Friday, 13 January 2023

Story of Life: House number 1303 (भाग-5) अंतिम भाग

House number 1303 (भाग-1) ,

House number 1303 (भाग-2),

House number 1303 (भाग-3) व

House number 1303 (भाग-4) के आगे...

House number 1303 (अंतिम भाग)




सब सही कहते हैं कि वो घर मनहूस है, महा मनहूस.... उसके बाद उसने पलट कर नहीं देखा, बस पकड़ कर सीधे गांव निकल गया।

रमन की बातों से चौकीदार भी थर-थर कांपने लगा और अपने घर को निकल गया...

रमन के जाने के दो दिन बाद, महेश गांव से लौट आया...

महेश गांव से लौटते ही सीधे, रतन से मिलने पहुंचा। वहां उसने देखा, कमरा खुला पड़ा है और रतन वहां नहीं है, कमरे में सामान अस्त-व्यस्त है। बल्ब टूटा हुआ है, साथ ही रतन के सामान और कपड़े भी वहीं पड़े हुए हैं।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या, रतन कहां चला गया?

इसी उधेड़बुन में वो building के चौकीदार से टकरा गया।

चौकीदार बोला, अरे! महेश तुम्हारे दोस्त ने कल भूत देखा था और वो यहां से आनन-फानन भाग गया। 

बल्कि वो जैसे बदहवास सा भाग रहा था, उसे देखकर मैं भी डर कर घर जल्दी चला गया। 

अच्छा, यह बात है। मैं आज ही रतन से बात करुंगा, कि भूत - वूत तो कुछ नहीं होता है,  कहकर महेश चला गया।

महेश घर आ रहा था, तो उसे उसका दोस्त कार्तिक बोला, अरे महेश तुम दो दिन से कहां थे?

गांव गया था...

अरे, दो दिन पहले दिल्ली में ऐसा भूकंप आया था कि उसने घर के सामान इधर-उधर कर दिए। 

भूकंप! अच्छा...  चल मैं तुझसे फिर बात करता हूं। 

कहकर वो तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गया।

उसने घर पहुंच कर रतन को फोन लगाया। 

रतन ने फोन उठाया और महेश पर बरस पड़ा, खूब दोस्ती निभाई दोस्त, मुझे भूतों के बीच फंसाकर खुद गांव भाग गया...

नहीं रतन तूने मुझे ग़लत समझा, मेरे दादा जी, गुज़र गए थे, इसलिए मुझे आनन-फानन गांव जाना पड़ा। 

ओह! हां, महेश, ऐसे में तो आनन-फानन ही जाना पड़ता है।

पर तू यह बता, तूने कौन से भूत देख लिए? क्या हुआ तेरे साथ, जो तू, अपना सामान तक यहां छोड़कर, कमरा खुला छोड़कर भाग गया?

अरे, तेरा वो महा-मनहूस 1303 वाला घर, जिसमें आगे 13 और पीछे 3, उसमें कल रात वही आए थे, जो वहां रहते हैं।

कौन रहते हैं? क्या पहेली बुझा रहा है? किसे देखा तूने वहां?

अरे भूत और कौन?

तुझे भूत दिखाई पड़े?

भूत कौन से दिखाई देते हैं, जो मुझे दिखते... 

पर, मुझे भगाने के लिए, उनका तांडव जरुर दिखा।

तांडव! कैसा तांडव? 

कल जब मैं सो गया था, तो पहले बल्ब टूटा, फिर सब सामान इधर से उधर सरकने लगे। बिल्ली के रोने की आवाज़ और भी जाने कैसी-कैसी भयानक आवाज़ें थी...

अच्छा अब मेरी बात सुन, पहले तो कोई नम्बर मनहूस नहीं होता है। यह सब वहम है...

दूसरा उस दिन भूकंप और आंधी-तूफान आया था, जिससे तुझे सारा कुछ लगा।, सामान इधर-उधर होना, तेज़ हवा के कारण, अजीबो-गरीब आवाज़, जानवरों को प्राकृतिक अपदा पहले समझ आ जाती है, इसलिए ही बिल्ली के रोने की आवाजें आ रही थी..

भूकंप, आंधी-तूफान...

हां 5 sec. के लिए भूकंप आया था... और उससे सिर्फ उस कमरे के सामान इधर-उधर नहीं हुए, बल्कि ऊपर वाली, जितनी भी मंजिलें थी, सबके सामान हिले थे।

ओह! एक तो हमारे गांव में भूकंप नहीं आता है,और ऐसा तो कभी नहीं आया कि सामान हिल जाए।

भैया माफ कर दो, हम लोगों की बातों में पड़कर, बेकार ही तुम्हारे घर को बदनाम कर दिए।

पर एक बात और बताएं, शहर आकर हमें एक और बात पता चली कि, जीवन को चलाने में जितना संघर्ष गांव में करना पड़ता है, शहर में उससे ज्यादा करना पड़ता है। साथ ही गांव में जो सुकून है, वो शहर में नहीं...

इसलिए हमारा सामान, गांव भिजवा देना, किसी के साथ, हम नहीं आएंगे अब शहर...

गांव में, अपने घर में जो सुख है वो परदेस में नहीं...

रतन की आंखें खुल चुकी थी कि मनहूस कुछ नहीं होता है, साथ ही गांव से और अपने घर से अच्छा कुछ नहीं...

रतन को महेश ने माफ़ कर दिया, और उसका सामान गांव भेज दिया, साथ ही यह भी कहा, तुम भाग्यशाली हो कि अपने गांव लौट गए...

Thursday, 12 January 2023

Story of Life: House number 1303 (भाग-4)

House number 1303 (भाग-1) ,

House number 1303 (भाग-2) व

House number 1303 (भाग-3) के आगे...

House number 1303 (भाग-4) 



आज की रात कुछ ज्यादा ही काली और ठंडी था, सन्नाटा पसरा हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सुहा रहा था, जिस कारण हर छोटी से छोटी आवाज़ें भी बहुत तेज सुनाई दे रही थी। 

आवाज़ तेज सुनाई देने का कारण यह भी था कि कमरे की खिड़की ठीक से बंद नहीं होती थी।

सुबह से घर को लेकर इतनी बातें सुन सुनकर, रतन को भी घर अजीब सा लगने लगा था... 

रतन सोने के लिए जाने लगा तो आज, उसने कमरे के, दोनों bulb खोल दिए, एक तार के साथ झूलता हुआ 80 watt का और एक zero watt का night bulb, क्योंकि आज वो तेज़ रोशनी चाह रहा था। 

कहते हैं ना जब मन के अंदर का अंधेरा बहुत डरा रहा हो तो, बाहर की रोशनी बढ़ा देने से डर कुछ हद तक कम हो जाता है।

अभी रतन को झपकी लगी ही थी, कि थोड़ी ही देर में कमरें में रखे हुए सामान, हिलने लगे। झूलता हुआ bulb, बार-बार दीवार से टकरा रहा था, और अंततः टूट गया।

Bulb टूटने की आवाज़ से रतन की नींद टूट गई। कमरे में रोशनी कम हो गई थी।

कमरे में रखे हुए सामान, अभी भी हिल रहे थे, कुछ अब इधर से उधर सरकने भी लगे।

इन सबको देखकर, रतन डरने लगा। तभी एक बिल्ली के रोने की आवाज़ आने लगी।

साथ ही हवा चलने की आवाज़ और खिड़की के बंद खुलने का शोर, सब मिलकर कमरे को बहुत भयावह बना रहे थे। 

रमन के कान में माँ की कही बात और बाकी सबकी बातें गूंजने लगी।

मनहूस... महामनहूस.... 

उसे लगा, उसे महेश की बातों में नहीं आना चाहिए था। उसका डर अब चरम पर पहुंच गया था।

उसने आव देखा ना ताव, वो बदहवास सा घर से निकल भागा...

रास्ते में उसे building का चौकीदारी दिखा, वो रतन को देखकर चिल्लाया, कहाँ भागे जा रहे हो?

रमन भागते भागते हुए ही जोर से चिल्लाया, घर में भूत है, वो सारे सामान इधर से उधर सरकार रहा है। 

सब सही कहते हैं कि वो घर मनहूस है, महा मनहूस.... उसके बाद उसने पलट कर नहीं देखा, बस पकड़ कर सीधे गांव निकल गया।

रमन की बातों से चौकीदार भी थर-थर कांपने लगा और अपने घर को निकल गया...

रमन के जाने के दो दिन बाद, महेश गांव से लौट आया...

आगे पढ़ें House number 1303 (भाग-5) अंतिम भाग में... 

Wednesday, 11 January 2023

Story of Life : House number 1303 (भाग-3)

House number 1303 (भाग-1)

House number 1303 (भाग-2) के आगे..

House number 1303 (भाग-3) 

रतन मन कड़ा कर के रुकने को तैयार हो गया। महेश उसे घर की चाबी सौंपकर चला गया, साथ ही हिदायत दे गया कि यहां रखें कोई भी सामान से छेड़छाड़ ना करे व संभल कर रहे। और किसी चीज़ की ज़रूरत लगे तो बोल दे...

रतन ने घर की सिर्फ इतनी सफाई की, जिसमें उसका  बिस्तर बिछ जाए। बाकी सफाई, अगले दिन करेगा, सोचकर वो सो गया।

अगले दिन रतन ने थोड़ी और सफाई कर ली। 

फिर अपने गांव में फोन करके सबको उसने बता दिया कि उसे एक बड़ी सी बिल्डिंग में घर मिल गया है। उसमें एक कमरा, रसोईघर और बाथरूम है।

माँ ने पूछा, बिल्डिंग में क्यों?

माँ, यहां ऐसे ही मिलते हैं। 

उस समय रतन का दोस्त रोहित भी बैठा था। उसने तुरंत पूछा, कौन से floor, और कौन से number पर?

रतन ने कहा 1303...

1303! 

पहले 13 फिर 3..

हाय! रतन तुझे कोई और घर नहीं मिला, जो तूने, महा मनहूस घर ले लिया। 

1303, घर तो कोई भी नहीं लेता है, ना जाने उसमें कौन भूत चुड़ैल रहते हैं। 

तू घर लेने से पहले नहीं बता सकता था कि यह घर लेने वाला है। 

मां मेरी बात तो सुन...

पर 1303 सुनने के बाद मां का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वो रतन की कोई बात नहीं सुनना चाह रही थी।

रतन के बाबूजी बोले, सुन भी ले बेटे की, क्या कहना चाह रहा है।

मां, वो घर मेरे एक दोस्त के पास चौकीदारी के लिए था, उसने मुझसे बिना एक पैसा लिए रहने को दिया है। 

हां हां, ऐसे घर को पैसा देकर लेगा भी कौन?

मां, दिल्ली में घर का किराया भाड़ा बहुत है और मेरे पास पैसे कम।

थोड़ा पैसा, पढ़ाई-लिखाई के लिए भी जोड़ना चाह रहा हूं। कुछ दिनों बाद, जब थोड़े पैसे जोड़ लूंगा तो दूसरा घर ले लूंगा।

फिर बाबूजी बोले, बेटा तू मां की छोड़, तुझे जो ठीक लगे वही कर...

बात ख़त्म होने पर, रतन काम पर जाने को तैयार होने लगा, फिर उसने सोचा कि महेश से मिलते हुआ जाएगा।

यही सोच कर वो महेश के घर की ओर चल दिया। वहां पहुंचने पर उसे महेश के घर पर ताला लटका हुआ दिखा।

उसने आस-पड़ोस से पूछा कि महेश कहां गया?

वो लोग पूछने लगे कि तुम कौन हो और कहां से आए हो।

जी मैं रतन, महेश का दोस्त, यहीं पास के apartment में 1303 घर में रह रहा हूं।

1303!

अच्छा तो महेश ने तुम्हें वहां रहने को राज़ी कर लिया?

हाँ..

तभी तो...

क्या तभी तो?

तभी तो वो, सबको लेकर गांव चला गया..

गांव?... पर क्यों? 

उसे चार साल पहले से इस घर की चौकीदारी मिली थी, जिसके कारण वो अपने गांव नहीं जा पा रहा था। उसने बहुत कोशिश की कि कोई इस घर पर रह जाए, पर 1303 नंबर सुनकर कोई भी free में भी इस घर पर रहने को तैयार नहीं होता था। 

क्यों भला, कोई तैयार नहीं होता था?

भैया, 1303 में कौन रुकना चाहता है? महा मनहूस नंबर है यह तो...

पर अब जब तुम मिल गये हो, तो वो अपना बोरिया बिस्तर बांध कर निकल लिया...

अच्छा, कब तक लौटेगा, वो बता दो...

क्या जाने, कितने दिन में आएगा, पूरे चार साल बाद तो गया है।

भैया, उसका फोन नंबर या उसके गांव का फोन नंबर बता दो। मैं आज उसका नंबर लेने आया था।

अरे भैया, उसके गांव में फोन नहीं लगता है और गांव में सिर्फ इसके पास ही फोन है। 

अरे! तो मैं उससे बात कैसे करुंगा? 

अब वो तो भाई, उसके आने पर ही होगी...

रतन अपने काम पर चला गया, जब वो घर लौटा, रात हो चुकी थी। 

आज की रात कुछ ज्यादा ही काली और ठंडी था, सन्नाटा पसरा हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सुहा रहा था, पर आवाज़ें हर चीज़ की बहुत तेज सुनाई दे रही थी। 

सुबह से घर को लेकर इतनी बातें सुन सुनकर, उसे भी घर अजीब सा लगने लगा था...

आगे पढ़ें House number 1303 (भाग-4) में...