Friday, 18 February 2022

Short Story : Vote on sale

Vote on sale



चुनाव का समय चल रहा था। बहुत से प्रतिद्वंद्वी चुनाव के समर में शामिल थे। 

राधवेन सत्ता का मंझा हुआ खिलाड़ी था, उसे पता था गांव के भोले-भाले लोगों को कैसे ठगा जा सकता था। उसने पूरे गांव के हर घर में 200 rs., 4 kg. चावल और 1 दारू की बोतल बांट दी, और सबको हिदायत दे दी गई कि वोट उसे ही दें।

चुनाव के नतीजे निकले और वही हुआ, जो होना था। राघवेन चुनाव जीत गया।

चुनाव जीतने के साथ ही राघवेन ने अपना गुंडाराज मचाना शुरू कर दिया। हर जगह आतंक, लूटपाट, दुराचार आरंभ हो गया। 

राघवेन के भाई धीरेन की किराने की दुकान थी। सरकारी खर्च पर मिले राशन से धीरेन के गोदाम भरने लगे, जिससे गांव वालों को ऊंचे दामों में राशन मिलता। 

गांव में जगह-जगह गंदगी का अंबार लगने लगा, सड़कों की हालत खस्ता होने लगी।

किसानों के खाते में आने वाले रुपयों का मात्र 10% ही उन्हें मिलता। बाकी से राघवेन की तिजोरी भरती। 

ऐसे ही चार साल बीत गए।

पूरा गांव त्रस्त था। सभी राधवेन के घर जाकर गुहार लगाने लगे कि हमें न्याय चाहिए। हमें अपने अधिकार चाहिए।

राघवेन ने बाहर आकर कहा, किस बात का अधिकार? 

हमने आपको नेता बनाया है। सभी एक साथ बोले।

कहे बात का बनाया है, तुमने अपने वोट, अपना अधिकार मुझे रुपए, चावल और दारु में बेच दिया था। और बेची हुई वस्तु पर अधिकार उसका होता है, जिसने खरीदी थी।

जब मैं तुम लोगों को वह सब दे रहा था, तब तो किसी ने नहीं कहा था, हमें सुरक्षा-सुकून और विकास चाहिए। किसी एक ने भी नहीं कहा था कि हम चाहते हैं कि हमारा गांव सबसे उन्नत हो।

अब जाओ, सब यहाँ से। सब अपना सा मुंह लेकर लौट गये।

राघवेन के मित्र ने उससे कहा, तुम इनके वोट से ही जीते हो, ऐसा करोगे तो, अगला चुनाव नहीं जीत पाओगे।

राघवेन बोला, यह गांव वाले बहुत स्वार्थी हैं। अगले चुनाव में इन्हें फिर कुछ लालच दे दूंगा और फिर यह अपने वोट बेच देंगे।

जब तक इनके मन में स्वार्थ है, तब तक छोटे-मोटे लालच देकर राज किया जा सकता है। 

जब तक यह किसी भी लालच में फंसते रहेंगे, बिकते रहेंगे, तब इनका कम और हमारा ज्यादा लाभ है।

मुश्किल तब होगी, जब यह अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर गांव के विकास के लिए सोचेंगे, गांव को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए सोचेंगे।

ऐसा क्यों?

क्योंकि तब यह किसी लालच में बिकेंगे नहीं, तब हम गुंडाराज नहीं कर पाएंगे, हम अपने गोदाम नहीं भर पाएंगे, हमें गांव का विकास करना होगा, उसे सर्वश्रेष्ठ बनाना होगा। 

उन दोनों के वार्तालाप को मनकू ने मोबाइल फोन में record कर लिया, फिर गांव वालों को सुनाकर बोला, अभी फिर से चुनाव आ रहे हैं।

अपना वोट सोच-समझकर देना, लालच में पड़कर, स्वार्थी होकर अपना वोट, अपना अधिकार बेचना मत।

सम्पूर्ण गांव का विकास ही अपना विकास है। जब यह सोच कर वोट देंगे, तभी अपने अधिकारों की मांग कर सकेंगे।

यह बात सभी गांव वालों को समझ आ गई।


यह तो रही उस गांव की बात, हमारे उत्तरप्रदेश में भी वोट डाले जा रहे हैं, आप भी किसी लालच में मत पड़ना और अपना वोट सोच-समझकर देना।

देश की सुरक्षा और विकास ही सर्वोपरि है। उसी में हमारा हित है।

याद रखिएगा, U.P. का vote, जनता के पास है remote.

जय हिन्द जय भारत 🇮🇳

Wednesday, 16 February 2022

Article : गो-काष्ठ

 गो-काष्ठ 




आज भारत बहुत से ऐसे क्षेत्रों में भी आगे बढ़ रहा है, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

आज मैं आपको उसी से सम्बंधित बात बताने जा रहे हैं। वैसे इस बात से कुछ लोग अवगत भी हैं, पर फिर भी बहुत लोग अनभिज्ञ भी होंगे। 

मेरा इसको बताने का बड़ा कारण यह है कि शायद इसे पढ़कर कुछ लोग को रोजगार करने और देने का idea मिल जाए।

अपनी उस बात को बताने से पहले मैं आप से पूछना चाहती हूँ कि आप में से कितने लोग के लिए गाय एक आदरणीय पशु है?

या यह कि गाय को सबसे पवित्र पशु क्यों समझा जाता है?

चलिए हम अपनी धारणा आप के सामने रखते हैं कि हमारे लिए गाय आदरणीय व पवित्र पशु है।

इसके बहुत से कारण हैं, जैसे -

पहला कारण है कि माँ के बाद अधिकांशतः लोग गाय का दूध पीकर ही बड़े होते हैं, अतः गाय को माता, के समकक्ष माना गया है।

दूसरा कारण, गाय के मूत्र में बहुत से औषधीय गुण पाए जाते हैं, अतः आयुर्वेद में गौमूत्र की विशेष महत्ता है।

तीसरा कारण, गाय द्वारा दिए गए गोबर की महत्ता का तो कहना ही क्या है। जब भारत आधुनिकता की ओर अंधी दौड़ में शामिल नहीं था, तब हर कच्चे घरों में गाय के गोबर से हर दूसरे चौथे दिन लीपा जाता था, जिससे लोगों के घर कीड़े-मकोड़े से मुक्त रहता था।

गाय के गोबर की पवित्रता तो इस हद तक मानी जाती है कि पूजा अर्चना में भी इसका प्रयोग किया जाता है। गोबर से बनी हुई गौरा देवी की पूजा घर घर में होती है।

सदियों से घरों में गोबर से बने कंडे (उपला) का उपयोग खाना बनाने के लिए किया जाता रहा है, हालांकि शहरों में गैस का प्रयोग दशकों पहले से आरंभ हो गया है और आज कल उपलों का प्रयोग केवल गांवों तक ही सीमित रह गया है। बल्कि बहुत से गांवों में भी गैस सिलेंडर की सेवा उपलब्ध कराई जा रही है, वहीं कुछ गांवों में गोबर गैस प्लांट भी लगे हुए हैं, जिससे घर-घर में गैस की सुविधा उपलब्ध हो रही है।

आज हम गोबर की इसी विशेषता से जुड़ी एक और कड़ी की बात कर रहे हैं।

अभी कुछ दिन पहले हमें गौकाष्ठ के विषय में ज्ञात हुआ।

देश के विभिन्न शहरों की संस्थाओं द्वारा, गाय के गोबर से गोकाष्ठ बनाए जा रहे हैं, अब आप कहेंगे कि यह गो काष्ठ क्या है?

गो-काष्ठ

इसमें गाय के गोबर को एकत्र कर के उसे सुखाया जाता है। फिर उसमें उचित मात्रा में पानी डालकर मिक्स करते हैं। तब इसे machine में डालकर अच्छे से compress करते हैं, और उससे logs निकालते हैं। इन logs को सूखा लेते हैं। इसमें बीच में 1 Inch का छेद होता है, जो इसे जल्दी सूखने में मदद करता है, साथ ही इसमें छेद होने से यह एकसार जलती है। देखने में यह लकड़ी के लठ्ठे (logs ) के जैसे ही लगते हैं। यह लकड़ी के जैसे दिखते हैं और गोबर से बने होते हैं, इसलिए ही इन्हें गोकाष्ठ कहते हैं।

इस काम को करने में 3 से 4 आदमी की आवश्यकता होती है। 

राजस्थान में, गोबर में गंगाजल, गोमूत्र, पंचगव्य, हवन सामग्री, चंदन की लकड़ी के बुरादे, पेड़ों के सूखे पत्ते आदि सामग्रियों को मिलाकर एक मशीन में मिलाकर लकड़ी तैयार की जा रही है। अतः यह बहुत पवित्र और पूजनीय हो जाती है।

गो-काष्ठ का उपयोग 

और इन गोकाष्ठ को हम उन सब जगह पर use कर सकते हैं, जहांँ लकड़ी का use किया जाता है। 

  • जहाँ अभी भी भोजन के लिए लकड़ी को use किया जाता है। 
  • Comercial use जैसे ईंट भट्टे में, या जिस भी काम में furnace use करते हैं
  • Outing के लिए गये हों तो bonefire में।
  • बहुत से त्यौहारों में, जैसे होलिका दहन, लोहड़ी आदि में।
  • पूजा अर्चना में हवन के लिए साथ ही अंतिम संस्कार में भी।


आप कहेंगे कि जब लकड़ी है तो इसकी क्या आवश्यकता?

आप स्वयं बताइएगा कि आवश्यकता है कि नहीं, 

गो-काष्ठ की आवश्यकता

इस गो काष्ठ के होने से एक नहीं कई फायदे हैं- 

  1. गो काष्ठ को लकड़ी की तरह use कर सकते हैं, अतः इनके होने से बेवजह लकड़ी की कटाई बंद हो जाएगी, जिससे वन संरक्षण होगा।
  2. गो-काष्ठ, गोबर से बनता है, अतः यह भी पूरी तरह natural है।
  3.  यह गोबर को सुखाकर व पूरी तरह compressed करके बनाते हैं, अतः इससे लकड़ी के competitively कम प्रदूषण होता है। अतः वातावरण भी शुद्ध।
  4.  गोबर का सदुपयोग होने से वो waste बनकर जगह नहीं घेरता है।
  5.  जो गाय दूध देना बंद कर देती हैं, उन्हें लोग अपने पास रखना पसंद नहीं करते हैं, जिसके कारण वह भूख और देखभाल से तरसने लगती हैं।  
  6.  उनके यहाँ वहाँ घूमने से उनके व बाकी लोग के accident की chances रहती है, साथ ही उनके यहां-वहां घूमने से गोबर भी इधर उधर फैल कर गंदगी करता है।
  7.  गो काष्ठ की प्रसिद्धी बढ़ने से, गाय के दूध के साथ ही गोबर भी मूल्यवान हो गया। इससे लोग गाय की सेवा करते रहेंगे। इससे गाय सुरक्षित व जगह स्वच्छ। 
  8. लकड़ी के लठ्ठे से कम मात्रा में गोकाष्ठ की आवश्यकता पड़ती है, जिसके कारण खर्चे में भी नियंत्रण रहेगा।
  9. गो-काष्ठ से अन्त्येष्टि करने में केवल 300 किलोग्राम गोकाष्ट एवं 250 ग्राम कपूर का उपयोग होगा। इसकी कुल लागत 1600 रुपए आएगी। जबकि, एक शव की अन्त्येष्टि में 2 पेड़ समाप्त हो जाते हैं, और इससे लगभग 5 हजार से 6 हजार तक का खर्च आता है 
  10. अब आप का क्या कहना है? शायद आप के मन में भी यही ख्याल आया होगा कि यह मिलती कहाँ है?
  11. यह आप को बहुत easily सभी States में मिल जाएगी, इसकी कीमत लगभग 45,000 से 55,000 तक की आप को मिल जाएगी। अगर आप के पास गौशाला है या आप के आसपास गौशाला है तो इस मशीन के जरिए आप अच्छी आमदनी भी कर सकते हैं। 

अगर आप के पास मशीन खरीदने जितने पैसे नहीं हैं, तो आप इस सांचे की मदद से भी गो-काष्ठ  बना सकते हैं।


तो आइए, लकड़ी की जगह, इस गो काष्ठ को अधिक से अधिक use कर के पर्यावरण, पेड़, वन व गौ, इन सबकी रक्षा की ओर अग्रसर हो जाएं।

Saturday, 12 February 2022

Article : हिजाब पर विवाद

 हिजाब पर विवाद 


कर्नाटक के Govt Pre University College for girls से शुरू हुए, इस विवाद का क्या और कब अंत होगा, पता नहीं?

पर यह विवाद क्यों? यह भी समझ से परे है। 

किसी भी स्कूल में dress code होने का क्या पर्याय है?


Reason for the dress code in schools :

यह तो सभी जानते ही होंगे, जो नहीं जानते हैं उनको बता दें, equality के लिए।

उस dress code को यह सोच कर रखा जाता है कि स्कूल में सभी समभाव हैं। कोई अमीर-गरीब नहीं है, कोई धर्म और जाति छोटी-बड़ी नहीं है। 

वो ऐसी जगह है, जहाँ सिर्फ प्रेम, सौहार्द्र और शान्ति रहती है। 

तब ऐसी पवित्र और पाक जगह को बिना वजह विवाद का केंद्र बनाने का प्रयास क्यों?


Dress code को change ना करने का पहला कारण : 

ऐसे किसी भी मजहब और सम्प्रदाय के लिए नियम में परिवर्तन करने से सभी इसकी मांग करेंगे और सभी की मांग को मान्यता देने पर वो क्या स्कूल लगेगा या मेला?

आज इन्हें स्कूल परिसर में हिजाब की अनुमति दी जाए। कल हिन्दू कहेंगे कि हमें भी भगवा पहनना है राम नामी चादर ओढ़नी है घूंघट करके आना है, फिर सिख बोलेंगे, हम तो कटार भी साथ रखेंगे। ठाकुर कहें कि हम बंदूक के बिना स्कूल नहीं आएंगे।


तो किस-किस की बातों को मान्यता देंगे? 

ऐसे में school की क्या गरिमा रह जाएगी और क्या उसका अस्तित्व रह पाएगा?

वो बुद्धि और ज्ञान के विकास करने का स्थान  ना रह कर, विवादों का अखाड़ा बन जाएगा।


Dress code change नहीं करने का दूसरा कारण सुरक्षा भी है :

शायद आपको मालूम हो, ऐसे ही एक बार विवाद केरल में भी हो चुका है, वो भी girls college था। ऐसे में एक लड़का बुर्का पहन कर विद्यालय के परिसर में आ गया था। लड़कियों की सुरक्षा के मद्देनजर यह फ़ैसला लिया गया था कि school campus के अंदर कोई भी बुर्का या हिजाब पहनकर नहीं आएगा।

इसकी उपस्थिति में चेहरा ठीक से नहीं दिखता है, अतः इससे identity पहचानने में दिक्कत होती है। अतः स्कूल व कालेज के परिसरों में यह नहीं पहन सकते हैं।


क्या ग़लत था? ऐसे ही किसी girls college में कोई लड़का, बुर्का पहन कर या लंबा घूंघट डालकर college campus में आ जाए और girls के साथ अभद्र व्यवहार करे तो उसका जिम्मेदार कौन होगा, किस की जवाबदेही होगी?

जब यह मामला केरल में हुआ था और वहाँ मना किया गया तो बिना कोई विवाद किए, इस बात को मान लिया गया था। 

पर वही घटना जब कर्नाटक में घटित हुई तो विवाद इतना बढ़ा दिया गया है कि वो विवाद कर्नाटक के एक school तक सीमित नहीं है बल्कि उस विवाद की तपिश से पूरा देश जलने लगा है। क्योंकि यह विवाद अब हर state और city तक पहुंच रहा है।

बल्कि कहना चाहिए कि इस विवाद को देश तक ही नहीं, उसके बाहर भी पहुंचा दिया गया है।

क्यों? आखिर क्यों? बिना बात का विवाद क्यों?

मत बढ़ाओ बेवजह बात को, जहाँ दशकों से हर धर्म के बच्चे प्रेम-सौहार्द्र से साथ पढ़े हैं, वहाँ व्यर्थ की राजनीति का विवाद करके शांति और अमन ना नष्ट करें।