Friday, 15 September 2023

Memories : वो वक्त कुछ और था

वो वक्त कुछ और था

आज सुबह News देखने के लिए TV on किया तो सीधे news channel ना लगाकर channels बदल-बदल कर news channel तक जा रहे थे।

Channel बदलते-बदलते DD National channel आ गया। हम उसे भी बदलते उससे पहले ही उसमें आया कि आज दूरदर्शन स्थापना दिवस है। 

यह देख कर मन उन दिनों में पहुंच गया, जब सबके घरों में सिर्फ और सिर्फ एक ही channel आता था। DD National.

दूरदर्शन की स्थापना आज के ही दिन (15 September) सन् 1959 में दिल्ली में हुई थी। और 25 April 1982 में coloured TV channel आया था, जिसकी स्थापना मद्रास में की गई थी। आज दूरदर्शन को स्थापित हुए 64 साल पूरे हो गए हैं।

दूरदर्शन एक अकेला ऐसा channel है‌ जो government द्वारा संचालित किया जाता है। 

यही वो सबसे पहला channel है, जिसने black and white से coloured होने तक का सफर तय किया है।

उस समय हर घर में धीरे-धीरे रेडियो से टेलीविजन आने का दौर था।  या कहिए audio के साथ video भी देखे जाने का दौर.. हम लोगों को, घर में रहकर मनोरंजन का मजा कैसे लिया जाए, उसको सिखाने का सारा श्रेय, दूरदर्शन का ही है। 

पर फिर भी सबके घरों में TV नहीं था, इसलिए TV देखने जाना भी अलग ही खुशी देता था। और जिस दिन TV अपने घर आया था, उस दिन की खुशी तो पूछिए ही मत, वैसी खुशी तो आजकल का LED TV आने पर भी नहीं देता है। 

दूरदर्शन एक अकेला channel था, जिसका उस समय एक छत्र राज था। पर क्या नहीं था, जो उसमें ना आता हो, news, हिन्दी व English दोनों भाषाओं में, मूक-बधिर लोगों के लिए भी, कृषि दर्शन, संस्कृतिक कार्यक्रम स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम, फिल्म, हिन्दी, English, प्रादेशिक भाषाओं में, फिल्मी गाने, बहुत सारे zoner के serials, बच्चों से बुजुर्ग तक, पुरुषों से महिलाओं तक सबके लिए ही, वो भी एक से एक बेहतरीन, TV पर आने वाले सभी कार्यक्रम ऐसे होते थे, जिन्हें पूरा परिवार तो क्या पूरा मौहल्ला एक साथ देखता था। 

एक TV, एक channel और remote... Remote तो था ही नहीं, TV का remote तो हम में से ही कोई एक हो जाता था, जिसे TV बंद करना और खोलना होता था, क्योंकि channel बदलने का तो कोई स्यापा ही नहीं था ना... 

उस समय के सभी कार्यक्रमों की दो विशेषता थी, एक तो fix time और दूसरा बहुत ही सुकून के साथ बनाए जाते थे तो उन्हें देखने के लिए time की punctuality and discipline रहना जरूरी होता था, क्योंकि जो program छूट जाता था तो वो फिर एक हफ्ते बाद ही देखने को मिलता था। सुकून से बना था तो उन्हें देखकर  सुकून भी मिलता था। 

उस समय TV देखना मात्र, entertainment or time pass नहीं था, बल्कि pleasure time or family time होता था।

उस समय के एक-एक program classic थे, फिर वो चाहे news हो या serials, रंगोली, चित्रहार, फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, show theme, star trek, कच्ची धूप, रामायण, महाभारत, शक्तिमान, हम लोग, बुनियाद, विक्रम-बेताल, सिंहासन बत्तीसी, नुक्कड़, सुरभि, पोटली बाबा की, ब्योमकेश बख्शी, करमचंद, मालगुडी डेज, चंद्रकांता, सर्कस, फौजी, दादा-दादी की कहानियां, इन जैसे और भी बहुत सारे अच्छे-अच्छे programs.... जिन्हें देखकर हमारा स्वर्णिम बचपन बीता, वो वक्त कुछ और था...

पर जब हम लोग छोटे ही थे, तभी बहुत से private channels जैसे Zee TV, Star Plus, Sony, etc... भी आने शुरू हो गये थे। अब हम किसी भी दिन और किसी भी समय कोई सा भी program देख सकते थे। 

पर इतनी variety और no time boundation के कारण धीरे-धीरे entertainment का वो charm कहीं धूमिल हो गया।

अब घरों में number of Televisions , number of  TV channels थे। सब remote पर अपना control चाहते हैं। नतीजा मोहल्ला तो छोड़ दीजिए, अब परिवार के सभी सदस्य भी एक साथ TV नहीं देखते हैं।

एक पते की बात बताएं, सच्चा सुख साधनों की कमी में ही ज़्यादा होता है क्योंकि कुछ थोड़ी सी कमी, आपसी रिश्तों में नजदीकी ला देती है। क्योंकि जब कम होता है तो सबका ध्यान रखना ज़्यादा होता है कि कहीं कोई वंचित ना रह जाए।

In short साधन कम था, channel एक ही था, पर उसमें सबको सबकी पसंद का और बहुत अच्छा content कैसे दे दिया जाए, रिश्तों को कैसे आपस में समेट लिया जाए, जिसे आता था बस वही था दूरदर्शन... हमारा खूबसूरत बचपन...

दूरदर्शन दिवस पर उसके 64th birthday की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 

आज भी आता है दूरदर्शन, पर अब हम सिर्फ 15 August, 26 January और किसी राष्ट्रीय उपलब्धि में ही उसे देखते हैं, यह जानते हुए भी कि आज भी कहीं-ना-कहीं दूरदर्शन ही है जो संस्कार और संस्कृति देने में सक्षम है, सर्वश्रेष्ठ है.. 

पर क्या कभी हम लौट चलेंगे, अपने देश के पहले channel की तरफ, अपने बचपन की तरफ़... उस वक्त की तरफ जो कुछ और ही था... सुकून, प्रेम और अनुशासन से भरा, साधनों को पाने की अंधी दौड़ में जो शामिल नहीं था..😊

Thursday, 14 September 2023

Poem : हिन्दी

हिन्दी अपनी ही लगती है, जैसे किसी प्रेम के रिश्ते से जुड़े हों, उसी भाव को उकेरती मिठास से भरी रचना

हिन्दी


हिन्दी है माँ सी सरल,

हिन्दी है सम्पूर्ण।

हिन्दी साहित्य के,

रस से है परिपूर्ण।


हिन्दी है पिता सी विस्तृत,

ज्ञान है इसमें अपार।

गूढ़ हो या हो सरल,

कुछ नहीं है इसके पार।


हिन्दी है बहन सी सरस,

प्रेम में डूबी हुई।

जिसने ना हिन्दी पढ़ी,

उसकी जिंदगी ना पूरी हुई।


हिन्दी है भाई सी प्रबल,

इसके रंग हज़ार।

तर्क कोई जो इससे करे,

निश्चय ही जाए हार।


हिन्दी है दोस्त सी निश्छल,

नहीं करे किसी से भेद।

ज्ञानी हो या अज्ञानी,

प्रेम से, सबको ले समेट।

 

हिन्दी भारत माता की, 

बहुत प्रिय संतान।

इसकी आन में ही,

भारत माँ का सम्मान। 


हिन्दी हममें बसी हुई,

हिन्दी में बसे हैं हम।

सर्वत्र इसका विकास करें,

यही प्रण लेते हैं हम।


जय हिन्दी जय भारत 🇮🇳 


आप सभी को हिन्दी दिवस पर हार्दिक 

शुभकामनाएं 🙏🏻💐 


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हिन्दी भाषा का अस्तित्व 

हिन्दी भाषा पर दोहे 

हिन्दी क्यों सबसे बेहतर 

हिन्दी-दिलों की भाषा

भाषा की आशा

हिन्दी दिवस में ही क्यूँ? 

हिन्दी बोलने में कैसी शर्म?


Short story: मौन प्रेम

मौन प्रेम  



चिराग और रुही की नई नई शादी हुई थी। विवाह के एक हफ्ते बाद ही रुही चिराग के साथ दिल्ली आ गई।

अपनी नई नवेली दुल्हन को चिराग जहां भर की खुशियां देना चाहता था। 

दोनों राशन की दुकान पर पहुंचे, दोनों को ही ना तो कीमत का अंदाजा था और ना इसकी समझ कि क्या चीज़ कितनी लेनी चाहिए। 

चिराग सोच रहा था कि सब कुछ कम कम लें, पर रुही सब कुछ ज्यादा लेना चाह रही थी, जिससे रोज़ रोज़ चक्कर ना लगाना पड़े।

कुछ कम कुछ ज्यादा सामान उन्होंने ‌‌‌‌‌ले लिया। रुही को काजू बहुत पसंद थे, तो वह उन्हें 1 kg. लेना चाह रही थी। पर चिराग 250 gm. से ज्यादा कैसे भी लेने को तैयार नहीं था। Finally बात 300 gm. में fix हुई।

घर लौट कर रुही जब सामान रखने लगी तो उसे लगा काजू 300 gm से ज्यादा हैं, शायद ½kg. वो बहुत खुश हो गई, पर उसने चिराग से कुछ नहीं कहा...

धीरे धीरे घर के सभी सामान इकट्ठा हो गए और जिंदगी रवानगी से चलने लगी। 

राशन के लिए, कभी चिराग ने mall या online के लिए कहा, पर रुही हमेशा उससे ही राशन लेती, जिससे पहले दिन लिया था, क्योंकि अब तो रुही, काजू खरीदे या ना खरीदे वो दुकानदार, सामान के साथ ½ kg. काजू जरुर रख देता था।

रुही को नहीं पता था कि वो ऐसा क्यों करता था, पर उसे दुकानदार का काजू रखना बहुत अच्छा लगता था। वो सोचती, जो बात कभी चिराग ने नहीं सोची, दुकानदार ने सोच ली। अब तो सारी जिंदगी यहीं से राशन लेना है।

कुछ साल बाद उन्होंने घर बदल लिया, जो दुकान से चार किलोमीटर दूर था, अब सब सामानों की दुकानें बदल गई पर नहीं बदली तो बस राशन की दुकान...

शादी को दस साल बीत गए, आज आते से ही चिराग ने बताया कि वो तुम्हारा राशन वाला कल हमेशा के लिए अपने गांव जा रहा है।

क्या! रुही की चीख निकल गई और आंखों से टप टप आंसू बहने लगे। फिर वो तेजी से कमरे के अंदर गई और चंद मिनटों में तैयार हो कर बाहर आ गई व घर से बाहर जाने लगी।

चिराग और बच्चों ने पूछा कि क्या हुआ?  कहां जा रही हो? 

वो बोली राशन वाले के यहां...

पर क्यों? चिराग ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा...

तुम को कुछ भी कभी भी समझ आएगा? अभी तुम ने बोला ना कि वो हमेशा के लिए गांव जा रहा है...

ओह! तो क्या हुआ ? और कहीं से ले लेंगे राशन, उसमें क्या है?

तुम को कभी भी कुछ समझ नहीं आएगा, मैं होकर आती हूं, वहां से...

जब रुही वहां पहुंची तो राशन वाले ने तुंरत उसे एक काजू का पैकेट दे दिया।

पैकेट हाथ में लेते ही रुही की आंखें डबडबा गई। उसने कहा आप क्यों जा रहे हैं? यहां सब अच्छे से तो चल रहा था...

क्या कहें भाभी जी, हमारी बरसों पुरानी जमीन हमें कल ही वापस मिली है। वरना चिराग भैय्या को छोड़कर कौन जाता। बहुत ही अच्छे हैं वो...

किस मामले में अच्छे?

अरे वो ही तो हमारी ज़मीन दिलाने में मदद किए हैं, वरना हमारी तो सारी जिंदगी यहीं कट जाती, परिवार से दूर रहकर... उसकी आंखों से कृतज्ञता साफ झलक रही थी।

ओह! तो, यह सब चिराग का किया धरा है, रुही मन ही मन कुढ़ रही थी...

हमने तो चिराग भैय्या से अपनी पत्नी से प्यार कैसे करते हैं, वो भी ना... सीखा है उनसे, दुकानदार थोड़ा लज्जा से भरा हुआ बोला... 

प्यार और चिराग से... ऐसा भी क्या देख लिया?रुही ने चिढ़ते हुए बोला...

अरे भाभी जी, जब आप पहली बार आयीं थी, तब से लेकर आज तक आपको ½ kg काजू हमेशा देने के लिए वही तो बोले हैं और तो और उसके लिए हमेशा advance में पैसा भी दे देते थे।

अभी हमने एक दूसरे राशन वाले से भैय्या जी की पहचान करा दी है, वो आपके घर से ½ km. की दूरी पर ही है। भैय्या उसको भी काजू के लिए advance दें आए हैं।

यह बात सुनकर रुही को तो चक्कर ही आ गये... 

क्या?... मन ही मन वो अपने आप से बोल रही थी, और मैं दस साल राशन वाले को बहुत अच्छा समझकर यूं ही खुश होती रही। 

ठीक है भैया, आप जाओ गांव और अपने परिवार के साथ खुश रहो।

जिस तेजी से वो घर से गयी थी, उतनी तेजी से ही घर लौट आई...

क्या हुआ बड़ी जल्दी लौट आयी?

जल्दी कहां? पूरे दस साल लग गए, तुम्हारे मौन प्रेम को समझने में... 

सच पर आज जो लौटी, तो तुम्हारे साथ बिताए वो प्रेम के दस साल का एक एक पल जीकर आई हूं। आज ही मुझे एहसास हो रहा है कि कैसे तुमने, मेरी हर छोटी-बड़ी खुशी का मुझे बिना बताए, बिना जताए ध्यान रखा है। कभी सोच ही नहीं पाई कि एक दुकानदार मुफ्त में किसी को कुछ नहीं देता है।

यह तो कोई वो ही कर सकता है जो आपको आप से भी ज्यादा चाहता हो। जो आपको इसलिए खुश नहीं रखना चाह रहा हो कि बदले में उसे आपसे खुशी चाहिए।  

उसका मौन प्रेम, सिर्फ और सिर्फ आपको खुश देखना चाहता है, बिना किसी स्वार्थ के बदले... उसे तो आप से पलटकर प्रेम की चाह भी नहीं है... 

और मैं उस मूर्ख मृगनी सी प्यार की कस्तूरी सर्वत्र ढूंढ रही थी, जिसकी मदहोश करने वाली खुशबू उसके ही सबसे नजदीक थी। 

यह कहकर वो चिराग की बाहों में समा गई। उन दस सालों को पलों में समेटने के लिए।

चिराग तो रुही को सालों से प्रेम करता था मौन प्रेम, वो सब रुही की इच्छा का करता था, बस कभी जताता नहीं था। पर आज रुही को सच्चाई का एहसास हो गया था। और यह पल, उन दोनों के अमर प्रेम का पल था।

कुछ देर बाद ही, बच्चे खेल कर लौट आए, उनकी बाहर से आवाज़ें आने लगी, जिसे सुन चिराग और रुही दरवाजे की ओर बढ़ गये...