Wednesday, 15 March 2023

Story of Life: मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3)

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-1) 

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2)

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3) 


अपने मायके में सबसे देर से उठने वाली रैना, आज उठकर, नहा-धोकर तैयार थी। 

शायद सबने उसकी सास का जो खाका खींचा था, उसी का असर था। 

संयम के साथ रैना भी पूजा के लिए मंदिर में आ गई थी और आते से ही सबके चरणस्पर्श करने लगी।

ठहर जाओ बहू, हमारे घर में सबसे पहले ठाकुर जी के चरणस्पर्श करते हैं, उनकी पूजा अर्चना करते हैं, उसके बाद ही किसी और के पैर छूते हैं। 

जब भजन कीर्तन शुरू हुआ तो रैना से भी भजन गाने को कहा गया, तो उस ने कान्हा जी का एक बहुत ही सुरीला भजन गाया।

सब वो भजन सुनकर मंत्र मुग्ध हो गये।

बहू को सुबह सुबह मंदिर में देखकर और भजन सुनकर, सब गायत्री जी से बोली रहे थे। मान गए जिज्जी, आपको बहुत ही संस्कार वाली बहू मिली है।

गायत्री जी, बड़े गर्व और प्यार से रैना की तरफ देख थी।

आज पहली रसोई भी थी, पर रैना को कुछ समझ नहीं आ रहा था, ऊपर से नींद के झोंके आ रहे थे, सो अलग।

अभी वो सोच ही रही थी कि क्या बनाए, तब तक गायत्री जी अंदर आ गई थी।

वो बोलीं, बिटिया हमने बहुत सारी चीजों की तैयारी कर दी है, तुम बस झटपट सब गर्म करके अच्छे से लगा दो। 

मीठा तो तुम्हें ही बनना होगा, पर हां सूजी भी भूनी रखी है, उसमें चीनी भी मिली रखी है, तुम उसे खूब सारे घी और मेवे के साथ तैयार कर लो।

हम जा रहे हैं, नहीं तो सबको लगेगा हम ही सब कर रहे थे।तुम सब लाकर dinning table सजा देना...

यह कहकर गायत्री जी चलीं गईं पर रैना के लिए सब आसान कर गईं।

कुछ देर में ही रैना ने सारी dinning table सजा दी। सबने जब नाश्ता खाया तो हर तरफ से वाह-वाह के स्वर सुनाई दे रहे थे। 

अरे भाई संयम, तुम्हारी पत्नी ने तो पहले ही दिन में मैदान जीत लिया।

सच भाभी, बड़े गुणों वाली बहू ढूंढी है आपने संयम के लिए।

रैना को झोली भर भर कर आशीर्वाद और नेग मिल रहे थे। 

आज रैना को जो भी तारीफ मिल रही थी, उसमें गायत्री जी का भी हाथ था। पर उन्होंने वो किसी को नहीं बताया...

एक से दो दिन में सारे मेहमान चले गए। पर सुबह चार बजे उठने का नियम नहीं बदला...

पर बस सुबह उठकर नहा-धोकर पूजा अर्चना ही करना होता था, बाकी के काम तो सुघड़ गायत्री जी इतनी जल्दी निपटा देती थीं कि जब तक कोई सोचे कि क्या काम करना है, काम ख़त्म हो चुका होता था। 

घर के काम निपटने के चंद घंटे बाद से ही लोगों का तांता लगने लगता था, कोई मुहूर्त पूछने आता, कोई पूजा पाठ के नियम कानून... 

आस-पास कहीं भी कोई भी पूजा पाठ व्रत त्यौहार होते और मां के नाम की गुहार लग जाती। 

मां नियम कानून में रची-बसी ही दिखती। रैना समझ गई थी कि उसकी सास का कितना मान है, साथ ही कि बस नियम कानून पर विशेष ध्यान देना है और जीवन सुखद रुप से कट जाएगा।

एक हफ्ते में रैना को सुबह उठने से परेशानी होना बंद हो गई थी बल्कि अब तो उसे सुबह उठने के फायदे नज़र आने लगे थे। 

उसको बचपन से ही सिर दर्द की परेशानी थी, जो अब जल्दी उठने के कारण ठीक हो गई थी।

संयम को वापस दिल्ली लौटना था, उसने मां से कहा कि, मुझे जाना होगा।

मां बोली, अकेले जाएगा कि बहू को भी ले जाएगा? 

आगे पढ़े मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-4) में....

Tuesday, 14 March 2023

Story of Life : मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2)

 मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-1) के आगे...

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2)



तभी रैना को अपनी हमउम्र एक लड़की ने पीछे से थपथपाया, क्या सोच रही हैं भाभी? भैया को ढूंढ रही हैं निगाहें?

तो रहने दीजिए, कुछ भी मत सोचिए। आपको बता दूं, भैया आपको सारी रस्मो-रिवाज के पूरे होने से पहले नहीं मिलेंगी दूसरा यह आपका कमरा नहीं है।

मेरा कमरा नहीं है?

हां, सारी रस्मो-रिवाज होने तक आप हम सब औरतों के साथ ही रहेंगी और जब तक यहां रहेंगी, मज़े में रह लीजिएगा।

एक बार इस कमरे से बाहर आ गई तो फिर नियम कानून से बंध गई।

नियम कानून...! 

हां भाभी, बुआ जी नियम कानून की चलती फिरती  पाठशाला हैं। पूजा पाठ से जुड़ी कोई जिज्ञासा ऐसी नहीं होगी, जो वो शांत ना कर दें।

हम हिन्दुओं के धर्म कर्म, नियम की समस्त ज्ञाता हैं...

तभी बाहर से आवाज़ आई, रेखा भाभी को सारा ज्ञान आज ही दे देगी या कुछ उसे खुद भी समझने देगी। चल इधर आ कर कल की तैयारी करवा ले...

अभी आई, कहकर रेखा भाग गई.. 

रेखा के बताने से कमरे की बात तो पता चल गई। पर अब रैना को संयम का कोई इंतज़ार नहीं था। क्योंकि वो तो वैसे भी सारी रस्मो-रिवाज के बाद ही मिलने थे।

पर अब उसे इस बात की curiousity ज्यादा थी कि दो दिन बाद, ऐसे भी क्या नियम कानून होंगे जो जिंदगी बदल जाएगी...

रात में सभी औरतें सोने के लिए आ गई। सभी के लिए बहुत अच्छी व्यवस्था थी पर सबसे ज्यादा ध्यान रैना का रखा जा रहा था।

दो दिन बाद ही मुंह दिखाई थी, सुबह से ही घर लोगों से खचाखच भर गया। और सुबह से ही रस्म भी शुरू हो गई, जो कि रात होते होते ही पूरी हुई...

आज रैना को उसका अपना कमरा दिखा दिया गया। कमरा बहुत ही सुन्दर और व्यवस्थित था।

रात में संयम भी आ गया। दोनों के प्रेम की मिलन बेला आ गई थी। 

सोने से पहले संयम ने रैना से कहा, सुनो सुबह चार बजे उठ जाना और हां नहाकर तैयार हो जाना, भोर की आरती के लिए..

चार बजे...चार बजे कौन सी सुबह होती है? उस समय तक तो सूर्य देव भी नहीं निकलते...

हमारे यहां यही नियम है, मां की मंदिर की घंटी के साथ ही सुबह हो जाती है। वही सबका उठने का और पूजा के लिए तैयार हो जाने का Alarm होता है... 

और हां ध्यान रखना इस बात का, मां का बहुत मान है सब लोगों में, तुम्हारे कारण कम ना होए...

यह कहकर संयम तो सो गया, पर रैना को नींद नहीं आ रही थी। वो तो 7 बजे से पहले कभी उठी ही नहीं थी। 

मम्मी कभी कहती भी थीं कि रैना जल्दी उठ जा, तो वो यही कहती, 7 बजे के बाद ही तो सुबह होती है और उसके पहले रात... और रात तो सोने के लिए होती है.. 

पर मां और मायके की तो बात ही अलग होती है... यहां उसकी कौन समझेगा? 

मम्मी-पापा आप ने कैसी जगह मेरी शादी कर दी!.. रैना मन ही मन दुखी होते हुए सोच रही थी।

नया घर, नये नियम... 

फिर मम्मी-पापा ने भी तो कहा था कि अब से वही तुम्हारा घर है, वहां जैसा होता है, वैसी ही तुम भी ढल जाना...

सोचते सोचते, रैना की कब आंख लग गई, उसे भी नहीं पता चला...

सुबह के चार बज गए और बज गई मां के मंदिर की घंटी...

आगे पढ़े मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3) में...

Monday, 13 March 2023

Story of Life : मेरी सास ही मेरी सांस

 मेरी सास ही मेरी सांस 


अल्हड़, शोख, चंचल रैना, ने जवानी की दहलीज पर कदम रख दिया था। 

वो इतनी हसीन थी कि हर जगह से उसके लिए रिश्ते आ रहे थे। पर उसके मां-पापा उसके लिए सुयोग्य घर-वर की तलाश कर रहे थे।

एक दिन उनका इंतज़ार ख़त्म हुआ, जब एक संस्कारी और पूजा-पाठी परिवार से रिश्ता आया। संयम एक सरकारी कम्पनी में उच्च पद पर आसीन था। 

बहुत धूमधाम से विवाह समारोह संपन्न हुआ, मां-पापा ने अपनी लाडली को, ससुराल से जुड़ने उसे अपना परिवार समझना, जैसे सुसंस्कारों के साथ, खुशी खुशी विदा कर दिया।

अपने मायके से अपने ससुराल आने तक रैना ने अपना मन बना लिया कि आज से यही मेरा परिवार है और यही मेरी दुनिया...

बहुत ही भव्य तरीके से उसका स्वागत हुआ, उसके स्वागत में ढोल नगाड़े, शहनाई आदि बजाए गये। द्वार पर आरती और नजर उतारने के लिए ही बहुत सारी औरतें थाल सजाए खड़ी थीं। मंगलाचार के साथ गृहप्रवेश हुआ। 

गृह प्रवेश के साथ ही बहुत सारी रस्मो-रिवाज प्रारंभ हो गये।

रैना के घर में बहुत सी शादियां हुईं थीं, पर इतनी रस्में तो, किसी की शादी में नहीं देखने को मिली थी कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। 

वैसे उसका एक और कारण भी था, हर रस्म को करने वाले लोग भी बहुत थे। ऐसा लग रहा था कि मानो स्वागत के लिए पूरे शहर को बुला लिया है। 

वो लोग सुबह 10 ही घर आ गए थे और अब शाम के आठ बजने वाले थे। 

तभी सासू मां ने कहा, सब भोजन ग्रहण कर लें जितने लोग, आज रस्में पूरी  नहीं कर पाएं हैं, वो दो दिन बाद मुंह दिखाई की रस्म में आकर रस्म पूरी कर लें।

सभी भोजन ग्रहण करने करने चले गए, और रैना के लिए भी थाली सजकर आ गई। 

और उसके बाद रैना को एक कमरे में आराम करने के लिए भेज दिया गया। 

उस कमरे में बहुत सारे गद्दे बिछे हुए थे। रैना को कुछ सूझ नहीं रहा था कि आखिर यह किस कमरे में उसे आराम करने को कहा गया है, जहां एक नहीं बल्कि बहुत से गद्दे बिछे हुए थे।

आगे पढ़े, मेरी सास ही मेरी सांस (भाग - 2) में...