Tuesday, 25 September 2018

Story Of Life : डर (भाग-२)

अब तक आपने पढ़ा निहारिका अपने ऑफिस में काम करती है, अचानक एक दिन हुए सिर दर्द से परेशान वो आँखों के डॉक्टर, फिर ब्रेन के डॉक्टर के पास तक चली जाती है, जहाँ उसे ब्रेन कैंसर बता दिया जाता है। तभी उसका दोस्त यश, उसे ठीक करने कि बात करता है..... अब आगे  

डर (भाग-२) 


अगले दिन माँ के बहुत कहने पर वो यश से मिलने चली गयी। दोनों Dr. ने पूरा test दो-दो बार किया। पर वो दोनों बार एक ही निर्णय पर रहे कि निहारिका को कोई भी problem नहीं है। पर निहारिका ने जिस Dr. को पहले दिखाया था, वो भी अच्छे Dr, थे। यश ने रचित से पूछा, कि आखिर माजरा क्या है? उन लोगों ने निहारिका से पूछा, जब तुमने test कराया था, तो बहुत ही भीड़ थी क्या? हाँ निहारिका बोली। रचित बोला, cancer निहारिका को नहीं, इस report वाले को है।
अरे फिर मुझे इतना सिर दर्द क्यूँ होता है, और धुंधला क्यूँ दिखता है। ok , चल वो भी check कर लेता हूँ।
यश ने मज़ाक मज़ाक में बोला मैं जादूगर हूँ , अभी सब ठीक कर देता हूँ। सुन कर निहारिका खिलखिला दी, अब उसका डर कम जो हो रहा था। अच्छा निहारिका ये बताओ, अभी भी सिर दर्द हो रहा है? थोड़ी देर सोच के बोली, नहीं! अच्छा अब जरा, रचित के laptop  में पढ़ कर देखो, तुम्हें धुंधला दिखाई दे रहा है। निहारिका ने पढ़ा, तो सब साफ साफ  दिखाई दे रहा था। यश बोला madam , मुझे मेरी मन मांगी मुराद देने को तैयार हो जाओ। इस जादूगर ने आपकी सारी problem दूर कर दी है। कुछ सोचती हुई सी निहारिका बोली, नहीं एक रह गयी है यश, मुझे पहले धुंधला क्यूँ दिखाई देता था।
ok चलो तुम्हारे office चल कर ये problem भी दूर कर देते हैं। office पहुँचते ही निहारिका को उसकी colleague राधिका बोली, निहारिका तुम बहुत सही समय से आई हो। राजन तुम्हारे computer  पर ही काम करने लगा था, उसे भी धुंधला दिखाई देने लगा था और उसके भी सिर में बहुत ही दर्द रहने लगा था। आज ही वो पूछ रहा था, कि तुमने कौन से Dr. को follow किया है?
यश बोला उससे कह दो, अब इस office  में किसी के भी सिर में दर्द नहीं होगा। क्योंक Dr. यश जहाँ होता है, वहाँ दर्द नहीं होता है। उसकी इस बात पे सबसे तेज़ निहारिका हँस रही थी। वो बोला problem इस computer में ही है, इसे किसी Engineer  को दिखाओ। वैसा ही किया गया, problem  computer के software  में ही थी।
लौटते हुए, यश बोला, निहारिका अब मुझे इनाम मिलना चाहिए? और वो क्या है? निहारिका मुस्कुरा के बोली।
तुम मुझ से शादी करके America  चलोगी, पिछली बार मैं आया था, तब तुम नहीं मानी थीं, पर अब मैं तुम्हारी एक नही सुनुंगा। अच्छा एक बात और बता दो, मेरी eye sight का क्या है? सब ठीक है।
कुछ Dr. अपना clinic चलाने के लिए ऐसे ही patient  बना लेते हैं। तुम्हारे glasses में power भी नहीं हैं, इसलिए उस Dr .ने तुम्हें glasses भी अपने यहाँ से ही दिये थे। और हाँ तुम्हारे retina में भी कोई problem नहीं है।

निहारिका ने यश को हाँ कर दी, वो आज बहुत खुश थी, उसे अपने बेमतलब के डर से आज़ादी जो मिल गयी थी। जो बीमारी उसे कभी थी ही नहीं, उसे उसके डर ने बना के उसे सचमुच का बीमार बना दिया था। यश भी बहुत खुश था, उसकी dream girl हमेशा के लिए उसकी जो होने जा रही थी।  

Monday, 24 September 2018

Article : No Choice

No Choice



जब हम लोग बच्चे थे, तो हमारी life, No choice  हुआ करती थी। पर अगर आप सोचेंगे, तो आप पाएंगे, कि वो समय बहुत अच्छा था।
तब हमारे पास TV के बहुत सारे channel नहीं थे, हमे सिर्फ दूरदर्शन ही देखने को मिलता था। कोई choice नहीं थी, किसी के पास, कुछ और देखने की। अतः सारा परिवार मिलकर TV देखा करता था। और हमें उसके सारे program बड़े ही भाते थे। कितना इंतज़ार हुआ करता था, Friday  के चित्रहार का, Sunday की रंगोली का।
तब सिर्फ Sunday  का ही दिन ऐसा था, जब पूरे दिन program आया करता था। सुबह रंगोली, फिर बच्चों के program, शाम को film । पूरे हफ्ते में TV पर बस एक ही film देखने को मिलती थी। पर तब Sunday, Sunday  हुआ करता था।
अब तो जितने channel हो गए हैं, उतनी ही हमारे पास choice भी हो गयी है। हर segment के भी कई कई channel हो गए हैं। चाहे वो बच्चों के program  हों, या गानों का, फिल्म का हो या न्यूज़ का या फिर ढेरों सीरियल का। जो हर रोज़ दिन भर आते भी रहते हैं। साथ ही programs का कई बार repeat telecast भी होता है। आपके पास अपनी पसंद के program देखने की बहुत सारी choice है।
पर सोचिए क्या अब भी उतना ही मज़ा आता है। नहीं! क्योंकि अब सब का साथ नहीं है, और असली मज़ा सबके साथ ही आता है।
हर रोज़ दिनभर ही प्रोग्राम के आने से किसी भी प्रोग्राम का उतना मज़ा नहीं रह गया है। और इससे एक और बात हो गयी, Sunday भी पहले सा Sunday नहीं रह गया है।
ये choice वाली बात सिर्फ entertainment में ही नहीं, जीवन के अन्य पहलुओं पे भी लागू होती है। मसलन, तब हमारे पास आज के बच्चों जैसे बहुत सारे कपड़े नहीं हुआ करते थे। क्योंकि तब कपड़े भी कुछ ही अवसर, जैसे जन्मदिन, होली, दिवाली, या घर में किसी के विवाह के अवसर में ही मिलते थे। पर हम अपने कपड़े बड़े जतन से रखते थे। साथ ही उन अवसरों का भी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे। तब हमारे पास choice कम थी पर मज़ा कई गुना होता था। आजकल हम लोग बच्चों को इतनी dresses दिला देते हैं, कि कुछ तो बिना पहने ही छोटी हो जाती हैं। और बच्चों में भी किसी भी अवसर में कपड़े लेने की कोई इच्छा नहीं रहती है, ना ही उन्हें कपड़ों की कोई कद्र होती है।
हमारे पास खाने की भी बहुत choices नहीं रहा करती थी। उस समय खाने में इतनी variety नहीं थी, ना ही खाना पसंद ना आने पर कुछ और होने की गुंजाइश होती थी। हमें तो जो मिलता था, सब खा लेते थे। तब माँ हम लोगों के पीछे पीछे खाना ले के नहीं दौड़ा करती थी। और आज तो जितनी variety है, बच्चों के नाटक भी उतने ही ज्यादा हैं। क्योंकि उन्हें भूख का एहसास नहीं है। उनके एक mood पर, उनकी पसंद का खाना या तो बना दिया जाता है, या order कर दिया जाता है। उसके बाद भी आज बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
इस तरह बच्चों को बहुत सारी  choice, देकर हम उन्हें बहुत बड़े comfort zone  में लाते जा रहे हैं। जिससे adjustment level low होता जा रहा है। उसी का नतीजा है, बढ़ती हुई असंतुष्टि, एक जगह टिक कर ना रहना, रिश्तों में बढ़ती हुई दूरी, self centered होना, बढ़ते हुए तलाक और न जाने क्या-क्या।
क्योंकि हम तो अपने बच्चों को बहुत सारी choice दे सकते हैं। पर life, full of choice नहीं होती है। इसमें बहुत कुछ ऐसा भी होता है जो हमारी choice के विपरीत भी होता है।
तो कहीं हम और आप बच्चों को बहुत सारी choice  दे कर उन्हें comfort zone में जकड़ तो नहीं दे रहे हैं। अगर आप सचमुच चाहते हैं, कि आपका बच्चा हमेशा खुश रहे, तो उन्हें कभी बहुत सारी choice के साथ, और कभी no choice means without choice के रह कर बड़ा होने दीजिये, अगर वो सब condition  में adjust  कर सकेंगे, तभी वो संतुष्ट रहेंगे, और खुश भी। 

Sunday, 23 September 2018

Story Of Life : डर

डर


निहारिका का computer  based job था। आए दिन उसे घंटों computer  के साथ ही गुजारने होते थे। एक दिन अचानक से उसे कुछ धुंधला सा दिखाई देने लगा, वो ऐसे में भी अपना काम खत्म करने में लगी रही। चंद दिनों तक ऐसा ही चलता रहा, पर कुछ दिनों के बाद से उसके सिर में बहुत तेज़ दर्द रहने लगा। जिसका नतीजा ये हुआ कि, अब उससे कुछ भी काम नहीं हो पा रहा था।

एक दिन lunch time में उसने अपने colleagues से अपनी problem share की। सब बोलने लगे, तेरी eye sight week हो गयी होगी। बॉस से half day की छुट्टी लो, और किसी अच्छे Dr. को दिखा ले।

वो शहर में अकेली रहती थी, तो उसे किसी  specialist के बारे में नहीं पता था। colleagues भी सभी young थे, अतः कोई भी glasses use नहीं करता था। बस माथेराम, जो की एक peon  था, बस वही glasses use करता था।
उसने उन्हीं से पूछ लिया, भैया यहाँ कोई अच्छा Dr. है? उसने उन्हीं को बता दिया, जिन्हें वो दिखाता था। वो भी वहीं चली गयी, clinic  ठीक-ठाक ही था। Dr. ने देखा, तो बोले आपकी eye sight week  हो गयी है। आपको glasses  लगेंगे। आपको हमारे यहाँ ही glasses  भी मिल जाएंगे।   
उसके eye glasses भी लग गए। पर रिज़ल्ट वहीं का वहीं। उसे अभी भी धुंधला ही दिख रहा था। उसने जब colleagues को बताया। तो उनमें से एक बोला, तेरे retina  में तो problem  नहीं है।
अब क्या था, उसने उन्हीं Dr. को दिखाया, और दवाइयाँ भी शुरू हो गयी। पर आलम अब भी वही, उसे साफ नही दिखाई दे रहा था। अब उसे brain के Dr. को suggest  कर दिया गया। वहाँ उस दिन बहुत ही भीड़ हो रही थी। उसी आपाधापी में निहारिका ने Dr. को दिखा दिया। Dr. ने उसे तुरंत test करवाने को बोल दिया। test  करवाने वालों की भीड़ का तो क्या ही कहना, कब कौन अंदर जा रहा है, कौन निकल रहा है, किसी को समझ नहीं आ रहा था।
जैसे-तैसे निहारिका अपनी report ले कर पहुंची। reports देखते ही Dr. ने बोल दिया आपको brain cancer  है। अब आप अपनी life में जो अच्छा लगता है, वो कर लें। सुन कर उसे काटो तो खून नहीं था।
अभी उसकी उम्र ही क्या थी, मात्र 25 साल की ही थी। अभी तो वो ठीक से जी भी नहीं पायी थी, और Dr. ने उसके मरने का फरमान निकाल दिया था। उसे तो अभी सभी कुछ अच्छा लगता था, उनमें से क्या नहीं करे, और क्या क्या करे?
दिन भर हँसती खेलती निहारिका, के अब हर समय ही दर्द रहने लगा था। उसने अपनी बहुत ही अच्छी job छोड़ दी। दिन पर दिन वो पीली पड़ती जा रही थी, हमेशा वो इसी डर के साये में जी रही थी, कि ना जाने वो कितने दिन के लिए है। job छोड़ने से उसके सिर में दर्द तो कम हो गया था, पर अब तक डर उसमे इस हद तक समा गया था, कि वो अपने आप को अब कभी healthy feel नहीं करती थी।
America से उसका बहुत ही पक्का दोस्त यश आया। तो वो सबसे पहले अपनी दोस्त निहारिका से मिलने चला आया। पर निहारिका को यूँ पीला पड़ा देख कर उसे बहुत दुख हुआ। जब उसे पता चला, कि निहारिका को brain cancer है, तो वो बोला, ओह, फिर कुछ सोचने लगा। उसने कहा, मेरा दोस्त रचित brain surgeon  है। मैं भी एक brain specialist  ही हूँ। तो तुम कल उसके ही clinic में आ जाना। वहीं तुझे पूरा ठीक कर दूंगा, मुझसे brain की सारी बीमारियाँ बहुत ही डरती हैं, उसने निहारिका को हंसाने के लिए बोल दिया। पर निहारिका पर इस बात का कोई भी असर नहीं हुआ।.........
यश ने ऐसा सिर्फ निहारिका को हंसाने के लिए बोल दिया था या वो, वाकई निहारिका को ठीक कर पायेगा .......

जानते हैं डर ( भाग - २ ) में