Monday, 11 April 2022

Short Story : पान का डिब्बा

 पान का डिब्बा



मम्मी पापा के साथ, एक uncle के घर जाया करते थे, वहाँ उनकी बहनें और उनके मम्मी पापा भी रहते थे।

वो जमाना ही और था, उस जमाने में कोई uncle-aunty नहीं होते थे।

सभी को हम मौसी, मामा, बुआ, चाचा, चाची कहा करते थे और उनके माता-पिता को बाबा दादी या नाना-नानी कहा करते थे।

ऐसा नहीं था कि हम केवल उन्हें सम्बोधित
किया करते थे। 

नहीं... बल्कि हम सब में रिश्ता भी प्रेम और अपनत्व का था। हमें उनसे मिलकर अत्यंत आनंद की अनुभूति होती थी। 

तो बात उन्हीं दिनों की है। 

जब भी हम वहाँ जाते थे, तो हम लोगों का स्वागत बहुत ही आत्मीयता से होता, अक्सर दोपहर के भोजन से लेकर, शाम की चाय तक का समय वहीं व्यतीत हुआ करता था।

जब हम वहाँ पहुंचते तो, मम्मी पापा तो उनके साथ होते बातें करते और हम बच्चे तो क्या कहें, अपनी टोली के साथ मशगूल हो जाते, खेलने कूदने में; फिर समय का पता ही नहीं चलता।

दोपहर के भोजन के बाद आता, दादी का बड़ा ही दिलकश पान का डिब्बा।

सुनहरा रुपहला सा वो डिब्बा,  अपनी अलग ही शान रखता था।

उस डिब्बे के ऊपरी हिस्से में एक प्लेट में छोटी छोटी कटोरी लगी होती, जिसमें रखा होता चूना, कत्था, सुपाड़ी, लौंग, इलायची, और ऐसी ही ना जाने,कितनी सुगंध बिखेरती बहुत सी चीजें...

और उस प्लेट को हटाएं तो उसके नीचे होता, एक सरोता! अरे, सरोता क्या होता है, जानते तो हैं ना? हाँ बिल्कुल वही, सुपाड़ी कटाने का औजार। और यह सुपाड़ी जो इतनी सख्त और मजबूत होती है कि अच्छे- अच्छों की ताकत को फेल कर दें, पर मियां सरोते के आगे टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। इसी सरोते के साथ होतें हैं, पान के डिब्बे की शान, खूब सारे ताज़े, नरम मुलायम पान के पत्ते।

पर यह पान की हसीन दुनिया, दादी के प्यार व दुलार और पान के दीवानों के बिना अधूरी थी

दादी, सबसे पूछा करतीं, कौन किस तरह का पान खाएगा, फिर सबकी पसंद के अनुसार बहुत ही रुच-रुचकर पान लगाया करतीं।

यूं तो हम बच्चों को मीठा पान भाता था और वो मीठा पान नहीं लगातीं थीं, मतलब पान सिर्फ बड़े लोगों के खाने के लिए ही तैयार होता था।

पर उनका इतने प्रेम से और कलात्मक ढंग से सबके लिए पान तैयार करना, साथ ही उस डिब्बे से आती एक अलग ही मनमोहक सुगंध, हम सब बच्चों को वहीं बांधे रखती थी।

वो पान का डिब्बा, क्या था, बस समझिए प्रेम की भावना से भरा जीता जागता, कोतूहल था।

पर अब, जब वो दादी हमारे बीच नहीं हैं, तो मानो वो पान का डिब्बा एक कोने में रखा, इंतजार करता रहता हो, उस असीम स्नेह का।

जो आज के जमाने में तो संभव ही नहीं है, क्योंकि अब ना वो पहले सा प्रेम है, ना आत्मीयता, ना लोगों के पास पहले सा वो वक्त।

आज सब ना जाने कहाँ व्यस्त हो गए हैं, बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी व्यस्त हैं, पर कहाँ? किसी को नहीं पता।

Sunday, 10 April 2022

Bhajan (Devotional Song) : प्रभु की लीला अपरम्पार

प्रभु की लीला अपरम्पार


दशरथनन्द, भए आनन्द,

हर्षित भई, कौशल्या माई।

श्री हरि की बाल लीला,

कहो केहि विधि कही जाई।।


प्रभु की लीला अपरम्पार। 2।।


लोचन नयन कमल सरिखे, 

भृकुटि लगे तनी कटार। 2।।

चन्द्र मुख पर रज सजी ऐसे, - 2

माया संग हरि एकाकार।।


प्रभु की लीला अपरम्पार। 2।।


ठुमक-ठुमक कर चलत प्रभो,

जग में गूंजत है किलकारी। 2।।

झूम उठी पूरी ही धरती, - 2

सुन पैजनियों की झंकार।।


प्रभु की लीला अपरम्पार। 2।।


अधर लालिमा देखत,

भ्रमर भ्रमित भए जाए। 2।।

मुखमंडल पर आभा ऐसी, - 2

दमके उससे संसार।।


प्रभु की लीला अपरम्पार। 2।।




प्रभू श्रीराम की बाल लीलाओं का वर्णन अवधी भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है... कृपया, पढ़कर और सुनकर comment box में जरुर से बताएं, कैसा रहा हमारा प्रयास?


श्री हरि, हम सब पर अपनी असीम कृपा बनाए रखें 🙏🏻🙏🏻❤️


आप सभी को राम लला के जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻💐

Friday, 8 April 2022

India's Heritage : भक्त ध्यानू

नवरात्रि के पावन दिन चल रहे हैं तो सोचा, आज आप को विरासत के अंतर्गत माता के एक ऐसे भक्त की कहानी बताएं, जिसने अकबर को माता रानी के दरबार में सिर झुकाने को विवश कर दिया था।

भक्त ध्यानू 

बात उन दिनों की है जब भारत पर अकबर का शासन था, उन दिनों हिन्दूओं को धार्मिक यात्राओं पर भी जाने में बहुत रोक-टोक हुआ करती थी।

एक बार भक्त ध्यानू, अपने एक हजार साथियों के साथ ज्वाला देवी के दरबार में सिर झुकाने जा रहे थे।

जब अकबर के नुमाइंदों ने इतने सारे लोगों का झुंड देखा तो, उन्हें पकड़ कर अकबर के दरबार में ले गये।

अकबर ने कड़क कर, भक्त ध्यानू से पूछा, इतने सारे लोगों को लेकर किस मंशा से निकले हो?

भक्त ध्यानू ने बिना डरे, आत्मविश्वास से भरकर कहा कि वो सब ज्वाला माता के दरबार में सिर झुकाने जा रहे हैं।

अकबर ने पूछा, कौन ज्वाला माता?

ध्यानू ने कहा, ज्वाला माता, दुर्गा माँ का स्वरूप हैं, उनके दरबार में बिन तेल और बाती के ज्वाला जलती रहती है, इसलिए उन्हें ज्वाला माता कहा जाता है।

उनके दरबार में जो कोई भी, सच्चे मन और पूर्ण विश्वास से जाता है, माँ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

अकबर ने कहा, तुम्हें इतनी आस्था है, अपनी भक्ति और माँ की शक्ति पर तो, तुम मुझे सिद्ध कर के दिखाओ।

यह कहते हुए उसने अपने सैनिक को इशारा किया कि ध्यानू के घोड़े का सिर धड़ से अलग कर दो।

चंद मिनटों में घोड़ा, दर्द से छटपटाते हुए फर्श पर गिर गया और मृत्यु को प्राप्त हो गया।

अकबर बोला, अगर तुम इस घोड़े को जीवित कर के दिखाओ तो मानूं।

तुम्हारी माता रानी की शक्ति और तुम्हारी भक्ति...

ध्यानू भी घोड़े की इस तरह की अकाल मृत्यु से बहुत दुखी हो गया। पर अगले ही क्षण, वो माता रानी की शक्ति पर विश्वास करते हुए आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर बोला, मेरे लौटने तक आप मेरे घोड़े के शव को संभाल कर रखिएगा। 

मेरी माता रानी, मेरे घोड़े को अवश्य जीवित कर देंगी।

अकबर ने कहा, उसका हम ध्यान रखेंगे, पर तुम शीघ्र आना, वरना तुम्हारे पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया जाएगा।

ध्यानू अपने साथियों के साथ ज्वाला माता के दरबार की ओर चल दिया।

वहाँ पहुंच कर, उसने नहा-धोकर, माता रानी की अराधना की। पुष्प अर्पित किए, आरती की।

उसके बाद उसने माता रानी से प्रार्थना कि उसके घोड़े को जीवित कर दें।

पर उसे उत्तर नहीं मिला तो उसने पुनः कहा, पर इस बार भी कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला तो ध्यानू ने कहा कि यदि आप मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं करेंगी तो मैं अभी अपना सिर आपके चरणों में समर्पित कर दूंगा, क्योंकि मैं अपमानित होकर जीवित नहीं रह सकता।

यह कहकर ध्यानू ने अपनी तलवार से अपना सिर, धड़ से अलग कर माँ के चरणों में समर्पित कर दिया।

ऐसे होते ही, एक शक्ति से माँ प्रकट हो गयीं, उन्होंने ध्यानू को जीवित कर दिया, साथ ही उस घोड़े को भी जीवित कर दिया और ध्यानू से कहा कि तुम दरबार में जा सकते हो।

उधर जब अकबर को पता चला कि घोड़ा, जीवित हो गया है, तो अकबर असमंजस में पड़ गया। उसे अपने कथन पर बहुत अफसोस हुआ..

भक्त ध्यानू के राज्य महल में आते ही अकबर भक्त ध्यानू के पांव पकड़ के क्षमा मांगने लगा।

भक्त ध्यानू ने कहा कि मेरे नहीं, माता रानी के दरबार में जाओ, तुमने मेरा नहीं, माँ का अपमान किया था, इसलिए क्षमा भी वहीं मांगो।

अकबर ग्लानि से भर गया और अगले ही पहर वो अपने दल-बल के साथ ज्वाला माता के दर्शन की ओर चल दिया, उनसे क्षमा मांगने और शीश नवाने के लिए।

जो भी, माता के दरबार में, श्रृद्धा और विश्वास के साथ जाएगा, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी

जयकारा ज्योतावाली का🚩

बोलो सांचे दरबार की जय 🙏🏻🙏🏻