Monday, 23 December 2019

Article : यूँ ना करे बरबादी


यूँ ना करे बरबादी


आज देश हिंसा की आग में जल रहा है, पर यह किस हद तक ठीक है?

जो लोग ये कहते हुए  विरोध में जगह-जगह बसें, कारें, ऑफिस, पुलिस-थाने फूँक रहे हैं, कि हम देश में यह bill pass नहीं होने देंगे। तो इसका अर्थ तो ये हुआ ना कि आप देश को अपना मानते हैं? मानते क्या हैं, देश आप का ही है। तो क्या देश की संपत्ति आपकी नहीं है?

अगर यूँ ही तबाही मचाई जाएगी, तो उससे नुकसान देश का ही होगा, मतलब आपका ही होगा।

तो ये कैसा विरोध, जहाँ आप अपना ही नाश करने पर तुले हैं।

और यह बताइये, किस देश में नागरिकता का कानून नहीं है? तो अगर भारत में भी होगा, तो क्या गलत है?

किसी भी देश में नागरिकता कानून होने से यह पता चलता है, कि उसमें कितने नागरिक अपने हैं, और कौन बाहर से आया है। अगर बाहर से आने वालों को easily locate कर सकेंगे, तो देश की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ जाएगी, बेवजह के आतंकवादी हमले नहीं होंगे।

तो क्या आप नहीं चाहते कि देश सुरक्षित रहे?

नागरिकता कानून होने से नागरिकों की सही गणना होगी, उससे देश की अर्थ व्यवस्था ठीक रहेगी। तो क्या आप नहीं चाहते, देश की अर्थ व्यवस्था सुदृन हो?

नागरिकता कानून होने से हर कोई यूँ ही देश में प्रवेश नहीं कर सकेगा, इससे हमारे देश की महत्ता भी बढ़ जाएगी। तो क्या आप नही चाहते, जैसे अमेरिका की नागरिकता मिलना मुश्किल है, तो लोगों में अमेरिका जाने का craze रहता है, जिससे लोगों को वो एक विशेष देश लगता है। ऐसी ही विशेष देश भारत भी बन जाए।

फिर नागरिकता कानून होने से देश में रह रहे किसी भी नागरिक को कोई भी हानि नहीं पहुँच रही है, तो बरबादी क्यों?

हमारे अनुसार तो मोदी जी, आप यह भी एक कानून बना दीजिये, कि जो देश की संपत्ति को हानि पहुँचाए, देश के लिए अपशब्द बोले या उसके राष्ट्रीय संपत्ति का अपमान करे, या देश के लिए मुर्दाबाद के नारे लगाए, या हमारे देश का नाश करने के लिए अन्य देश का साथ दे, उन सब की भी नागरिकता रद्द कर दी जाएगी। 

देश का विकास और सुरक्षा ही सर्वोपरि है, उसमें सहयोग प्रदान कीजिये, ना कि यूँ बर्बादी कीजिये।

जय हिन्द, जय भारत...

Friday, 20 December 2019

Story Of Life : पड़ाव (भाग-4)

पड़ाव (भाग-1)...
पड़ाव (भाग-2)... और 
पड़ाव (भाग-3)... के आगे  
पड़ाव (भाग-4) 

पति जब अन्दर आए, तो उनके बालों में आई सफेदी मुझे बहुत भा रही थी।

जब मैंने उनकी तरफ पति को इशारे से बताया, तो वो झेंपते हुए बोले, अरे तुम्हारे बेटे की सुनता तो वो इन्हें भी काले कर देता। पर उम्र से इस पड़ाव पर थोड़ी सफेदी अच्छी लगती है, तुम्हें नहीं लगी?

मैं उनके नज़दीक जाकर बोली, मुझे आज सारे प्रोग्राम में सबसे अच्छी यही लगी। उन्होंने ज़ोर से ठहाका लगाया। फिर हम दोनों घंटों जीवन के उतार-चढाव के बारे में बात करते रहे।

बात करते-करते पति नींद के आगोश में चले गए, और मुझे हँसी आ गयी।

मैं अवलोकन करने लगी, कैसे जब मैं अल्हड़ थी, किस सोच की थी। मुझे राजकुमार चाहिए था, पर माँ की पसंद ने जीवन संवार दिया। 

पहली रात भी पति सो गए थे, तब कितना क्रोधित हुई थी, आज हँस रही हूँ।

जो सपने 1st anniversary के थे, वो 25th anniversary में पूरे हुए।

पर खुश तब भी नहीं थी, और आज भी वो खुशी नहीं मिली।

शायद इसलिए क्योंकि आज मन कथा की सोच रहा था। 

फिर लगा, ज़िंदगी के हर पड़ाव की इच्छा भी अलग होती है, और खुशी भी। 

क्योंकि अनुभव तब तक जीवन की हकीकत समझा चुका होता है।

खुशी अपनों के साथ, ईश्वर की कृपा और संतुष्टि में ही है, बाकी तो सब क्षण भंगुर है। आज मैं ऐसे पड़ाव पर आ चुकी हूँ, जहाँ से जीवन क्या है, साफ दिखता है।

Thursday, 19 December 2019

Story Of Life : पड़ाव (भाग-3)

पड़ाव (भाग-1)... और
पड़ाव (भाग-2)... के आगे...
पड़ाव (भाग-3) 

जब बहू मुझे parlour ले गयी, तब मुझे समझ नहीं आया, सारी जवानी तो बिना parlour के निकाल दी, तो आज क्यों? खैर बहू की इच्छा के आगे चुप रही। 

जिस दिन anniversary थी, मैं पूजा-पाठ की तैयारी में जुट गयी, और इंतज़ार करने लगी कि पंडित जी आने वाले होंगे। 

पर मेरी सोच के विपरीत कोई पंडित नहीं आए। मन खिन्न हो गया, सास थीं, तो कम से कम कथा हो जाती थी, आज तो वो भी नहीं।


शाम को बहू मुझे फिर parlour ले गयी, जहाँ उसने मुझे दुल्हन सा 
सजा दिया। कुछ समझ नहीं आ रहा था, आखिर इतनी साज-सज्जा क्यों?


फिर मैं और बहू उस होटल में पहुँचे, जहाँ मेरे पति, बेटा, बेटी, दामाद और बहुत सारे मेहमान थे, वो भी जिनकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।



सब उससे भी अच्छा था, जैसा मैंने पहली anniversary में कल्पना की थी।बहुत बड़ा cake, बिल्कुल फिल्मी set जैसी decoration, और सब से मिल रहा VIP treatment, बहुत सारी variety वाला menu, सब कुछ मेरी कल्पना से परे, मानों मैं सपनों की दुनिया में पहुँच गईं हूँ, कुछ पल तो मैं सपनों की दुनिया में ही रही। 

पर जब धरातल में लौटी, तो सोचने लगी, ऐसी 25 anniversary तो नहीं सोची थी मैंने।


पर बच्चों और पति का जोश और मुझे खुश करने की चाह ने चेहरे पर खुशी बरकरार रखी।


घर पहुँची, तो हमारा कमरा तो बेटे-बहू के कमरे से भी ज्यादा सुन्दर सजा था। ऐसा तो तब भी ना सजा था, जब मैं नयी नवेली आई थी। बेटे और बेटी ने कान में धीरे से कहा, ये सब बहू ने सजाया है।


कब आ कर उसने किया, मुझे तो एहसास ही नहीं हुआ, हाँ याद आया, हमे खाने की table में बैठाकर हम लोगों की ज़िम्मेदारी बेटी को सौंप कर वो आधे घंटे के लिए दिखी नहीं थी। शायद तब यहीं आई होगी।


बच्चों के सामने कमरा सजा देखकर मुझे इतनी लाज आई, कि बिना किसी के कहे, मैं अन्दर चली गयी।


पति जब अन्दर आए, तो...

कहानी का अंतिम भाग पढ़ें पड़ाव(भाग-4) में...