Tuesday, 18 September 2018

Poem : लम्हे

लम्हे



बड़ी बेपरवाह सी ज़िंदगी
गुजरती है आजकल
यहाँ समय नहीं है
किसी के पास
समय गुजारने के लिए

एक एक लम्हा गुज़ार  
देते हैं ऐसे
जैसे किसी से
उधार मांग के लाये हों
ज़रा सा थम जाएंगे
तो किस्त दोगुनी
हो जाएगी

इस कदर भी 
मशग़ूलियत कैसी
कि, एक लम्हा भी
नहीं है, जनाब
अपने ही दिल को
जानने के लिए

ऊपर वाले ने आपको
कीट या पतंगा  
नहीं बनाया है
जिनके पास जीने
के लिए लम्हे
ही दो होते हैं

इंसान हैं आप
उसने भी आपको
जीने के लिए
चार लम्हे दिये हैं
दो लम्हे तो
सुकून से गुज़ार दें  

Monday, 17 September 2018

Article : खूबसूरती

खूबसूरती

क्या होती है खूबसूरती? इस शब्द के मायने हर उम्र में बदल जाते हैं। जब हम छोटे से बच्चे होते हैं। हमें वो हर इंसान अच्छे लगते हैं, जो हमारे माँ या पापा से मिलते-जुलते हुए हों, या हमें बहुत अधिक प्यार करते हों।
पर जब हम जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते हैं, तब हम खूबसूरती को नए मापदंड में देखने लगते हैं, जो कि काफी कुछ media से, glamour से जुड़ जाता है। हम खुद भी हर समय बन-संवर के रहने लगते हैं। लड़के smart दिखने के लिए different hair style, stylish clothing पहनते हैं। तो वहीं लड़कियां भी पीछे नहीं रहती हैं। उनके कितने ही parlor के चक्कर लग जाते हैं। और dress! उसके तो क्या कहने? अगर किसी heroine की dress मिल गयी तो! बस कितने की भी हो, मिल जाए। और अगर मिल गयी, तो बस अपने आपको भी heroine ही समझने लगती हैं।
पर हम धरातल में तब आते हैं, जब हम प्रौढ़ावस्था में आते हैं। बहुत से खूबसूरत लोगों की खूबसूरती मद्धम पड़ती हुई देखी है, किसी के चांद निकाल आएगी, तो किसी की तोंद। झुर्री तो सबके पड़नी ही है और बाल भी सफ़ेद होंगे ही।
पर एक खूबसूरती ऐसी है, जो अगर आपके अंदर है, तो वो समय के साथ और निखरती ही जाती है। और उसका असर तो यहाँ तक देखा है, कि साधारण-सा दिखने वाला इंसान भी बहुत खूबसूरत लगने लगता है।
वो खूबसूरती है, अपने से पहले दूसरों के लिए करने की इच्छा, हमेशा दूसरों को गलत ना समझने की सोच, और ईश्वर में सच्ची श्रद्धा। पर इस खूबसूरती को पाना कठिन तप है। इसमें बहुत ईमानदारी रखनी होती है। साथ ही बहुत सा त्याग भी करना होता है।
पर सही मानिए, जिसमें ये खूबसूरती होती है, वो कभी भी मद्धम नहीं पड़ती है। साथ ही ये आपके चेहरे में भी ऐसी सौम्यता प्रदान करती है, कि आपमें जितनी अधिक ये खूबसूरती बढ़ती जाएगी, उतना अधिक ही लोग भी आपके तरफ खिंचते जाएंगे।
तो बाह्य खूबसूरती को नहीं अपितु आंतरिक खूबसूरती को ही महत्व प्रदान करना चाहिए। वही है, जो जीवन पर्यंत साथ देगी।
और यदि आपको कोई ऐसा मिल जाए, तो सोच लीजिएगा, आपको साक्षात ईश्वर के दर्शन हो गए हैं। और यदि आप ऐसे खुद हैं, तो आपको मेरा शत-शत नमन। और आपसे ये प्रार्थना भी है, कि इस खूबसूरती का संदेश इतना फैलायेँ, सबको पता चल जाए कि असली खूबसूरती भी बाँटने से बढ़ती है। और भारत एक बार फिर से आंतरिक खूबसूरती का प्रतीक बन जाए।

Saturday, 15 September 2018

Story Of Life : बदलते रंग

बदलते रंग


ज़िंदगी बहुत हसीन थी, हर लम्हा हंसी-खुशी के साथ बीत रहा था।
सारे समाज में मिश्रा जी के परिवार का बहुत सम्मान था, मिश्रा जी थे ही इतने अच्छे कि  किसी का भी काम हो, अपना समझ के करते थे, उनके इसी स्वभाव के कारण उनके घर में लोगों का तांता लगा रहता था।  
उनकी पत्नी रीना भी कुछ कम न थीं, हर आने जाने वालों की आवभगत के लिए सदैव तत्पर रहती थीं, आने वाला कोई भी बिना कुछ खाये- पिये नहीं जाता था।
उनके शहर में आने से पहले किसी को सोचना नहीं पड़ता था कि, उनका शहर में क्या ठिकाना होगा, क्योंकि सब जानते थे कि इतना ज्यादा प्यार सम्मा, अपनापन और कहीं नहीं मिलेगा। उनके हर सुख सुविधा का ध्यान उनकी पसंद के अनुसार रखा जाएगा और सबसे बड़ी बात कि, मिश्रा जी का परिवार यह सब निस्वार्थ भाव से करता था।
पर दिन एक से कहाँ रहते हैं, न जाने कहाँ से हँसते खेलते परिवार को किसी की नज़र लग गयी।
मिश्रा जी अपने दफ्तर से वापस आ रहे थे, कि सामने से एक ट्रक से उनकी टक्कर हो गयी, आनन-फानन उन्हें अस्पताल ले जाया गया, पर मिश्रा जी को भगवान ने उतना समय भी नहीं दिया उन्होनें रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
मिश्रा जी के स्वर्गवास से घर का एक मात्र earning member चला गया। बस फिर क्या था,  इधर मिश्रा जी ने आँखे मूँदी, उधर पूरा समाज पराया हो गया, सभी साथी कर्मी उनके परिवार से कन्नी काटने लगे, मित्रगण अपनी व्यस्तता दिखने लगे, सगे संबंधी भी भूलने लगे।

आज रीना सोच रहीं थी, जमाना कितनी तेज़ी से बदल रहा है, यहाँ, जिसके पास पैसा है, पूछ भी उसी की है, आपने किसी के लिए कितना भी किया हो, किसी के लिए उसका कोई मोल नहीं है, आप जब तक करोगे, तब तक सब आप के हितैषी होने का दिखावा करते रहेंगे, और जहाँ आपने अपनी जरूरत दिखाई, सब मुंह मो लेंगे
काश जो वक़्त दोनों पति पत्नी ने  दूसरों को और परिवार के लोगो को दिया था, वो एक दूसरे को दिया होता, तो आज रीना के पास यादों का खज़ाना होता, जिनके सहारे वो इस पहाड़ जैसी ज़िंदगी को काट लेती।

दूसरों की खातिरदारी में पानी की तरह पैसा बहाया ना होता, और अपने एकाकी जीवन के लिए बचाया होता, तो उनके पास धन का अंबार होता और आज भी लोगों का तांता, उनके दरवाज़े पर वैसे ही लगा रहता, जैसे पहले लगा रहता था। हाँ बेशक, उनमें से कोई भी हितैशी ना होता। सब धन के लोभी, या मतलबी लोगों का जमघट होता, पर उसे अकेले जीवन ना काटना पड़ता, तब रिश्ते और वक़्त यूँ रंग ना बदलते।