Thursday, 1 July 2021

Short story : डाॅक्टर साहब

 डाॅक्टर साहब 



चन्दन, अपने बाबू जी "दीनानाथ" का अकेला बेटा था। जब वो छह साल का था, माँ तब ही इस दुनिया से विदा हो चुकी थीं।

दीनानाथ जी साधारण सी नौकरी करते थे। जिसमें जीवन यापन हो पाना ही संभव था। ऐसे में पढ़ना-लिखना तो सोचना भी कठिन था।

पर वो अपने लिए कुछ नहीं खरीदते थे, आधा पेट भोजन व पुराना कपड़ा वषों चला कर भी चन्दन को पढ़ा-लिखा रहे थे।

उनकी केवल एक ही इच्छा थी कि चन्दन, एक बड़ा डाॅक्टर साहब बने। 

चंदन भी पढ़ने में बहुत होशियार था। वो भी अपने बाबू जी की इच्छा पूरी करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा था।

उसकी मेहनत और लगन से उसका medical में selection हो गया।

चंद सालों में उसकी पढ़ाई पूरी हो गई और वो डाॅक्टर भी बन गया।

जल्द ही उसकी अच्छी practice चलने लगी। तो उसने घर में ही clinic खोल ली। 

लोगों की दिनभर भीड़ लगी रहती।

चंदन जब तक patient देखता, बाबू जी छत पर टहलते रहते।

एक दिन एक गरीब किसान,‌‌ चन्दन की clinic पर आया। बोला डॉक्टर साहब, मेरी बीवी बहुत बीमार है, कृपया घर चलकर उसे देख लीजिए।

चंदन बोला, मैं घर नहीं जाता हूँ, यहीं लाओ।

वो बोला, यहाँ कैसे लाऊं, मेरे पास रिक्शा भाड़ा का पैसा नहीं है। आप नहीं चले तो वह मर जाएगी। 

आपकी फीस का पैसा भी, मैं फसल कटने पर दूंगा।

अब तो चन्दन कसकर भड़क गया, फीस के पैसे हैं नहीं, जान‌ बचानी है। चल भाग यहाँ से, ना जाने कहाँ से आ जाते हैं भूखे नंगे।

अभी वो चिल्ला ही रहा था कि बाबूजी, नीचे आ गये और किसान से बोले, तुम अपना पता मुझे लिखवाओ और घर जाओ। डाॅक्टर साहब अभी पहुंचते हैं। 

किसान के जाते ही बाबू जी ने रौद्र रूप धारण कर लिया और अपनी चप्पल हाथों में उठा ली।

चंदन तू अभी जा रहा है या बताऊं?

बाबूजी का रौद्र रूप देखकर चंदन डर गया, उसने उनका ऐसा रुप कभी नहीं देखा था।

जी, चला जाऊंगा पर फीस?

चुप रह.....

मैंने तुझे रक्षक बनाने के लिए डाॅक्टर बनाया था, फीस के लिए नहीं।

डाॅक्टर रुपए कमाकर डाॅक्टर साहब नहीं बनते हैं, बल्कि रक्षक बनकर डाॅक्टर साहब बनते है।

तेरे जैसी सोच वाले डॉक्टर, रक्षक नहीं भक्षक होते हैं। तुझे पैसे चाहिए? तो मुझसे लेकर जा। पर उसे ठीक कर के आ। 

आज उसकी बीवी मर गई तो मुझे लगेगा कि तेरी माँ, एक बार फिर मर गई है। यह कहकर वो फफक-फफक कर रो पड़े।

काश मेरे पास पैसे होते, तो तेरी माँ भी बच जाती या वो डाॅक्टर भक्षक ना होता, रक्षक होता, तो आज तेरी माँ, हमारे साथ होती। 

आज चंदन ने पहली बार बाबू जी को रोते हुए देखा था। 

अपने पिता के दुःख से वो द्रवित हो गया, साथ ही उसे समझ आया था कि उसके पिता उसे क्यों डाॅक्टर बनाना चाहते थे। 

वो तुरंत ही किसान के घर चला गया, उसके प्रयासों से उसकी पत्नी बच गयी। किसान को वह कुछ पैसे भी दे आया। जिससे वह खाने-पीने का सामान और दवा खरीद सके।

उसके बाद चंदन ने कभी फीस की परवाह नहीं की। जो सामर्थ्यवान थे उनसे पैसा लेता था और जिनके पास पैसों का अभाव था, उन्हें free में देखता था। 

जब वो रक्षक बन गया था, तब से सही मायने में वो डाॅक्टर से डाॅक्टर साहब बन गया था।

Happy Doctor's Day 🏥👨‍⚕️👩‍⚕️

Wednesday, 30 June 2021

Tips : Smart uses of aluminum foil

आज हम आपको एक ऐसी Tip share कर रहे हैं, जिसे पढ़कर आपको लगेगा, इसका यह use भी किया जा सकता है?

आप ने aluminum foil को wrapping के लिए बहुत बार use किया होगा, पर हम आपको उसके smart use बताने जा रहे हैं।

आप इन tips को use कीजिए और daily use में होने वाली परेशानी से छुटकारा पाएं।

Smart uses of aluminum foil

1. Popcorn को aluminum foil में wrap करके pop करने से वो scatter नहीं होते हैं, जिससे जलने का डर नहीं रहता है और popcorn ज्यादा अच्छे से pop होते हैं।

2. Grater से grate करने से पहले, aluminum foil से grater पर ऐसे move कर लीजिए, जैसे grate कर रहे हों। इससे grater की sharpness बढ़ जाती है, जिससे grating अच्छी होती है।

3. Scissor, knife अगर sharp ना हो तो आप foil को पहले cut कर लीजिए, इससे scissor व knife  की sharpness बढ़ जाती है। फिर आपको जिस चीज़ को भी काटना है, उसे काट लीजिए।

4. अगर आप किसी चीज़ की pic खींच रहें हों और आप के पास कोई अच्छा background नहीं है तो आप aluminum foil को crumble कर के open कर लीजिए। इससे अच्छा background बन जाएगा।

5. अगर आप के पास कोई ऐसा furniture है जिसमें wheels नहीं लगे हों, उन्हें खिसकाना चाह रहे हैं तो उसके नीचे aluminum foil के टुकड़े को तीन चार बार fold कर के furniture के पैर के नीचे रख दीजिए और फिर खिसका दीजिए, तो वो आसानी से खिसक जाएगा।

Tuesday, 29 June 2021

Article : रिश्तों में तुलना क्यों

रिश्तों में तुलना क्यों


अक्सर लोगों को यह कहते हुए "हमारी बहू बिल्कुल बेटी जैसी है" या  "हमारी सास‌ बिल्कुल माँ जैसी है" बहुत गर्व महसूस होता है। 

पर रिश्तों में तुलना क्यों? 

कभी कोई यह नहीं कहता है कि हमारी मम्मी, बिल्कुल पापा जैसी हैं या पापा, बिल्कुल मम्मी जैसे हैं। क्योंकि पापा, पापा जैसे ही होते हैं और मम्मी, मम्मी जैसी। 

किसी को किसी के जैसा होना भी क्यों है? किसी के जैसा बनना अपने अस्तित्व पर प्रहार करना है।

बेटी जैसी बहू या माँ जैसी सास, आखिर क्यों चाहिए? क्या यह वाक्य सास या बहू के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाता है?

सास या बहू होने में माँ और बेटी जैसे होने का प्रमाण-पत्र क्यों ज़रुरी है?

सास या बहू होना क्या इतना बुरा है? क्या वो इसी रूप में अच्छी नहीं हो सकती हैं?

कोई ऐसा भी क्यों कहता है कि, मैं अपनी सास को माँ जैसा मान दूंँगी। क्या सास का अपना कोई मान नहीं होता है? या वो मान देने लायक नहीं होती हैं?

यही बात तब भी लागू होती है, जब लोग कहते हैं कि बहू को बिल्कुल बेटी जैसा प्यार देंगे। क्या बहू के लिए कोई प्यार नहीं होता है? या उसको देने वाला प्यार देने लायक नहीं होता है? 

सास, सास होती है। माँ नहीं

बहू, बहू होती है, बेटी नहीं।

यह तुलना ऐसी नहीं है, जैसे आम से कहा जाए कि तुम सेब जैसे गुणकारी नहीं हो, या सेब से कहा जाए कि तुम आम जैसे स्वादिष्ट और गुदे से भरपूर नहीं हो।

जब बेटी होती है तो वह कोरी किताब होती है, गीली माटी होती है। तब हर माँ अपनी बेटी को हर छोटी-बड़ी बात सिखाती है, उसे संस्कारों के शब्दों से परिपूर्ण करती है। जिससे वो स्वावलंबी बनाती है और एक सुदृढ़ मूर्त रूप में बदल जाती है।

जब वही लड़की, विवाह उपरांत अपने ससुराल आती है, तब वह बहुत कुछ सीखकर आती है। एक सुदृढ़ मूर्त रूप में होती है।

सास, माँ जैसी कैसी हो सकती है, जबकि उसे तो बहू सुदृढ़ मूर्त में संस्कारों से परिपूर्ण मिली है।

सास अपनी बहू को हर कार्य में निपुण बनाकर सम्पूर्ण बनाती है। उसे जीवन में सफल व समृद्ध बनने में सहयोग प्रदान करती है।

उसी तरह से जब एक बेटी जन्म लेती है तो उसकी किलकारी से पूरा घर गूंज उठता है। उसके बचपन से पूरा घर वापस से अपना बचपन जी लेता है।

वहीं बहू पराए घर से आती है। अपना बचपन कहीं पीछे छोड़ कर आती है, तो वो बेटी जैसी कहाँ हो सकती है? और हो भी क्यों, वो बेटी जैसी? जबकि उसका स्वरूप और कर्तव्य ही अलग है।

वह तो लक्ष्मी स्वरूपा होती है। वो घर को समृद्धि से परिपूर्ण करती है। वंश को आगे बढ़ाती है।

तो जब स्वरुप व कर्तव्य सब अलग हैं, तो तुलना क्यों?

ऐसी अपेक्षा करना ही संबंध में दूरी बढ़ाता है, जो दुःख का पर्याय बन जाता है।

सास को सदैव सम्मान दें, क्योंकि वह आपकी ज़िन्दगी को सम्पूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

बहू को सदैव प्रेम करें, वो ही आपके वंश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

तुलना सदैव दूरी बढ़ाती है, जबकि सबके अस्तित्व को सम्मान, प्यार देने से आपसी सम्बन्ध सुदृढ़ होते जाते हैं। 

इसलिए तुलना बंद करें और सुखपूर्वक रहें😊