Saturday, 4 October 2025

India's Heritage : बदलते युग में देवता-राक्षस

आज आपको भारतीय धरोहर segment में एक बहुत ही interesting बात बताएंगे। वैसे आप सबको यह पता है, फिर भी शायद, कभी ऐसे सोचा नहीं होगा।

तो चलिए देखते हैं, कि क्या है वो बात…

बदलते युग में देवता-राक्षस


वो बात है, देवताओं और राक्षसों की उपस्थिति की।

सतयुग था, जब देवता और राक्षस अलग-अलग लोक में रहते थे। त्रेतायुग आया तो दोनों ही एक लोक में आ गए,  द्वापरयुग आया तो देवता और राक्षस, एक ही परिवार मे होने लगे।

और अब जब कलयुग है, तब देवता और राक्षस दोनों एक ही शरीर में रहने लगे हैं।

सतयुग, वो युग है, जब सब ओर सत्य, प्रेम, भक्ति और विश्वास था। इस युग में देवता स्वर्ग-लोक में थे और इंसान और राक्षस, भू-लोक और पाताल-लोक या नर्क-लोक में रहते थे।

हाँ, जब कभी कोई राक्षस त्रिदेवों में से किसी का अनन्य भक्त होता था, तो वो अपने तप से उन्हें प्रसन्न कर अत्यंत बलशाली हो जाता था।

तब वो देवाताओं से युद्ध कर उन्हें पराजित कर स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य जमा लेता था। पर कुछ समय के लिए ही, क्योंकि त्रिदेवों में से कोई एक या आदिशक्ति मां जगदम्बा उस राक्षस का वध करके स्वर्ग लोक पुनः देवताओं को दे देते थे।

फिर आया त्रेतायुग, भगवान श्रीराम और रावण का युग, देवता और राक्षस, दोनों ही भू-लोक में थे, अपने-अपने सद्कर्म और दुष्कर्म के साथ। इसमें प्रभू श्रीराम ने रावण का वध करके सत्य की असत्य पर जीत दिलाई।

उसके बाद आया द्वापरयुग, भगवान् श्रीकृष्ण और कंस का युग, जिसमें देवता और राक्षस दोनों एक ही परिवार के सदस्य थे। वो भी ऐसे पवित्र रिश्ते में, जिसकी कल्पना भी कर पाना असम्भव था। बल्कि एक तरह से देखा जाए तो द्वापरयुग में आते-आते यह हो गया कि अपने रिश्तेदारों में भी कोई भी आपका दुश्मन हो सकता है। पर तब भी सगे रिश्ते, इस तपिश से दूर थे।

उसके बाद आया कलयुग, अर्थात् आजकल का युग। इसमें सगे रिश्तों में भी देवता और राक्षस मिलने लगे, पर अब तो इंतहा हो गई है कि एक ही शरीर में देवता और राक्षस मौजूद हैं।

पर इस युग में भी अगर कोई चाहे तो अपने अंदर के देव रूपी कृत्य को जागृत करके, और राक्षस-रूपी कृत्य को सुप्त अवस्था में ले जा सकता है। 

इस का सिर्फ एक कारण है और वो है कि देव भी आप ही हो, बस उसकी ही सुनते चलिए, राक्षस अपने आप शांत हो जाएगा। 

जय श्री हरि 🚩🙏🏻

Thursday, 2 October 2025

India's Heritage : रावण का जन्म

आज भारत की धरोहर में आपके लिए रावण के जन्म की कहानी को लेकर आए हैं।

आप सोचेंगे कि रावण के जन्म ने ऐसा क्या प्रेरित किया?

तो उसका कारण है, कि रावण ने माता सीता का अपहरण किया था, फिर भी वो भगवान के हाथों, मुक्ति को प्राप्त हुआ।

क्या दुराचार करके भी किसी को मुक्ति मिल सकती है, और वो भी स्वयं श्रीहरि के हाथों?

क्या ईश्वर को पाने के लिए दिन-रात भक्ति की कोई आवश्यकता नहीं है?

इन्हीं सब प्रश्नों का जवाब है, रावण का जन्म और विजयदशमी...

रावण का जन्म


श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार रावण पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय थे, जो अपने भाई विजय (जो बाद में कुंभकर्ण बने) के साथ थे। 

एक बार उन्होंने सनक आदि मुनियों को भगवान विष्णु से मिलने से रोका, जिससे क्रोधित मुनियों ने उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनी में रहने का श्राप दिया।

इसी श्राप के कारण जय और विजय ने पहले हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया, जिनका वध भगवान नरसिंह ने किया। दूसरे जन्म में वो रावण और कुंभकर्ण के रूप में उत्पन्न हुए, जिनका वध भगवान श्रीराम ने किया।

तीसरा शिशुपाल और दंतवक्र, जिनका वध भगवान श्रीकृष्ण जी ने किया 

अब इस बात का कुछ कारण तो आपको समझ आ गया होगा, पूरा इन बातों से समझ लेते हैं।

रावण और कुंभकर्ण कोई दुरात्मा नहीं थे, बल्कि भगवान विष्णु के द्वारपाल थे। उनका अपराध अक्षम्य नहीं था, न ही इतना बड़ा था कि उन्हें तीन जन्मों के लिए श्राप मिल जाता।

पर हमारे ऋषि-मुनि इतने सिद्ध थे कि उनके दिए गए श्राप को काटने के लिए भगवान को जन्म लेना पड़ता था।

अब जब जय और विजय उनके ही द्वारपाल थे, तो उनकी मुक्ति के लिए तो श्रीहरि को आना ही पड़ता।

पहली बार नरसिंह भगवान के रूप में, उसके विषय में विस्तार से फिर चर्चा करेंगे।

आज दशहरा है तो आज रावण को ही प्रधानता देते हैं।

हांँ, तो दूसरा जन्म रावण और कुंभकर्ण था, जिसकी मुक्ति के लिए स्वयं श्रीराम आए थे और वो भी तब जब रावण ने उनकी पत्नी माता सीता जी का अपहरण किया था।

आपने अपहरण देखा। पर क्या यह देखा कि रावण के जन्म में भी वह, कितना बड़ा शिवभक्त था। वो कितना विद्वान था, वो कितना बड़ा पंडित था, उसके राज्य में प्रजा सुखी थी, वो इतना समृद्धशाली था कि उसकी लंका सोने की थी। उसके परिवार में सुख, शांति, प्रेम और इतना अपनापन था कि पूरे कुटुम्ब ने रावण के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया।

और उसने माता सीता जी का अपहरण ज़रूर किया, पर माता सीता के उसके पास अकेले रहने के बावजूद भी कभी उसने उन पर बल का प्रयोग नहीं किया। बल्कि उनके लिए हर तरह की सुविधा का ध्यान रखा। 

अब श्रीहरि से मुक्ति चाहिए थी, वो भी पूरे कुटुम्ब के लिए, तो कोई तो बड़ा कारण होना चाहिए था। रावण ठहरा पुण्य-आत्मा, अतः उसने सम्मान सहित माता सीता जी के अपहरण को निमित्त बना लिया।

तो आपको क्या लगता है, कि श्री हरि ने एक दुराचारी को मुक्ति दी थी? नहीं, बल्कि एक पुण्य-आत्मा को ही मुक्ति दी थी, और वो भी इस बड़े संदेश के साथ कि कोई लाख अच्छे कर्म कर ले, पर उसके द्वारा किया गया एकमात्र पाप भी अक्षम्य है।

तो विजयादशमी (दशहरा) पर्व दो बातों का प्रतीक है :

  1. जो ईश्वर का भक्त है, उसकी मुक्ति सदैव ईश्वर द्वारा होगी, भले ही उसके लिए उन्हें जन्म ही लेना पड़े।
  2. व्यक्ति द्वारा किया गया एक पाप भी उसके सौ पुण्य पर भारी है।

आप सभी को विजयादशमी पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻 

रावण के पुतले को जलाएँ पर उससे पहले अपने भीतर बैठे रावण को मारकर आएँ।

जय श्री राम 🚩🙏🏻

Wednesday, 1 October 2025

Article : जीतता भारत

अभी हाल ही में भारत की युवा cricket team ने Asia Cup में पाकिस्तान को तीन matches में अविजित रहते हुए हरा दिया। और Asia Cup trophy अपने नाम कर ली। हालांकि यह अलग बात है कि trophy अभी कहां है, यह अभी तक एक प्रश्न के रूप में रह गई है।

पर आप सच्चे मन से सोचिएगा कि क्या आपको एक पल भी ऐसा लगा था कि यह trophy कोई और देश ले जा सकता है, नहीं ना?

बिल्कुल। Match के आरंभ से पता था कि जीत भारत के हिस्से ही आएगी। 

बल्कि cricket ही क्या, football, chess, world cup(s), Olympics etc.

जीतता भारत


सभी खेलों में हमारे खिलाड़ी इतने perfect होते जा रहे हैं कि जीत खेलने से पहले सुनिश्चित लगती है।

पर कारण क्या है?

Of course, खिलाड़ी पहले से अधिक focused and passionate हो गए हैं। लेकिन एक और कारण है, अगर आप मानें तो।

पहले जब खेल हुआ करता था, तो उस खिलाड़ी विशेष का ही main concern होता था। केवल cricket ही ऐसा था, जिसमें खिलाड़ियों के साथ देश भी जुड़ जाता था।

पर बाकी किसी खेल को उतनी importance नहीं मिलती थी। 

KIYG (Khelo India Youth Games) जैसे events हमारे देश के भविष्य के खिलाड़ियों में ऐसा जोश और जुनून भर देते हैं, कि वो एक talented sportsperson बनने के लिए जी-जान लगा देते हैं। उनके माता-पिता भी उन्हें नहीं रोकते, क्योंकि उन्हें पता है कि इस field में भी future bright है।

पहले के समय में players को देश के प्रधानमंत्री का साथ मिल जाए, यह तो असंभव ही था।

पर आज, हमारे देश का कोई भी खिलाड़ी, कोई-सा भी खेल अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलता है तो उसे हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी का साथ अवश्य मिलता है।

खेल जीतें या हारें, कोई भेदभाव नहीं, हार में सांत्वना और अगली बार जीतने की प्रेरणा और जीत में अनेकानेक बधाइयाँ। उनके साथ बैठक, उन्हें सम्मान और पुरस्कार आदि...

यह खिलाड़ियों में एक ऐसा जज्बा भर रहा है कि हर कोई पुरजोर प्रदर्शन कर जीत का तिरंगा लहरा रहा है, भारत को विश्व विजयी बना रहा है।

खिलाड़ियों का कहना है कि मोदी जी का personal attention देना, दिल को देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर देता है, मन को एक विशेष सम्मान प्रदान करता है।

ऐसा लगता है कि हम भी हैं, जो भारत को सर्वोच्च स्थान पर ले जा रहे हैं। हम भी भारतीय सैनिकों की तरह अपनी मातृभूमि को अपने पर गर्व करने का अवसर प्रदान कर रहे हैं।

अब वो सिर्फ पैसे कमाने की भावना से ही नहीं, बल्कि देश को सर्वोपरि बनाने के लिए, जीतकर देश को सम्मान दिलाने के लिए खेलते हैं।

अब तो प्रधानमंत्री मोदी जी के साथ ही पूरा देश लगभग हर खेल को देखने में interest ले रहा है, और खिलाड़ियों की जीत की कामना कर रहा है।

जब देश का प्यार, आशीर्वाद और सम्मान मिल रहा है और मोदी जी का पूर्ण सहयोग... तब बस यही कारण है कि अब खेल कोई-सा भी हो, पर जीत भारत की ही हो रही है।

आज भारत एक नई पहचान, “जीतता भारत” के रूप में उभरता जा रहा है।

जय भारत, जय भारतीय खिलाड़ी 🇮🇳