Monday, 3 June 2024

Short Story : दो मासूम आँखें

आज hospital गए थे, अपनी आँखों को दिखाने के लिए routine check-up में।

जैसा कि आप जानते हैं कि हम एक blogger हैं, तो जो writers होते हैं, उनकी आँख, नाक, कान औरों की अपेक्षा कहानी बुनने में थोड़ी ज़्यादा तेज़ होती है, सो हमारी भी है। अब आप इसे अच्छी कहें या बुरी, पर आदत है तो है।

आज वहीं की एक बात साझा कर रहे हैं। आज की कहानी एक मासूम बच्चे की है। 

दो मासूम आँखें

एक छोटा बच्चा, आरव अपने मम्मी-पापा के साथ आया था, अपनी आँख की किसी problem के regarding.

नहीं पता कि उसको exactly क्या problem थी, पर कहानी उसकी आँखों की problem पर नहीं है।

उस छोटे-बच्चे से उसके पापा बोले रहे थे, "आरू, आपसे doctor uncle पूछेंगे कि आप कितना mobile देखते हो, और आप जैसे ही बताओगे कि बहुत देर तक, वैसे ही वो आपके injection लगा देंगे।"

सुनकर आरव ठुनठुनाने लगा, आजकल के बच्चों की तरह, वो भी बहुत ज़्यादा mobile देखा करता था। उसका भी screen time बहुत ज़्यादा था। आजकल बच्चों में यह समस्या बढ़ती जा रही है, जिससे उनको eyesight की problem रहने लगी है।

"पापा, मैं injection नहीं लगवाउंगा, please, please. मत लगवाइए ना…"

वो बोले, "मैं क्या कर सकता हूँ, doctor uncle जैसे ही सुनेंगे, कि तुम इतना mobile देखते हो, तुम्हें injection लगा देंगे।

"नहीं, नहीं पापा। अब से मैं mobile नहीं देखूँगा, TV देखूँगा।"

"अच्छा, TV देखोगे, mobile नहीं देखोगे?"

"हाँ पापा, नहीं देखूँगा mobile. बस आप doctor uncle से कह दीजिएगा, कि वो injection ना लगाएँ। Please, बोल दीजिएगा ना…"

"अच्छा ठीक है, बोल दूँगा।"

"नहीं लगाएँगे फिर injection?" आरव ने मासूमियत से पूछा।

"हाँ, हाँ। नहीं लगाएँगे injection, क्यों लगाएँगे? जब तुम mobile नहीं देखा करोगे।"

"पापा, अब से मैं पढ़ाई भी खूब करूँगा।"

उसके पापा हँस दिए। 

तभी आरव को दिखाने की call आ गई, और वो खुशी-खुशी doctor को अपनी आँख दिखाने चला गया, अपनी mummy को bye करके।

कहानी बस इतनी-सी है। लेकिन जो आपसे बात कहनी है, वो यह है, कि बच्चे भी जानते हैं कि mobile screen कम देखनी चाहिए, वो हमारी आँखों को नुकसान करती है।

पर आजकल बच्चों का बहुत ज़्यादा mobile देखने का trend-सा चल गया है। कुछ हम लोगों की बच्चों से free रहने की चाहत, कुछ आधुनिकता, और कुछ बच्चों का mobile देखने का खिंचाव।

Result है दो-चार साल से ही चश्मिश बच्चे…

आप बोलेंगे कि screen देखने में ऐसी भी क्या problem है?

Actually भगवान ने हमारी आँखें दूर-पास, सब देखने के लिए बनाई है, और लगातार पास देखते रहने से वो थक जाती हैं, exhaust हो जाती हैं, और finally खराब हो जाती हैं।

इसलिए, बच्चों को mobile उतना ही use करने के लिए दीजिए, जितना ज़रूरी है। अपने free रहने, या उनके addiction के लिए नहीं।

इन मासूमों की आँखें healthy रहें, इसका ध्यान रखना हमारी duty भी है, और ज़रूरी भी है।


Saturday, 1 June 2024

India's Heritage : अयोध्या के रक्षक

आज आप के साथ India's Heritage segment में एक ऐसी कहानी साझा कर रहे हैं कि मानो तो आस्था, ना मानो तो मनगढ़ंत कहानी... 

पर यह कहानी हमारी बनाई गई नहीं है, बल्कि सत्य घटना है।

अयोध्या के रक्षक


बात आज की नहीं है, सन् 1998 की है।दुश्मन की नज़र रामलला की जन्मस्थली के अयोध्या हनुमानगढ़ी मंदिर पर थी।

6 December 1992 को बाबरी मस्ज़िद ढाई जा चुकी थी, और बदला लेने की भावना बलवती हो चुकी थी। 

उन्हें मौका भी मिल गया और उन्होंने अयोध्या हनुमानगढ़ी पर बम लगा दिए, इस तैयारी से कि हनुमानगढ़ी मंदिर के साथ-साथ ही अयोध्या का भी बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया जाए। 

पर बम लगाए जाने की जानकारी पुलिस दल को मिल गई। इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा, जो कि इस पुलिस दल के प्रमुख थे, अपने दल, 3 bomb squads, sniffer dogs और STF (Special Task Force) के साथ हनुमानगढ़ी मंदिर पहुंच गए। पूरा हनुमानगढ़ी मंदिर लोगों से खचाखच भरा हुआ था।

बम बहुत अच्छी जगह छुपाए गए थे, जैसे handpump के अंदर etc.

पुलिस दल, तीनों bomb squads और sniffer dogs बहुत निपुण थे, उन्होंने बहुत जल्दी ही तीनों बम defuse कर दिए।

बम defuse होने के बाद सब खड़े होकर इस बात की खुशी ही मना रहे थे, कि तभी पुलिस प्रमुख को एक और bomb squad दिखा। 

पर साथ तो तीन ही आए थे, तो यह चौथा कौन था?

बहुत ही फुर्ती के साथ एक पुलिस वाले ने उसका पीछा किया। वो कोई bomb squad नहीं, बल्कि एक आतंकवादी था। उसने हनुमानगढ़ी मंदिर में बम लगा दिया था।

पुलिस वाले की फुर्ती और अविनाश जी की सूझबूझ से वो आतंकवादी पकड़ा गया। पर उसने कैसे भी नहीं बोला कि उसने बम, मंदिर पर किस ओर लगाया है? बोला तो बस इतना कि कोई नहीं ढूंढ सकता कि बम कहां है? तुम्हारे पास चंद मिनटों का समय है। आज बम फटने से तुम्हारे भगवान भी नहीं रोक सकते हैं।

आतंकवादी मंदिर के बाहर पकड़ा गया था, उसे कुछ पुलिसकर्मियों ने पकड़ कर रखा, बाकी बड़ी तेजी से मंदिर की ओर दौड़ पड़े।

मंदिर पर बम ढूंढा जाने लगा, पर कहीं कुछ समझ नहीं आ रहा था, कि बम कहां हो सकता है? समय रेत की तरह हाथों से निकला जा रहा था।

तभी पुलिस वालों ने देखा कि ठंडे पानी की मशीन से दो तार निकल रहे हैं और एक छोटा बंदर उसका दूसरा सिरा अपने मुंह में डाले हुए हैं।

यह सब देखकर उन्हें लगा कि बम शायद यही हैं, पर बम defuse करने के लिए बंदर का हटना जरूरी था। 

तभी अविनाश जी ने कहा कि केले को डाल दो, बंदर चला जाएगा, उसे किसी तरह का कोई नुक्सान ना पहुंचे। 

मंदिर का प्रांगण था तो तुरंत ही केले मिल गए। बंदर की तरफ केले को फेंक दिया गया।

बंदर ने तार छोड़ दिया और केले लेकर मंदिर की चोटी पर पहुंच गया।

एक बम squad आगे बढ़ा और उसने बम को defuse करने का इशारा कर दिया, सब की जान में जान आई।

पर आश्चर्य तब हुआ, जब squad ने बताया कि उसने सिर्फ timer बंद किया था, बम तो उस बंदर ने चंद मिनट पहले ही निरस्त कर दिया था। 

सब बस उस बंदर को देख रहे थे और सोच रहे थे कि "जिसके रक्षक हों स्वयं हनुमान, उसका फिर क्यों ना हो कल्याण"...

सही भी तो है :

सब सुख लहै तुम्हारी शरण 

तुम रक्षक काहू को डरना 

थोड़ी देर बाद सब समवेत स्वर में बोले,

जय श्री राम🚩

जय बजरंग बली 🚩

भारत देश है जन्मस्थली प्रभू श्री राम की, कृष्ण भगवान की, आज भी श्रद्धा हो तो ईश्वरीय चमत्कार दिखाई दे जाते हैं...

Friday, 31 May 2024

Article : कारण भीषण गर्मी का

गर्मी अपने पुरजोर पर है, हर जीव त्राहि-त्राहि कर रहा है। फिर वो पेड़-पौधे हों या जीव-जन्तु, या हों पशु-पक्षी या इंसान, सब की हालत त्रस्त है।

ना पानी है ना छाया..., है तो बस कंक्रीट की दीवारें और पैसों की माया। और इसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हम इंसान हैं और हमारा हद का स्वार्थ और अथाह लालच।

आधुनिकता की अंधी दौड़ और बेपनाह पाने की जिद्द ने हमें इस कगार पर ला दिया।

सोचिए जरा एक बार…

कारण भीषण गर्मी का

हमें नदी से पानी नहीं रेत चाहिए, वृक्ष से छाया नहीं लकड़ी चाहिए, पहाड़ों से औषधि नहीं पत्थर चाहिए, खेत से अन्न नहीं नकदी फसल चाहिए।

बस इस अंतहीन भूख ने नदियों को सुखाकर रेत समेट ली, और बना दी चौड़ी कंकरीली सड़क, पहाड़ तोड़कर बटोर लिए पत्थर मकान के लिए और पेड़ों का अस्तित्व बदलकर नक्काशीदार खिड़की और दरवाज़े बना डाले।

और अन्न, उसका तो कहना कि क्या, थोड़ा ज्यादा अनाज, थोड़ा और, थोड़ा और की इच्छा ने अन्न को धीमे-धीमे, slow poison बना दिया है। मतलब अन्न, जो कि जीवनदायनी होना चाहिए, वो और की चाहत में मौत का सामान हो गया ...

वाह रे इंसान! क्या छोड़ा पृथ्वी पर उसके अस्तित्व के लिए, उसे तुम्हें खुशहाल रखने के लिए?

कितनी सटीक हैं यह lines, जिसने भी लिखी है :


अब भटक रहे हैं !!

सूखे कुओं में झाँकते,

रीती नदियाँ ताकते,

झाड़ियां खोजते लू के थपेड़ों में,

बिना छाया के ही हो जाती सुबह से शाम !!

और गली-गली ढूंढ़ रहे हैं आक्सीजन,

फिर भी सब बर्तन खाली !!

सोने के अंडे के लालच में,

मानव ने मुर्गी मार डाली !!


बस सिर्फ यही और यही कारण हैं, भीषण गर्मी के...

और आपको पता है, प्रकृति में वो क्षमता है कि वो हर क्षण अपने को revive कर सकती है, अगर आज से भी हम प्रकृति को संवारने की ओर ध्यान केंद्रित करेंगे तो वो फिर से जीवन को सुख और समृद्धि से भर‌ देगी, यकीन ना हो तो याद कीजिए, lockdown के बाद पूरी प्रकृति rejuvenate हो गई थी... मात्र चंद महीनों में...

जीवन के लिए ज़रूरी है, जीवन प्रकृति का...

उसमें मौजूद रहना नदी, पेड़, पहाड़, दरिया, पशु-पक्षी का…

अगर सुख-चैन चाहिए तो इस बात का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा…

दीपावली और होली पर उधम मचाने वालों, कुछ ध्यान दिनभर चलते AC और दौड़ती कारों पर रोक लगाने पर भी देना, त्यौहारों से रौनक कम करने से ज्यादा ज़रूरी है, अपने सुख का कुछ परित्याग...

कर सकेंगे??