Wednesday, 13 July 2022

Article : गुरु पूर्णिमा पर्व, विशेष क्यों?

 गुरु पूर्णिमा पर्व, विशेष क्यों? 



गुरु पूर्णिमा पर्व है, गुरु का सम्मान करने का दिन, उनका आभार व्यक्त करने का दिन, अपना जीवन समर्पित करने का दिन और गुरु में ईश्वर के साक्षात्कार करने का दिन...

गुरु पूर्णिमा पर्व, हमारी भारतीय संस्कृति का विशिष्ट पर्व है, जिसकी महत्ता, हमारे जीवन में बहुत अधिक है। 

सदियों पुरानी यह परंपरा, आज कुछ चंद जगहों पर ही पर्व के रूप में मनाई जा रही है। जबकि कितने तो ऐसे हिन्दू लोग भी हैं, जो इसके विषय में जानते तक नहीं हैं। 

आज का हमारा यह लेख, आप को अवगत करायेगा, कि गुरु पूर्णिमा कब और क्यों मनाते हैं? गुरु की हमारे जीवन में आवश्यकता क्या है?


गुरु पूर्णिमा, कब और क्यों?

महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन महर्षि वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उन्हें आदिगुरु भी कहा जाता है। 

उनके सम्मान में ही हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन व्यास जी ने शिष्यों एवं मुनियों को सर्वप्रथम श्री भागवत पुराण का ज्ञान दिया था। 


बौद्धों में गुरु पूर्णिमा की आस्था :

एक अन्य किंवदंती के अनुसार, बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त करने के पांच सप्ताह बाद, भगवान बुद्ध, बोधगया से सारनाथ, उत्तर प्रदेश गए। वहां उन्होंने पूर्णिमा के दिन प्रवचन दिया। यही कारण है कि गौतम बुद्ध के अनुयायी उनकी पूजा करने के लिए इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं और आषाढ़ पूर्णिमा तिथि बौद्धों के लिए महत्वपूर्ण है।  


गुरु और शिक्षक में अंतर :

हम सभी को शिक्षक दिवस तो पता है, हर साल, स्कूलों में यह दिन, हम अपने शिक्षकों के सम्मान में 5 सितंबर को मनाते हैं। 

पर गुरु पूर्णिमा की विशेषता बहुत ही कम  स्कूल में समझी जाती है।

अब आप के मन में सवाल उठ रहा होगा कि गुरु और शिक्षक में अंतर क्या होता है? दोनों ही तो ज्ञान देते हैं...

जी हांँ, दोनों ही ज्ञान देते हैं, पर गुरु और शिक्षक में, देखें तो सूक्ष्म अंतर है और सोचें तो बहुत बड़ा अंतर है। गुरु ज्ञान देता है, शिक्षक शिक्षण करता है। 

गुरु-शिष्य की एक परंपरा है, जिसमे गुरु के पीछे जुड़कर शून्य या नगण्य (अ) भी विशिष्ट हो जाता है - गुरु +अ = गौरव। 

शिक्षक तो शिक्षा के निमित्त (अर्थ) आए हर शिक्षार्थी के लिए शिक्षण का कार्य करता है। 


गुरु क्यों आवश्यक हैं?

गुरु ही शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वे ही जीवन को ऊर्जा मय बनाते हैं। जीवन विकास के लिए भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। गुरु की सन्निधि, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन कृतार्थता से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन। 

अर्थात गुरु ही हमारा ईश्वर से साक्षात्कार कराते हैं, और इस नश्वर संसार के आवागमन से मुक्त करा के मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं।

मनुष्य जीवन, का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति ही है, ना कि मोह माया में उलझ कर काम और अर्थ की प्राप्ति करना। मोक्ष गुरु ज्ञान बिना असंभव है, अतः गुरु, हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। तो सोचिए, जब गुरु मूलभूत आवश्यकता हैं तो गुरु पूर्णिमा पर्व, कितना ज्यादा विशेष है...


गुरु पूर्णिमा पर्व :

भारत के कुछ स्कूलों में बच्चे अपने गुरुओं के पैर छूकर और सम्मान के प्रतीक के रूप में उन्हें कुछ उपहार देकर इस दिन को मनाते हैं। गुरु पूर्णिमा कई साल पहले देश में सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक था। 

हम सभी भारतीयों को प्रयास करना चाहिए कि भारत में गुरु पूर्णिमा, पुनः एक पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो।

कहा भी गया है 

करता करे न कर सके, गुरु करे सो होए,

तीन लोक, नौ खंड में, गुरु से बड़ा ना कोए।


आप सभी को गुरु पूर्णिमा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएंँ 💐

हे गुरुदेव, हम सब पर अपनी कृपा दृष्टि बनाएं रखें 🙏🏻🙏🏻

Tuesday, 12 July 2022

Poem : तुझको परिणाम मिलेगा

आज हमारे बच्चे, युवावस्था की दहलीज पर कदम रखने जा रहे हैं। इसमें से कुछ NEET, JEE, BHABHA, Agnipath, और भी बहुत से competition दें रहे हैं।

उन सभी में, साथ ही आने वाले समय में और भी युवावस्था की दहलीज में कदम रखने वाले सभी बच्चों में, जोश, उत्साह और हिम्मत को प्रेरित करने वाले एक गीत को प्रस्तुत कर रहे हैं।

सारे ही बच्चों को all theक्ष best, साथ ही बहुत सारा आशीर्वाद... सभी अपने लक्ष्य को प्राप्त करें...

तुझको परिणाम मिलेगा  


मेहनत तू किए जा,

तुझको परिणाम मिलेगा।

कोई चाहे या ना चाहे,

तुझको तो नाम मिलेगा।।


लम्बी कितनी डगर हो,

चाहे कितना कठिन सफर हो।

तू रुकना नहीं, तू झुकना नहीं,

तुझको मुकाम मिलेगा।।


मेहनत तू किए जा,

तुझको परिणाम मिलेगा।

कोई चाहे या ना चाहे,

तुझको तो नाम मिलेगा।।


वक्त लगे, लग जाए, 

तेरी हिम्मत हार ना पाए।

तू डरना नहीं, तू गिरना नहीं, 

मनचाहा काम मिलेगा।।


मेहनत तू किए जा,

तुझको परिणाम मिलेगा।

कोई चाहे या ना चाहे,

तुझको तो नाम मिलेगा।।


जो हार कभी ना माने

ईश्वर, भी साथ हैं उसके।।

यह विश्वास जिसने किया है

उसको पैगाम मिलेगा 


मेहनत तू किए जा

तुझको परिणाम मिलेगा

कोई चाहे या ना चाहे 

तुझको तो नाम मिलेगा 




Thursday, 7 July 2022

India's Heritage. : Churu Fort - An Interesting Tale

आज आप के लिए India's Heritage segment में, एक ऐसी कहानी लाएं हैं जो भारत की समृद्धि और सुदृढ़ता की जीती जागती मिसाल है।

एक ऐसी कहानी जिसमें, देशप्रेम भी है, सुरक्षा व्यवस्था की अनुपम छटा भी है और समृद्धि तो ऐसी कि आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे।

चूरू किले की अद्भुत कहानी


बात बहुत पुरानी है, जब भारत में राजे-रजवाड़ों का राज्य था।

उस समय में राजा अपने राज्य या किले की रक्षा के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे। यहां तक कि राज्य प्रेम के आगे, वो सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात की भी कीमत नहीं समझते थे। 

आज हम आपको एक ऐसे ही एतिहासिक किले की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जो इतिहास में अमर है, क्योंकि वहां जो घटना घटी थी, वो न तो दुनिया में कहीं और घटी है और न ही कभी घटेगी।  

इस घटना की वजह से ही किले का नाम विश्व इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है।

तो चलिए और पहेली नहीं बुझाते हैं, हम बात कर रहे हैं चूरू किले की, जो राजस्थान के चूरू जिले में स्थित है। वर्ष 1694 में ठाकुर कुशल सिंह ने इस किले का निर्माण करवाया था। इस किले के निर्माण के पीछे मकसद आत्मरक्षा के साथ-साथ राज्य के लोगों को भी सुरक्षा प्रदान करना था। 

यह किला दुनिया का एकमात्र ऐसा किला है, जहां युद्ध के समय गोला बारूद खत्म हो जाने पर तोप से दुश्मनों पर चांदी के गोले दागे गए थे। 

यह इतिहास की बेहद ही हैरान कर देने वाली घटना थी, जो वर्ष 1814 में घटी थी। उस समय इस किले पर ठाकुर कुशल सिंह के वंशज ठाकुर शिवजी सिंह का राज था। 

इतिहासकारों के मुताबिक, ठाकुर शिवजी सिंह की सेना में 200 पैदल और 200 घुड़सवार सैनिक थे, लेकिन युद्ध के समय सेना की संख्या अचानक से बढ़ जाती थी, क्योंकि यहां रहने वाले लोग अपने राजा के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहते थे और इसलिए वो एक सैनिक की तरह दुश्मनों से लड़ते थे। 

इस का अर्थ यह है कि राज्य में सभी को सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था। जिससे राज्य पर दुश्मन के आक्रमण करने पर, सब डटकर मुकाबला कर सके। और जब राज्य में शांति व्यवस्था रहे, तब कुछ लोग सेना का हिस्सा बने रहे और बाकी जीवन यापन से जुड़े अन्य कार्य, जैसे खेती, व्यापार, दुग्ध उत्पादन आदि जैसे अन्य कार्य करते थे। जिससे राज्य समृद्ध और सुदृढ़ रहे।

वहां की प्रजा केवल सेना का हिस्सा नहीं बनती थी, बल्कि वह अपने राजा ठाकुर शिवजी सिंह और राज्य की रक्षा के लिए अपनी धन-दौलत तक लुटा देती थी।

1814, अगस्त का महीना था। जो चूरू के किले पर काल बनकर आया था।

बीकानेर रियासत के राजा सूरत सिंह ने अपनी सेना के साथ चूरू किले पर हमला बोल दिया। इधर, ठाकुर शिवजी सिंह ने भी अपनी सेना के साथ उनका डटकर मुकाबला किया, लेकिन कुछ ही दिनों में उनके गोला-बारूद खत्म हो गए।

गोला-बारूद की कमी देख राजा चिंतित हो गए, लेकिन उनकी प्रजा ने उनका भरपूर साथ दिया और राज्य की रक्षा के लिए अपना सोना-चांदी, सब राजा पर न्यौछावर कर दिए। 

जिसके बाद ठाकुर शिवजी सिंह ने अपने सैनिकों को आदेश दिए कि दुश्मनों पर तोप से चांदी के गोले दागे जाएं। इसका असर ये हुआ कि दुश्मन सेना ने हार मान ली और वहां से भाग खड़े हुए। यह घटना चुरू के इतिहास में अमर है।

अगर आप समझ सकें तो हमारा इतिहास, हमें यह शिक्षा दे रहा है कि देश की सुदृढ़ सुरक्षा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि सेना विशाल हो।

बल्कि कोई भी देश तब ज़रुर सुदृढ़ और सुरक्षित रहता है, जब उस देश का हर नागरिक, देशप्रेमी हो, सैनिक हो- अर्थात हर नागरिक को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया हो। 

जिससे, जब दुश्मन आक्रमण करे तो हर नागरिक, दुश्मन की ईंट से ईंट बजा देने में सक्षम हो। 

और जब शांति रहे, तब कुछ सैनिकों को छोड़कर अन्य लोग जीवन की आवश्यकताओं से जुड़े कार्य करके देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करके देश को सफलता के शीर्ष पर पहुंचा दें।

यही है अग्निपथ योजना, जिसमें देश के हर युवा (चाहे पुरूष हो या महिला) को अग्निवीर बनाने की कोशिश की जा रही है। 

जिससे देश इतना सशक्त हो जाए कि दुश्मन हमारे देश पर आक्रमण करने की सोच भी ना रख सके। और साथ ही हम अन्य क्षेत्रों में भी आगे बढ़ते जाएं, जिससे अर्थव्यवस्था भी इतनी सुदृढ़ रहे कि देश सफलता के शीर्ष पर रहे। 

देश के दुश्मन, चाहे वो बाहर के हों या देश के भीतर हों, कोई नहीं चाहेगा कि भारत सफ़ल और सुदृढ़ बनें।

तो यह हमें सोचना है कि क्या उचित है, क्या अनुचित, क्योंकि हम तभी सुखी होंगे, जब देश सफ़ल और सुदृढ़ रहेगा।


जय हिन्द जय भारत 🇮🇳