को वो रोकता हुआ बोला।
माँ, मैं तेरे पास ही रुक जाता हूँ, खेलने नहीं जाऊंगा, क्योंकि अब तक तो हरिया सबको बोल चुका होगा, कि मैं गन्ना ले कर आ रहा हूँ।
माँ पर बाबा कहाँ हैं? बेटा वो दिल्ली गए हैं। दिल्ली, पर दिल्ली क्यों? सरकार से मांग करने कि, जो किसान सबके लिए मीठा उगाता है। उसके बच्चे को रोज मीठा ना मिले पर, कम से कम वो रोज रोटी तो खा सके। उनके पास ढेरों कपड़े ना हों, पर बदन पर कपड़ा तो हो। उसके पास आलीशान बंगला न हो, पर एक छोटी सी झोपड़ी तो हो ही, जिसमें वो परिवार को मौसम के थपेड़ों से बचा सके।
दो दिन तक राजू खेलने नहीं गया, बाबा का घर में ही इंतज़ार करता रहा।
रघु बहुत ही हताश सा घर में आया। क्या हुआ जी, आप इतने उदास क्यों लग रहे हैं? क्या बताऊँ राजू की माँ, हम लोगों को दिल्ली जाने ही नहीं दिया गया। सब तरफ रोक लगा दी गयी थी। हर बार की तरह, इस बार भी सारा फायदा मिल मालिकों तक ही सीमित रह गया है। सरकार जो भी छूट और सुविधा देती है, उसका सारा फायदा मिल मालिकों को ही मिलता है। और इस बात की कोई भी सुध नहीं लेता है, कि हम किसानों तक भी वो सुविधा पहुँच रही है, कि नहीं। राजू वहीं खड़ा सब सुन रहा था। वह मासूम दुखी होकर रोने लगा। रघु, उसे रोता हुआ देख कर बोला, क्या करें बेटा! मिल मालिकों की तो हर बार दिवाली है। और जिनके कारण हर घर में मिठास आती है। उनके यहाँ इस बार भी मिठास नहीं आई।