Thursday, 25 June 2020

Short Stories : इंसानियत


आज आप सब के साथ मुझे हिन्दी साहित्य में प्रसिद्धि प्राप्त  बीकानेर ( राजस्थान) के श्री अशोक रंगा जी की लघुकथा को share करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। 

उनकी इन्सानियत को आइना दिखाती लघुकथा का आनन्द लीजिए।

🌝  इंसानियत 🌝

image courtesy : Dreamstime.com

गर्मी के दिन थे. भरी दोपहर में  तापमान लगभग 49-50 डिग्री सेल्सियस के आसपास था. धूप में पड़ी हर वस्तु जल सी रहीं थी. 

एक चालीस -पच्चास मीटर लम्बी व अति संकड़ी गली के बीचोबीच लोहे की अलमारियों से लदा हुवा एक ऊंट गाड़ा चला आ रहा था. 

उसी दौरान सामने से दो कारे अचानक हॉर्न बजाते हुऐ आ टपकी. 

बेचारा ऊंट गर्मी के कारण थका हुवा,  बेचैन सा था व उसके मालिक ने ख़ुद को गर्मी से बचाने के लिए अपने सिर पर एक  तौलिया सा बांध रखा था. 

दूसरी तरफ  कार वाले  AC में थे. गाड़ी में बैक गियर था फिर भी दोनों हॉर्न पर हॉर्न दिये जा रहें थे. 

आख़िर ऊंट गाड़े वाले ने ऊंट  गाड़े से नीचे उतर कर अपने ऊंट को पीछे धकेलने लगा. 

चूंकि ऊंट गाड़े में काफ़ी वजन था इस कारण ऊंट भे-भे की आवाज़ निकालते हुवे बड़ी कठिनाई से पीछे हटने लगा.

संकड़ी गली से ऊंट गाड़े के पूर्णतया पीछे हटने के बाद दोनों कार मालिक अपना सीना फुलाए विजय भाव के साथ वहाँ से निकल पड़े. 

ऊंट भी इन जाती हुई कारों को पीछे से देखते हुऐ गुस्से में जमीन पर अपने पाँव को पटकने लगा. 

मालिक ने ऊंट की पीठ पर हाथ फेरते हुवे उसे समझाया कि "अरे बुरा नहीं मानते ऐसे पढ़े लिखें बड़े इंसानों का" 

Disclaimer:
इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Wednesday, 24 June 2020

Kids Story : वीरा


वीरा


वीरा केवल नाम की वीरा थी, वरना तो कोई छोटा सा puppy भी देख लेती तो mumma mumma करने लग जाती थी। और एक छोटा सा कीड़ा भी उसे अपनी जगह से हिलाने की क्षमता रखता था। इस कदर डरपोक थी, कि अब तो वो शक्ल से भी दब्बू ही लगती थी।

वीरा के माँ-पापा बहुत ही साहसी थे। 

पर वीरा के ऐसा होने से उसकी बुआ, उसकी माँ से हमेशा यही कहा करती थी, भाभी आपने क्या सोच कर इसका नाम वीरा रख दिया, इसका नाम तो भीरु रखना चाहिए। वो हमेशा उसे दब्बू ही कह कर बुलाती थी। 

माँ को बहुत बुरा लगता था। पर क्या करती, जब अपना ही सिक्का खोटा हो।

मेम साहब, हम जा रहे हैं, वीरा दीदी घर वापस आ गयी हैं। कह कर काम वाली चली गयी। 

पर हमेशा की तरह, उस दिन भी जब वीरा स्कूल से घर आई, तो आते से ही उसने दरवाज़ा बंद नहीं किया था। 

उस दिन माँ की तबीयत ठीक नहीं थी। वे दवा खाकर लेटी थीं, उन्होंने लेटे लेटे ही वीरा से कहा, बेटा तेरा खाना microwave में रखा है। गुड्डा,  गरम करके आज खाना अपने आप ले लेगी, या मैं उठूँ?

नहीं! माँ, मैं ले लूँगी अपने आप। 

स्कूल जाते वक़्त वीरा के पापा ने उसे सख्त हिदायत दी थी, कि “माँ को आराम करने देना। और आज खाना भी अपने आप ले लेना”।

सुन कर कि, वीरा खाना ले लेगी, माँ सो गयी। वीरा भी कपड़े बदलने चली गयी।

तभी कुछ आवाज़ें सुनाई देने लगीं, वीरा कपड़े बदल कर बाहर आई। 

तो उसने देखा दो अजनबी घर के अंदर घुस आए थे। वीरा की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ था, उसने दरवाज़ा जो नहीं बंद किया था।

उसमें से एक के हाथ में बंदूक और दूसरे के हाथ में चाकू था। उनकी शक्ल से ही साफ साफ समझ आ रहा था, कि वे चोर थे।

उन्हें देख कर वीरा बुरी तरह से घबरा गयी थी। माँ दवाई खा कर सो रहीं थीं, काम वाली जा चुकी थी। पापा के आने में अभी काफी समय था।

वीरा पर बंदूक तानते हुए एक चोर ने पूछा, घर में कौन कौन है?

कोई.... कोई भी नहीं।

वीरा माँ के बारे में नहीं बताना चाह रही थी, क्योंकि माँ बीमार थीं, और दवाई के असर से गहरी नींद में सो भी चुकी थीं। 

अकेली हो....  कह कर चोर हँसने लगे।

अच्छा चल बता, तेरी माँ गहने कहाँ रखती हैं?

जी, उस कमरे के अंदर एक कमरा है, वहीं माँ गहने और पैसे रखती हैं।

बड़ी समझदार लड़की है, सब बता दे रही है, दूसरे चोर ने कहा। 

अंकल मैं खाना खाने जाऊँ? मैं अभी स्कूल से आयीं हूँ ना, मुझे बड़ी भूख लगी है।

वीरा के सब बता देने, और उसके दब्बू चेहरे के कारण, चोर उसकी तरफ से आश्वस्त थे। वे कमरे की तरफ मुड़ गए, और वीरा kitchen की तरफ।

जब वे उस कमरे में पहुंचे, वहाँ बड़ा अंधेरा था, जब वो पलट कर वापस आने लगे तो, उन्होंने पाया कि दरवाज़ा बंद था। 

वो ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा पीटने लगे, पर वीरा ने दरवाज़ा नहीं खोला। उन्होंने अंदर का समान भी तोड़ना- फोड़ना शुरू कर दिया था। पर उसका भी वीरा पर असर नहीं हुआ।

कुछ ही देर में, पुलिस, और वीरा के पापा, घर आ गए थे। चोर पकड़े गए। 

थोड़ी देर में माँ भी उठ गयीं, तो उन्होंने भी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद पाया। वे जब दरवाज़ा knock करने लगीं, तो पापा ने दरवाज़ा खोला।

माँ ने पूछा, दरवाज़ा क्यों बंद किया था?

तब वीरा ने बताया, कि चोर घुस आए थे, आप सो रहीं थीं, आपके पास आवाज़ें न जाएँ, इसलिए आपका दरवाज़ा भी बंद कर दिया था। 

चोरों को store room का गलत पता बता कर, kitchen में जाने का झूठा नाटक करके उन्हें भी बंद कर दिया था। 

फिर पापा को फोन कर दिया था। पापा, पुलिस अंकल को ले आए, और चोर पकड़े गए।

माँ ने पूछा, तुम्हें डर नहीं लगा?

लगा था, माँ! पर आपको कुछ नुकसान ना हो, जब ये सोचा, तो ना जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी। 

माँ और पापा ने उसे बहुत सारा प्यार किया।

 जब बुआ ने सुना, तो वो देखने चलीं आयीं। 

तब वीरा की माँ ने बड़े गर्व से कहा, दीदी ये आपके भैया और मेरी बेटी है, इसलिए इसका नाम वीरा है। 

उसके बाद से वीरा की बुआ ने उसे दब्बू कहना बंद कर दियाऔर वीरा ही कहने लगीं।           


Tuesday, 23 June 2020

Short Stories : बनिया

आज आप सब के साथ मुझे डेहरी ऑन सोन,रोहतास बिहार  के उत्कृष्ट कहानीकार श्री विनय कुमार मिश्रा जी की कहानी share करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। 

हमारी किसी के प्रति बनाई गई धारणा, कितनी सही-कितनी ग़लत को बखूबी उजागर करती कहानी का आनन्द लीजिए।

बनिया

Image Courtesy: YouTube

"तुम अब हर पैकेट पर चार रुपये बढ़ा कर लिया करो दुकानदारों से"

पत्नी और मैं दोनों मिलकर पापड़ बनाते और बहुत छोटे स्तर पर बेचते हैं। धंधा ज्यादा पुराना नहीं है। पर कुछ एक मोहल्ले में बिक्री बढ़ गई है। हम चालीस रुपये का पैकेट दुकानदार को देते हैं वे पचास में बेच देते हैं।
 
पास के ही ग्रामीण मोहल्ले से राजू बनिए का ऑर्डर सबसे ज्यादा आता है। इस महीने दो सौ पैकेट मांगा है उसने। दुकान भी बहुत चलती है उसकी। मैं उसी की दुकान पर था और यही बातें कर रहा था।

"राजू भाई! अब चौवालीस का पैकेट है ये, महंगाई बढ़ रही है हर चीज़ की तो.."

"अरे कैसी बात कर रहे हो, मैं मार्केट से बाहर थोड़ी हूँ, अभी पापड़ में लगने वाली किसी सामग्री का रेट नहीं बढ़ा"

"राजू भाई, मेहनत बहुत है, आप तो जानते हैं, दिनभर उसी में लगना है, फिर घूमकर कुछ दुकानों में दे आता हूँ। मुश्किल से बीस पच्चीस हज़ार कमा पाता हूँ"

वो मेरी बात सुनकर हँसने लगा। जैसे मैंने कोई मज़ाक कर दी हो।

"पापड़ अच्छा है आपका पर इसमें मैंने भी खूब मेहनत की है, शुरू में हर किसी को जबरजस्ती भी दे देता था, धीरे धीरे आदत लग गई यहां लोगों को आपके पापड़ की। और दो पैसे बचाऊंगा नहीं तो दुकान खोलने का क्या मतलब"

मैं बोलता रहा, वो मना करता रहा। बात मैंने सिर्फ दो रुपये बढ़ाने पर ले आया था। वे इसमें भी झिकझिक कर रहा था।अंत में सिर्फ एक रुपये बढ़ाये इसने पैकेट पर।

कितने सामान बेचता है और लाखों कमाता है। 
महीने का दो चार सौ नहीं बढ़ा सकता ये।

हमारी मेहनत के पूरे पैसे भी नहीं देता। 

कलयुग है , ऐसे ही लोगों की बरकत होती है!
 
सामने दुकान पर गेंदे के फूल की सूखी माला टंगी थी जो बता रहा था कि ये दुकान पर पूजा भी सिर्फ दीवाली के दीवाली करता है। 

मैं पसीने को पोछ पत्नी को फोन ही लगाने वाला था दो सौ पैकेट रखने से पहले कि तभी एक जानी पहचानी बूढ़ी औरत जो अब लगभग पागल सी हो गई है वो दुकान पर चली आई

"दे दे बेटा.." 

"हां माई एक मिनट रुक" 

उसने उस बूढ़ी औरत को दूध ब्रेड और कुछ थोड़े बहुत सामान दिए।

औरत ने सामान लेकर जाते हुए जो कहा और इसने जो बोला वो मुझे आश्चर्य में डाल गया।

"पैसे तो बेटे ने डाल दिया था ना इस महीने? ये पैसे भी वो तुम्हें भेज देगा"

"हाँ.. हाँ माई पैसे मिल जाते हैं हर महीने" वो औरत सामान लेकर कुछ बड़बड़ाती हुई चली जा रही थी।

और मेरे लिए बहुत सारे सवाल छोड़ गई इस राजू बनिये से पूछने के लिए

"इसका तो अपना कोई नहीं अब।सिर्फ एक ही बेटा था जो शहर में कमाता था?

इस दुकान के सामने ही तो चौक पर पिछले साल शहर से आकर बस से उतरा था, और एक गाड़ी चढ़ गई थी उसपर? फिर ये पैसे कौन देता है?' 

"पैसे कोई नहीं देता, ये बिचारी उस सदमे से बाहर ही नहीं आ पा रही है। सोचती है बेटा अब भी शहर में ही है" राजू बनिये को आज पहली बार उदास होते देखा था मैंने

"तो क्या हर महीने तुम पाँच सौ.. हज़ार का सामान इसे दे देते हो" इस बनिए का यह हिसाब मुझे समझ नहीं आ रहा था

"हाँ भाई.."   राजू अपने कैलकुलेटर पर मेरा हिसाब कर रहा था और मैं मन ही मन राजू के इस अनजाने व्यवहार का। बरबस मुँह से निकल पड़ा

"भाई, मगर कबतक ऐसे ही देते रहोगे?" 

उसकी आँखें इस सवाल पर भर आईं थीं
"जबतक इन्हें विश्वास है कि इनका बेटा ज़िंदा है! पता नहीं क्यूँ मैं उस माँ के इस भ्रम को टूटने नहीं देना चाहता"

मेरी आँखें भी भर आईं..राजू बनिए के इस जवाब को सुनकर..! 

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