Monday, 29 June 2020

Article : Corona हारेगा। लेकिन किस से?

Corona हारेगा। लेकिन किस से?


भारत, एक बार फिर champion.......
image courtesy: Zee news  

बाबा रामदेव ने कोरोना को ठीक करने के लिए आयुर्वेद शास्त्र से अध्धयन कर, अचूक  दवा discover कर ली है।

क्या, सच में discover कर ली है?

कितनों के मन में यह सवाल है।

जबकि Glenmark ने जब यही बात कही थी, तब किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया।

कोई बाहर की company discover करती, तब भी सवाल नहीं उठाए जाते।

सही कह रहे हैं ना?

यहाँ, सही है, इसको तो पूछने का सवाल ही नहीं है, कितनी सारी company ने ना जाने कितने दावे किए, पर उन पर कभी सवाल नहीं उठाए गए।

तो बाबा रामदेव पर क्यों?

क्योंकि वो भारतीय हैं?

क्योंकि उनकी discovery का आधार, भारतीय मूल के विज्ञान, आयुर्वेद पर है?

क्योंकि उनकी दवा का नाम विशुद्ध भारतीय है?

क्योंकि उन्होंने अपनी दवा का मूल्य उतना ज्यादा नहीं रखा,  जितना लोगों ने सोचा था।

क्या यही सब कारण हैं?

तो क्यों हैं?

ऐसा नहीं है कि मैं, बाबा रामदेव की पक्षधर हूँ, ना मैं यह कह रही हूँ कि यह दवा सटीक है, ना ही मैं  पतंजलि
के  products का promotion कर रही हैं।

पर बात अगर भारत की है, भारतीयता की है, तो हाँ मैं हूँ पक्षधर।

जब भी भारत और भारतीयता की बात होगी, मैं सदैव उसका support करुंगी।

हम लोगों को तो प्रसन्न होना चाहिए कि भारत, कोरोना को हराने की क्षमता रखता है।

अगर बाबा रामदेव सफल हुए हैं तो यह सफलता सिर्फ उनकी नहीं है, हम सब भारतीयों की है। 
  • हम सब जो इतने दिनों से घरों में कैद हैं, उससे आजादी मिल जाएगी।
  • जो इस तरह से डर डर कर जी रहे हैं, उससे मुक्ति मिल जाएगी।
  • Economy जो down हो रही है, वो फिर से progress करने लगेगी।
  • और सबसे बड़ी बात, हम चीन की मक्कारियों का मुंह तोड़ जवाब दे सकेंगे।

तो क्यों यह शक और सवाल हैं?

हमें तो प्रसन्न होना चाहिए कि, उन्होंने दवा खोजने का प्रयास किया है।

हमें उनका support करना चाहिए, ना कि oppose.

अगर उन्होंने दवा ख़ोज ली है, तो सफलता पर प्रसन्न हों।

और अगर वो सफल नहीं हुए हैं तो भी हमें उनकी discovery में हर संभव मदद करनी चाहिए।

Oppose तो किसी भी सूरत में नहीं।

वरना यही कहना होगा कि 

अच्छा हुआ रामायण काल में इतनी राजनीति नहीं थी, इतना विरोध नहीं था, नहीं तो सुषेण वैद्य के लाइसेंस लेने तक लक्ष्मण जी के प्राण निकल जाते।

अगर आप भी चाहते हैं कि हम सब सदैव सुरक्षित रहें, जीवित रहें, तो भारतीयता का साथ दें, भारतीयों का साथ दें।
Image courtesy : pngtree.com

जिसने हम सब को क़ैद किया था, आज उस corona के कैद होने का समय आ गया है। उसके हारने का समय आ गया है।

भारत ही जीतेगा, पर उसके लिए भारत को साथ होना जरूरी है, उसका विकास होना जरूरी है, और हमारा विश्वास होना जरूरी है।

जय हिन्द, जय भारत 🇮🇳

Friday, 26 June 2020

Article : Sushant Singh Rajput - A Mystery


Sushant Singh Rajput - A Mystery

Image Courtesy: Wikipedia

Sushant Singh Rajput, इस दुनिया से क्या गया, पूरी दुनिया के लिए कई सवाल छोड़ गया।

बातें सिर्फ Film industry तक सीमित होती, तो और बात थी। पर अभी तो यह जन जन तक पहुंच गई है।

हमारा भारत देश ही ऐसा है, बस एक मुद्दा होना चाहिए, फिर वो तूल तो भेड़ चाल में पकड़ ही लेता है।

कोरोना- वोरोना तो अब पुराना हो चुका है, अब ना तो उससे कोई डर रहा है, ना कोई रुक रहा है।

आखिर हर बात की भी एक हद होती है, ऐसे ही नहीं कहते - Show Must go on.

जिंदगी चंद दिनों तक मद्धम हो सकती है, पर थम  नहीं सकती।

कोरोना को तो, सुशांत सिंह राजपूत का अचानक से चले जाना, बहुत पीछे छोड़ चुका है।

आज तो हर कोई यह जानना चाहता है कि suicide की सही वजह क्या थी?

और यह suicide ही था या murder?

इन बातों की पुष्टि करता हुआ, हर रोज़ एक नया चेहरा और नयी बात होती है।

कितने ही हितैषी, हमदर्द और कितने ही दोषी हर रोज़ सामने आ रहे हैं।

सब इतना ही उसका साथ देते होते, तो शायद सुशांत सबके बीच होता।

सब बस दिखावा है, ना जाने  कितनों ने तो इस मामले को गर्म कर के, अपनी-अपनी रोटी सेंक ली।

मेरे ज़हन में तो अलहदा ही ख्याल आ रहे हैं।

आप यह बताइए, ऐसी कौन सी जगह है, जहाँ  lobby नहीं होती है? 

माना Film industry में ज्यादा होगी, पर इस बात से सुशांत भी अवगत होगा। वैसे भी जहाँ करोड़ों मिलेंगे, वहाँ competition भी ज्यादा होगा।

Lobby तो जिन्दगी के हर पल में है, चाहे वो media हो या office (सरकारी या गैर सरकारी) बाजार हो या व्यापार। और तो और दोस्त हो या रिश्तेदार। सब जगह है।

इसे ही survival of the fittest कहते हैं।

पर यूँ ही सब जाने लगे, तो जिंदगी से मौत जीत जाएगी।

ना जाने क्या वजह थी, उसके जाने की?  पर एक बार अपने, पिता और परिवार के बारे में भी सोच लेता, तो शायद वजह ना होती अनहोनी होने की।

हे ईश्वर ! किसी को इतना मजबूर ना करना कि उसके ज़हन में भी यह ख्याल आये। जिंदगी बहुत बेशकीमती है, कोई उसे यूँ ना गंवाए।

Thursday, 25 June 2020

Short Stories : इंसानियत


आज आप सब के साथ मुझे हिन्दी साहित्य में प्रसिद्धि प्राप्त  बीकानेर ( राजस्थान) के श्री अशोक रंगा जी की लघुकथा को share करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। 

उनकी इन्सानियत को आइना दिखाती लघुकथा का आनन्द लीजिए।

🌝  इंसानियत 🌝

image courtesy : Dreamstime.com

गर्मी के दिन थे. भरी दोपहर में  तापमान लगभग 49-50 डिग्री सेल्सियस के आसपास था. धूप में पड़ी हर वस्तु जल सी रहीं थी. 

एक चालीस -पच्चास मीटर लम्बी व अति संकड़ी गली के बीचोबीच लोहे की अलमारियों से लदा हुवा एक ऊंट गाड़ा चला आ रहा था. 

उसी दौरान सामने से दो कारे अचानक हॉर्न बजाते हुऐ आ टपकी. 

बेचारा ऊंट गर्मी के कारण थका हुवा,  बेचैन सा था व उसके मालिक ने ख़ुद को गर्मी से बचाने के लिए अपने सिर पर एक  तौलिया सा बांध रखा था. 

दूसरी तरफ  कार वाले  AC में थे. गाड़ी में बैक गियर था फिर भी दोनों हॉर्न पर हॉर्न दिये जा रहें थे. 

आख़िर ऊंट गाड़े वाले ने ऊंट  गाड़े से नीचे उतर कर अपने ऊंट को पीछे धकेलने लगा. 

चूंकि ऊंट गाड़े में काफ़ी वजन था इस कारण ऊंट भे-भे की आवाज़ निकालते हुवे बड़ी कठिनाई से पीछे हटने लगा.

संकड़ी गली से ऊंट गाड़े के पूर्णतया पीछे हटने के बाद दोनों कार मालिक अपना सीना फुलाए विजय भाव के साथ वहाँ से निकल पड़े. 

ऊंट भी इन जाती हुई कारों को पीछे से देखते हुऐ गुस्से में जमीन पर अपने पाँव को पटकने लगा. 

मालिक ने ऊंट की पीठ पर हाथ फेरते हुवे उसे समझाया कि "अरे बुरा नहीं मानते ऐसे पढ़े लिखें बड़े इंसानों का" 

Disclaimer:
इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।