Thursday, 10 September 2026

Story of Life : मजबूरी का सौदा (अंतिम भाग)

मजबूरी का सौदा (भाग-1) के आगे…

मजबूरी का सौदा (अंतिम भाग)


उसने पूरे गांव में मुनादी करवा दी, कि जिसने-जिसने भी उससे पैसे उधार लिए थे, वो सब जिस भी हालात में हैं, आज तुरंत ही उसके घर पर पहुंचे।

अब पैसा उधार लिया था, तो जाना तो पड़ता ही। सब पहुंच कर हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगे, थोड़ी और मोहलत दे दें वो जल्दी ही सारा पैसा चुका देंगे। वैसे भी उनके पास गिरवी रखने को और कुछ नहीं है।

रमाकांत ने सबको शांत किया और सबके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि रमाकांत को आज क्या हो गया है?

रमाकांत ने कहा- “शिवा मेरा एकलौता बेटा है और बहुत बीमार है। उसका बहुत इलाज कराया है, गांव में बड़े-बड़े शहरों के बड़े-बड़े hospitals में दिखाया पर कोई उसे ठीक नहीं कर पा रहा है।”

“फिर एक बहुत महान बाबा के पास गया, तो उन्होंने कहा कि मेरे काम के दुष्प्रभाव के कारण ही मेरा बेटा इतना बीमार पड़ गया है और ठीक नहीं हो रहा है।”

“उनका कहना था कि तुम लोगों को पैसे उधार देकर तुम्हारी मदद नहीं कर रहा हूं, बल्कि बदले में अपने और अपने परिवार के लिए हाय एकत्रित कर रहा हूं। मैं मजबूरी का सौदा करता हूं।”

“इसलिए आज मैं तुम लोगों के सारे पशु, ज़मीन, घर वापस कर रहा हूं। और आगे से ब्याज पर पैसा नहीं दूंगा।”

यह सुनकर सब बहुत खुश हो गये कि उनके पशु, जमीन और घर वापस मिल जाएंगे। पर जब पता चला कि आगे से पैसा उधार नहीं मिलेगा, सुनकर सब दुःखी भी हो गये कि आगे ज़रूरत पड़ने पर किससे पैसा उधार मांगगे?

सब समवेत स्वर में बोलने लगे, “साहूकार जी, भले हमारा सब कुछ गिरवी रखा रहने दीजिए, पर अगर आप पैसा उधार नहीं देंगे तो हम किस दर पर जाएंगे? कौन हमारा माई-बाप है?”

रमाकांत ने कहा- “मैंने ब्याज पर पैसा देने को मना किया है, उधार देने को नहीं। मैं ज़रूरतमंदों को पैसा उधार दे दूंगा, लेकिन दोबारा उधार पहले का पैसा चुकता हो जाने पर ही दूंगा।”

रमाकांत साहूकार के दयावान स्वरूप को देखकर गांव वालों ने उसकी खूब जय-जयकार की, फिर उसके बेटे शिवा के जल्दी ठीक होने की कामना करते हुए वो ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट गए।

चंद दिनों में ही शिवा के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा और वह पूर्णतः ठीक हो गया।

रमाकांत समझ चुका था कि मजबूरी का सौदा करके नहीं, बल्कि मजबूरों की मदद करने में सच्ची खुशी है।

रमाकांत को पूरे गांव ने सिर आंखों पर बैठा लिया, अब उसके पास बहुत अधिक धन-दौलत नहीं थी, पर लोगों के मन में उसके लिए मान-सम्मान और प्यार बहुत अधिक था..