Friday, 25 November 2022

Poem : रुह से एक हो गए

रुह से एक हो गए



प्यार की सौगात बनकर,

आप मेरे दिल में समाए।

सदियों तक चलती रहें,

हमारे प्रेम की गाथाएं।

साल दर साल आपके साथ,

यूं ही गुज़रते जाएं।

यादों के सिलसिले, 

सुख की अनुभूति दिलाएं।

अलग अलग थे हम, 

आज के ही दिन, 

एक हो गए।

एक दूसरे में,

हम ऐसे खो गए।

जिस्म हैं अलहदा पर, 

रुह से एक हो गए।।


शादी के अटूट बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ 💐🎉

ईश्वर कृपा व आप सभी का आशीर्वाद सदैव बना रहे 🙏🏻😊💞

आज की यह छोटी सी कविता, अपने जीवन साथी और उन सबको समर्पित, जिन्हें अपनी शादी की वर्षगांठ एक विशेष उत्सव लगता है...  😊💞

Thursday, 24 November 2022

Story of Life : ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग - 4)

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -1)...

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -2) और

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -3) के आगे...

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -4) 



बहुत कुछ बदल चुका था जिंदगी में, हम दोनों ही बहुत व्यस्त हो चुके थे, मैं बच्चों में और नीलेश अपने काम में.. 

समय के साथ नीलेश का caring nature बढ़ता ही गया साथ ही उनका romance भी...

मैं ही कभी उन्हें झिड़क देती थी, अब ना हम 18 के रह गए हैं ना आप 21 के, दो बच्चों के माता-पिता हो गये हैं, अब इतना रोमांस अच्छा नहीं लगता...

वो हंसते हुए कहते, जब आप समय के साथ और ज्यादा हसीन होती जा रही हैं तो हम रोमांस कैसे कम कर दें? 

हाय! उनकी बातों से जितनी शर्म आती, उतना ही अपने ऊपर नाज़ भी कि आज भी हम सोलह साल की लड़कियों को मात दे सकते हैं...

पर सच तो यही था कि उम्र के साथ शरीर ढल रहा था। बहुत देर तक बैठे बैठे जब थक जाती तो जब तक मेरा हाथ बढ़ता तकिया उठा कर पीछे लगाने को, नीलेश उसे मेरे पीछे लगा चुके होते... 

मुझे अपनी किसी दवा की कभी चिंता नहीं करनी होती है, क्योंकि नीलेश की first priority थी कि मैं हमेशा healthy रहूं तो, मुझे कब कौन सी दवा खानी है, इसकी परवाह भी वही करते हैं...

जब किसी दिन खाना बनाने को मन नहीं करता, वो मेरे कहने के पहले ही खाना order कर देते... 

उनसे सीख कर मैंने भी उनका बहुत ध्यान रखना शुरू कर दिया था। उन्हें खाने में बारह मासी दही चाहिए होता था, वो भी घर में जमा हुआ। मैं चाहे कितना थकी हूं, मन नहीं कर रहा हो उठने का, पर दही जमाने का काम जरूर करती...

उनकी एक आदत है कि वो अचानक से कहीं भी चलने का प्रोग्राम बना लेते थे, पर मैं ने उनसे कभी नहीं कहा,  कि एकदम से प्रोग्राम ना बनाया करें, अब शरीर में पहले ही चुस्ती नहीं रही... 

ऐसी ही छोटी-बड़ी बहुत सी बातें हैं, ज़िन्दगी की, जिसमें हम दोनों ही कहे बिना एक दूसरे के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं...

अब बच्चे बड़े हो चुके थे, दोनों अपना अपना भविष्य बनाने के लिए घर से दूर निकल चुके थे।

देखते देखते हमारी 25वीं सालगिरह आने में मात्र दस दिन शेष थे...

नीलेश ने पूरे एक हफ्ते का हमारा हनीमून plan किया और मुझे surprise tickets दिए।

यह क्या है, बुढ़ापे में कौन जाता है हनीमून? फिर 25 anniversary आ रही है, बच्चे एक हफ्ते में आते ही होंगे, हमें घर में नहीं देखेंगे तो क्या सोचेंगे?

क्या, क्या सोचेंगे? मैंने उन्हें बता दिया है कि हम हनीमून पर जा रहे हैं...

हे राम! आप को रोमांस के अलावा कुछ सूझता भी है, इस उम्र में लोग पूजा पाठ में लगने की सोचते हैं और आप हैं कि हनीमून plan कर रहे हैं।

वो हंस कर बोले, इस उम्र से क्या मतलब? जब तक हम दोनों का साथ है, जीवन में रोमांस है, फिर क्या फर्क पड़ता है कि anniversary कौन सी है, पहली, पच्चीसवीं या पचासवीं...

यह सब तो नंबर हैं खाली... जीवन को जिंदा दिली से जीना चाहिए तो जीवन के सारे पड़ाव खुशनुमा ही लगते हैं।

सच हमने, sun rise, sun set देखा, horse riding की, ice skating भी की, जवान जोड़ों की तरह एक दूसरे का हाथ थाम कर हसीं वादियां भी देखी। एक दूजे की आंखों में आंखें डालकर घंटों गुजारे।

एक हफ्ते बाद, जब घर पहुंचे तो घर वैसे ही खचाखच भरा था, जैसा हमारी शादी के समय था। बच्चों के अलावा बहुत सारे रिश्तेदार थे। 

मैं सबको देखकर अचकचा गई, सब हम दोनों को देखकर मुस्कुरा रहे थे। जीजा जी ने सबके सामने पूछ भी लिया और भाई, कैसा रहा हनीमून, ज़िन्दगी के इस पड़ाव पर?

यह सुनकर मैं तो शरमा कर अंदर जाने को हुई, तभी नीलेश ने मेरा हाथ थाम लिया, और बोले जीजा जी 

आपकी साली है ही, इतनी खूबसूरत कि इनसे मिलकर किसी और पर नजर टिकी नहीं और इनसे कभी हटी नहीं...

और ज़िन्दगी का पड़ाव तो अभी जवानी की दहलीज पर आया है, 25 साल ही तो हुए हैं अभी... आशीर्वाद दीजिए कि 50 वीं, 75 वीं सब हम ऐसे ही मनाएं।

सब ओर से आवाज़ आ रही थी, क्या बात है... सच है यही जिन्दगी जीने का सही अंदाज़...

शादी की वर्षगांठ के दिन, पुनः हमारा बहुत धूमधाम से  विवाह हुआ... इस बार साक्षी बच्चे भी थे।

हम ज़िन्दगी के इस पड़ाव में फिर से जवां हो चुके थे। नीलेश और मैं फिर से ज़िन्दगी को भरपूर जीने लगे...


अगर आप को यह कहानी पसंद आई हो तो आप भी हमेशा जवां रहिएगा और ज़िन्दगी का पड़ाव, एक दूसरे की care करते हुए प्यार के साथ गुजार दीजिएगा। 

उम्र तो सिर्फ एक संख्या है, उसके बढ़ने से प्यार और रोमांस कम मत कीजिएगा 🙏🏻

Wednesday, 23 November 2022

Story of Life: ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -3)

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -1) और

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -2) के आगे...

ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -3) 




मैं नीचे के bathroom में ready हो जाऊंगा, तुम भी जल्दी आ जाना... 

कहकर नीलेश नीचे चले गए और मैं बाथरूम में...

जल्दी जल्दी नहा तो मैं ली, पर साड़ी! हाय रे... पागल हो गई मैं, पर जितनी जल्दी कर रही थी मैं, उतना ही उसे सही से पहनना असंभव लग रहा था।

मां ने कितना कहा था कि ठीक से ready होना सीख ले, पर मेरी ही मति मारी गई थी, जो उनकी बात नहीं सुनी थी।

पर अब क्या? आज तो गई बारह के भाव...

तभी भाभी आ गई और उन्होंने झटपट मुझे ready कर दिया, और साड़ी तो इतनी अच्छी पहनाई कि मुझे खुद से ही प्यार हो गया, wow! क्या figure है मेरी...

अब खुद को निहारना बंद करें देवरानी जी, नीचे चलो, नहीं तो तुम्हारे साथ मैं भी नहीं बचूंगी।

अरे भाभी, आज तो आप ने बचा लिया, वरना मैं तो गई ही थी। बहुत बहुत धन्यवाद...

धन्यवाद तो नीलू भैया का करना, उन्होंने ही भेजा था, बहुत ध्यान रखते हैं वो हर छोटी बात का। वो जिसके साथ होते हैं, वो कभी जा नहीं सकता है...

भाभी के साथ मैं नीचे पहुंच गई और जल्दी से kitchen में भी...

तभी बुआ जी की फिर से कड़क आवाज़ सुनाई दी, बहुरिया हमारे जाने के पहले आएगी या हम ही ऊपर जाएं?

नीलेश, बुआ जी के पैर दबाते हुए बोले, अरे बुआ जी, लगता है आप ने बातों में ध्यान नहीं दिया, आप की बहुरिया तो रसोईघर में ही है।

ऐं... रसोईघर में? कब? अब इतनी भी हम बात नहीं कर रहे थे, कहकर बुआ जी, रसोईघर की ओर आगे बढ़ गई...

मैं रसोईघर में ही थी, हलवा भी लगभग बनने को  तैयार था, यह सब देखकर बुआ जी प्रसन्न हो गई और शाम को खूब सारा प्यार, आशीर्वाद, और गहना कपड़े देकर चली गई।

बहू, बड़ा खुश होकर गई हैं जीजी, आगे भी ध्यान रखना।

मम्मी जी मुझे और मैं नीलेश को धन्यवाद दे रहे थे कि सब ठीक से हो गया। 

Kitchen में हलवा, इतनी जल्दी कभी ना बनता, अगर मेरे आने से पहले सूजी भूनी हुई ना रखी होती, भाभी ने बताया था कि वो भी नीलू भैया... 

दो दिन ससुराल में बहुत प्यार और सुख से गुज़रे, मम्मी जी सचमुच बहुत सुलझी हुई थीं।

हमारे इतनी जल्दी Bombay जाने की बात से भी उन्होंने कुछ नहीं कहा कि इतनी जल्दी क्यों जा रहे हो?

बल्कि हमारे जाने की खुद वो आगे से आगे बढ़कर तैयारी कर रही थीं।

मैंने कहा भी कि इतनी जल्दी नहीं जाना मुझे... तो वो बोली, अरे कोई बात नहीं, आते जाते रहना, हम तो यहीं हैं...

दो दिन बाद ही हम Bombay आ गए,  और साथ ही बहुत सारी है, जिम्मेदारियां...

ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी, हम दो से चार हो चुके थे...

बहुत कुछ बदल चुका था जिंदगी में, हम दोनों ही बहुत व्यस्त हो चुके थे, मैं बच्चों में और नीलेश अपने काम में.. 

समय के साथ नीलेश... 

पढ़ें ज़िन्दगी का पड़ाव (भाग -4) अंतिम भाग में 

अंतिम भाग अवश्य पढ़िएगा, क्योंकि उसमें ही सार है..