Wednesday, 18 December 2019

Short Stories : जंग


जंग 


हर जगह फिर से वही आगजनी, तोड़फोड़, दंगे हो रहे थे। नन्हा रतन माँ की गोद में, सिमटा जा रहा था। 

उसे दूर से आती हुई शोर मचाने, चीखने-चिल्लाने की आवाज़े, और साथ ही कुछ लोगों के कराहने की आवाज़ें अंदर तक डरा रही थी।

उसने माँ से पूछा, ये सब क्यों हो रहा है?

माँ बोली, बेटा लोग किसी बात का विरोध कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने ये जंग छेड़ दी है।

पर माँ, teacher ने तो बताया था, जंग दुश्मनों को खत्म करने के लिए की जाती है। फिर ये लोग अपने ही देश में बरबादी करके 
किस दुश्मन को खत्म कर रहे हैं?

माँ सोच रही थी, जो बात उसके छोटे से रतन को समझ आ गयी, वो बड़ों को क्यों समझ नहीं आती है? अपने ही देश में बरबादी करके वो किससे जंग लड़ रहे हैं।

Tuesday, 17 December 2019

Story Of Life : पड़ाव (भाग-2)

पड़ाव (भाग-1) के आगे... 


पड़ाव (भाग-2) 



ज़िंदगी यूँ ही चलती रही, कभी मेरे मन की बातें भी होती रही। 

अब मैं युगल से परिवार में बदल चुकी थी। बच्चों के छोटे बड़े फैसले लेते हुए, वो ना जाने कब जवान हो गए। कभी अच्छे कभी बुरे पल आते रहे, ज़िंदगी अपनी करवटें लेती रही। 

एक दिन वो भी आ गया, जब मुझे अपने बच्चों के जीवन साथी ढूंढने थे। आज मेरा वो नज़रिया था, जो माँ का था, और बच्चे मेरी तरह सोच रहे थे।

मैंने उन्हें बहुत प्यार से उनकी नानी और अपनी बात समझाई, 
बेटी ने तो बात मन ली, और हमारी पसंद के लड़के से शादी कर ली। वो बहुत सुख से अपना जीवन जी रही है। पर बेटा अड़ गया, कि उसकी पसंद से अच्छी कोई नहीं है।

कुछ दिन तक बेटे-बहू ने शादी घसीटी, पर तीन साल में उनकी शादी ने दम तोड़ दिया। फिर बेटा मेरे पास आया, माँ आप सही कहती थी। अनुभव से बढ़कर कुछ नहीं।

कुछ साल बाद बेटे को भी हमारी पसंद की प्यारी सी लड़की 
मिल गयी, अब  बेटा-बहू दोनों बहुत खुश थे।

मेरी ज़िंदगी अपनी रवानगी से चल रही थी, मेरी पच्चीसवीं anniversary आने वाली थी।


मेरे पति को मेरी पहली anniversary की इच्छा याद थी। सास-ससुर तो अब थे नहीं उन्होंने बेटे-बहू से बात की। 

उन्हें मेरे मन के अरमान बताए, वे बोले माँ ने अपने मन की ना करके हमेशा हम सब के लिए किया है। 25वीं anniversary जिंदगी का बड़ा पड़ाव होता है, हमे खूब धूम से करना चाहिए।

मुझे बिना इस बात के भनक लगे, सबने मिलके बहुत बड़ा होटल book किया, काफी सारे लोगों को invitation दिया गया, ऐसा भव्य आयोजन मानों शादी ही हो।

जब बहू मुझे parlour ले गयी, तब मुझे समझ...... 

आगे पढ़े पड़ाव (भाग-3) में...

Monday, 16 December 2019

Story Of Life : पड़ाव

पड़ाव

मैं अल्हड़ जवान अपनी ही मस्ती में रहा करती थी। युवा हो चुकी थी, पढ़ने में अच्छी थी, तो पढ़ाई और नौकरी भी जल्दी ही शुरू कर दी थी।

अब माँ के सर पर बस यही धुन सवार रहती कि अपनी लाडो के लिए योग्य वर तलाश कर दूँ।

मेरे लिए बहुत से रिश्ते आ रहे थे, आखिर रंग रूप और अच्छी नौकरी सब तो थी मेरे पास। रिश्ते भी एक से बढ़कर एक आ रहे थे, फिर भी कहीं बात नहीं बन रही थी

नहीं…. ना वहाँ से नहीं हमारे घर से ही हो रही थी। जानते हैं क्यों? क्योंकि मेरी और माँ की पसंद एक नहीं हो रही थी।

माँ की अनुभवी आंखे, घर-परिवार, लड़के की नौकरी, उसके ऊपर होने वाली ज़िम्मेदारी सब देख रही थीं। और मेरा बांवरा मन अपने hero जैसे राजकुमार को तलाश रहा था।


आखिर में माँ की पसंद को ही जीत मिल गयी, क्योंकि लड़का भी देखने में ठीक था।

शादी धूम से हो गयी, मैं अपनी ससुराल में खुश थी।वैसे बहुत सी बातों में मेरे पति और ससुराल वाले बिल्कुल अलग सोचते थे, पर माँ के संस्कारों ने adjust करना अच्छे से सिखाया था।

मेरी पहली anniversary आई, मन ने बड़े सपने सजाये थे। बहुत बड़े hotel से खूब लोगों को बुलाकर धूम से अपनी anniversary मनाएंगे।

पर सोच तो मिलती नहीं थी, तो मेरी सोच के विपरीत कथा का आयोजन किया गया। उसमें में भी घर के खास लोगों को बुलाया गया था, उन्हें भी बस प्रसाद देकर विदा कर दिया गया।

मन अन्दर तक आहात हुआ, जब इस बात को गुस्से के साथ पति से इज़हार की, तो वो बोले, तुम समझती क्यों नहीं हो? 

एक तो शादी में इतना खर्च हो गया, ऊपर से हमे खुशहाल देखकर लोग जलते, नज़र लगाते। फिर सब प्रसन्नता से चल रहा है, तो इसके लिए तो ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए, इसलिए माँ ने कथा का आयोजन किया था।

मन उनकी बात से खुश नहीं था, पर मानने के सिवा चारा भी क्या था।

ज़िंदगी.......

आगे पढ़ेंपड़ाव (भाग-2) में...