Tuesday, 29 June 2021

Article : रिश्तों में तुलना क्यों

रिश्तों में तुलना क्यों


अक्सर लोगों को यह कहते हुए "हमारी बहू बिल्कुल बेटी जैसी है" या  "हमारी सास‌ बिल्कुल माँ जैसी है" बहुत गर्व महसूस होता है। 

पर रिश्तों में तुलना क्यों? 

कभी कोई यह नहीं कहता है कि हमारी मम्मी, बिल्कुल पापा जैसी हैं या पापा, बिल्कुल मम्मी जैसे हैं। क्योंकि पापा, पापा जैसे ही होते हैं और मम्मी, मम्मी जैसी। 

किसी को किसी के जैसा होना भी क्यों है? किसी के जैसा बनना अपने अस्तित्व पर प्रहार करना है।

बेटी जैसी बहू या माँ जैसी सास, आखिर क्यों चाहिए? क्या यह वाक्य सास या बहू के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाता है?

सास या बहू होने में माँ और बेटी जैसे होने का प्रमाण-पत्र क्यों ज़रुरी है?

सास या बहू होना क्या इतना बुरा है? क्या वो इसी रूप में अच्छी नहीं हो सकती हैं?

कोई ऐसा भी क्यों कहता है कि, मैं अपनी सास को माँ जैसा मान दूंँगी। क्या सास का अपना कोई मान नहीं होता है? या वो मान देने लायक नहीं होती हैं?

यही बात तब भी लागू होती है, जब लोग कहते हैं कि बहू को बिल्कुल बेटी जैसा प्यार देंगे। क्या बहू के लिए कोई प्यार नहीं होता है? या उसको देने वाला प्यार देने लायक नहीं होता है? 

सास, सास होती है। माँ नहीं

बहू, बहू होती है, बेटी नहीं।

यह तुलना ऐसी नहीं है, जैसे आम से कहा जाए कि तुम सेब जैसे गुणकारी नहीं हो, या सेब से कहा जाए कि तुम आम जैसे स्वादिष्ट और गुदे से भरपूर नहीं हो।

जब बेटी होती है तो वह कोरी किताब होती है, गीली माटी होती है। तब हर माँ अपनी बेटी को हर छोटी-बड़ी बात सिखाती है, उसे संस्कारों के शब्दों से परिपूर्ण करती है। जिससे वो स्वावलंबी बनाती है और एक सुदृढ़ मूर्त रूप में बदल जाती है।

जब वही लड़की, विवाह उपरांत अपने ससुराल आती है, तब वह बहुत कुछ सीखकर आती है। एक सुदृढ़ मूर्त रूप में होती है।

सास, माँ जैसी कैसी हो सकती है, जबकि उसे तो बहू सुदृढ़ मूर्त में संस्कारों से परिपूर्ण मिली है।

सास अपनी बहू को हर कार्य में निपुण बनाकर सम्पूर्ण बनाती है। उसे जीवन में सफल व समृद्ध बनने में सहयोग प्रदान करती है।

उसी तरह से जब एक बेटी जन्म लेती है तो उसकी किलकारी से पूरा घर गूंज उठता है। उसके बचपन से पूरा घर वापस से अपना बचपन जी लेता है।

वहीं बहू पराए घर से आती है। अपना बचपन कहीं पीछे छोड़ कर आती है, तो वो बेटी जैसी कहाँ हो सकती है? और हो भी क्यों, वो बेटी जैसी? जबकि उसका स्वरूप और कर्तव्य ही अलग है।

वह तो लक्ष्मी स्वरूपा होती है। वो घर को समृद्धि से परिपूर्ण करती है। वंश को आगे बढ़ाती है।

तो जब स्वरुप व कर्तव्य सब अलग हैं, तो तुलना क्यों?

ऐसी अपेक्षा करना ही संबंध में दूरी बढ़ाता है, जो दुःख का पर्याय बन जाता है।

सास को सदैव सम्मान दें, क्योंकि वह आपकी ज़िन्दगी को सम्पूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

बहू को सदैव प्रेम करें, वो ही आपके वंश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

तुलना सदैव दूरी बढ़ाती है, जबकि सबके अस्तित्व को सम्मान, प्यार देने से आपसी सम्बन्ध सुदृढ़ होते जाते हैं। 

इसलिए तुलना बंद करें और सुखपूर्वक रहें😊 

Saturday, 26 June 2021

Story of Life : आसरा (भाग-3)

 आसरा (भाग -1) व                             आसरा (भाग -2) के आगे.....

 आसरा (भाग-3) 


क्या सोच रहे हैं जी? घर वापस चलें? यहाँ हम से मिलने वाला कौन होगा भला?.. 

लगता है कि driver हम, ग़लत लोगों को ले आया है...

हाँ, तुम ठीक ही कहती हो, हमें लौट ही जाना चाहिए... और दोनों जाने को मुड़ गये...

तभी से पीछे से आवाज आई, आ गये आप लोग...

मिश्रा जी और उनकी पत्नी आवाज़ की तरफ पलटे ही थे और बस, बहुत ही भव्य स्वागत शुरू हो गया उनका।

फिर दोनों को अलग-अलग लोग अपने साथ ले गए।

कुछ देर बाद दोनों एक बड़े से hall में खड़े थे, दोनों ही बहुत महंगे कपड़ों में थे।

मिश्रा जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा, वो सुन्दर कपड़े और गहनों से लदी हुई थीं। पहली बार, वो इतने सुन्दर कपड़ों व बहुत सारे गहनों से सजी हुई थीं, आज उन्हें एहसास हो रहा था, कि उनकी पत्नी कितनी सुंदर है। उनकी नजर अपनी पत्नी से हट ही नहीं रही थी। 

यही हाल उनकी पत्नी का भी था, आज से पहले मिश्रा जी इतने रौबीले कभी नहीं लगे थे।

थोड़ी ही देर में, पूरा hall खचाखच भर गया। और तभी वो आवाज़ आई, जिसे सुनकर मिश्रा जी और उनकी पत्नी खुशी से भर गये।

यह तो अपने वरुण की आवाज़ है ना?... मिश्रा जी ने खुशी मिश्रित शब्दों में कहा..

जी मुझे भी उसकी ही लग रही है...

वरुण और रिया सामने खड़े थे। दोनों ने आकर उन दोनों के पैर छूए। फिर वरुण ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा, मुझे इस मुकाम पर पहुँचाने वाले मेरे मांँ-बाबू जी हैं। इन्होंने मुझे उस समय भी कभी कमी का एहसास नहीं होने दिया, जब इनके पास बहुत कम था। 

मेरी पढ़ाई के कारण घर में कितनी बार नमक और रोटी खानी पड़ती थी। पर इन्होंने कभी उफ़ नहीं की और ना ही कभी मेरी पढ़ाई रोकी।

मुझे जब America से अच्छा offer मिला, तब मैं अकेला घर में कमाने वाला था, फिर भी इन्होंने मुझे जाने से नहीं रोका।

आज मैं आपको बताना चाहता हूँ कि बाबूजी और माँ, मैं गया था बहुत सारे पैसे कमाने। जिससे जब मैं लौटूं तो आप सब के लिए मेरे पास इतना पैसा हो कि मैं आप के बुढ़ापे को संवार सकूँ। कभी कोई कमी ना हो, और आज मैं यह सब आप को दे रहा हूँ।

फिर वरुण, ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा, आज से आप की तरह मैं भी इस company का एक employee हूँ। आज से इस company के owner मेरे मांँ और बाबूजी हैं।

यह सब सुनकर मिश्रा जी और उनकी पत्नी के खुशी के आंसू निकल रहे थे।

रुंधे हुए गले से मिश्रा जी ने अपनी पत्नी की ओर देखा और आंखों ही आंखों में कहा, मेरा विश्वास एकदम सही था, मेरा वरुण हमें कभी छोड़कर नहीं जा सकता था। वो तो हमारा ही भविष्य सुधारने गया था और आज सशक्त होकर लौटा है।

हमारे बुढ़ापे का आसरा, हमारा बेटा हमारे पास लौट आया है।

Friday, 25 June 2021

Story of Life : आसरा (भाग - 2)

आसरा ( भाग -1) के आगे..

आसरा (भाग - 2)  



अब बुढ़ापे में किसके आसरे रहेंगे?

अरे... परेशान क्यों होती हो, ऊपर वाले के आसरे थे, उसके ही रहेंगे। 

तभी घर के बाहर एक बड़ी सी चमकती हुई Car आ कर रुकी। उसमें से एक driver बाहर आया और बोला साहब, आप दोनों घर चलिए...

मिश्रा जी और उनकी पत्नी दोनों आंँखें खोल खोल कर चमकती हुई Car को देख रहे थे। 

उनके घर के आगे कभी scooter या bike नहीं रुकती थी, फिर car वो भी इतनी बड़ी और चमकती हुई।

मंत्र मुग्ध से दोनों एक साथ बोले, किस के....?

जी... मुझे नहीं पता किस के?, Driver बोला- मुझे सिर्फ इतना ही बोलने को कहा था कि उनसे कहना, साहब आप दोनों घर चलिए....

ओह! ... ना जाने हमें कौन बुला रहा है, मिश्रा जी की तरफ देखते हुए उनकी पत्नी बोली।

काहे नाहक जोर दे रही हो दिमाग को, होगा कोई भला मानुष या शायद office से कोई बड़े साहब बुलाए होंगे.... मिश्रा जी कुछ सोचते हुए से बोले।

अरे जाने दीजिए... आप के office वालों ने आप को काम के बख्त कभी इतना मान नहीं दिया, तो अब देंगे, जब आप रिटायर हो चुके हैं। 

वो भी साहब सम्बोधित करते हुए, नयी Car के साथ...

आप लोग, क्यों सोच सोच कर परेशान हो रहे हैं, जो भी होगा आप को दिख जाएगा। उनकी उधेड़-बुन को देखते हुए driver बोला..

देर मत कीजिए, जल्दी चलिए...

हाँ हाँ... कहकर मिश्रा जी Car में बैठ गये। पर उनकी पत्नी थोड़ा ठिठक गयीं..

अरे क्या हुआ, आओ भी... मिश्रा जी ने झुंझलाते हुए कहा

हमारे कपड़े और हालत तो देखो जरा, बुलाने वाला भी क्या सोचेगा?

पैबंद लगे कपड़े, टूटी-फूटी चप्पल और बिखरे हुए से बाल... कुछ भी तो ऐसा नहीं था कि जो उसे हिम्मत दे, बड़ी सी Car में बैठने की।

अरे Madam आ‌ जाइए, कुछ मत सोचिए।

Madam... ऐसा सम्बोधन तो उसने पूरी जिंदगी में नहीं सुना था।

खुशी से भरी वो Car में बैठ गयी।

Car रफ्तार से बढ़ चली, और कुछ minutes बाद एक बहुत बड़े आलीशान से bungalow के सामने रुक गई।

Driver ने उन्हें उतार दिया और अन्दर जाने की बात कहकर वहांँ से चला गया।

इतने आलीशान घर की कल्पना तो मिश्रा जी ने भी नहीं की थी। अब तो वो भी स्तब्ध रह गये थे।

क्या सोच रहे हैं जी? घर वापस चलें? यहाँ हम से मिलने वाला कौन होगा भला?.. 

लगता है कि driver, हम ग़लत लोगों को ले आया है...

हाँ, तुम ठीक ही कहती हो, हमें लौट ही जाना चाहिए... और दोनों जाने को मुड़ गये...

आगे पढ़े, कहानी के अंतिम भाग..

आसरा (भाग-3) में...