Tuesday, 29 September 2020

Articles : World Heart Day ❤️

 World Heart Day ❤️



हमने आज तक ना जाने कितने Days, celebrate किए हैं, तो चलिए आज एक दिन अपने लिए मनाते हैं, आज world Heart Day ❤️ celebrate करते हैं।

आज हम, किसी और की इच्छा से नहीं बल्कि हमारे दिमाग की भी इच्छा से नहीं, बस केवल दिल की इच्छा वाले काम को करते हैं।

फिर वो चाहे पूरे दिन सोने का हो या दिनभर TV देखने का।

पेट भरकर दोस्तों से गप्पे लड़ाने का या yummy yummy खाना खाने का, या ऐसा ही कुछ और करने का.........

आज का दिन बिंदास, अपने दिल के नाम करने का।

साल के 364 दिन तो दिमाग अपनी चलाता है, आज उसकी छुट्टी कर के दिल को गुलजार करने का दिन है।

पर साथ ही इस नाजुक से दिल को लोगों की चुभने वाली बातों से बचाना है, इसको मस्त मगन हो खेलने देते हैं या इसे, इश्क से रुबरु कराते हैं। इश्क केवल साथी से नहीं होता है। वो हर उस से होता है, जो हमें पसंद हो, फिर चाहे वो कोई शख्स, रिश्ता या शौक ही क्यों ना हो।

क्योंकि यह दिल तभी खुश रहता है, जब यह बच्चा हो या अल्हड़ जवानी पर दस्तक देता है। 

तो इसको इससे ज्यादा बड़ा होने ही क्यों दें? वैसे भी संजीदा होने से मिला क्या है, तन्हाई के सिवा।

पर इसको बचाना है, उन निर्मोही BP, Sugar and Cholesterol जैसी कई बिमारियों से भी, जिनके होने से यह हमारे जानदार, शानदार दिल को इस कदर कमजोर कर देता है, कि वो कब अपनों को अलविदा कह देता है, पता ही नहीं चलता है।

 आज world Heart Day ❤️ के celebration में हम अपने दिल को मजबूत करने की राह में ले जाते हैैं, चलिए उसे सशक्त बनाते हैं।

Stay Fit, Stay Healthy.

Monday, 28 September 2020

Kids story : दीदी

दीदी



कुसुम की दो बेटियां थी, सरला और चंचला। दोनों ही अपने नाम के अनुरूप थीं।

कुसुम लोगों के घरों में घर बर्तन का काम करती थी। उसने सभी बड़े बड़े घरों में काम पकड़ा था।

तो आए दिन, नये से कपड़े और अच्छा अच्छा खाना उसे मिलता रहता था।

कुसुम ऐसे कपड़े ज्यादा लेती थी, जो सरला को आ जाएं, क्योंकि जब वो छोटे होते, तो चंचला के आ जाते थे। इससे होता यह था कि एक बार के एहसान से उसकी दोनों बेटियों के कपड़े हो जाते थे।

पर यह बात चंचला को बिल्कुल नहीं भाती थी। वो नहीं जानती थी कि माँ दूसरे घरों से कपड़े लाती है, वो सोचती माँ, सिर्फ दीदी के लिए नए कपड़े लाती है, मुझे तो हमेशा दीदी के पुराने कपड़े मिलते हैं। वो अपनी दीदी से बहुत चिढ़ती।

जब सरला  16 साल की हो गई, तो उसके मन में इच्छा हुई, वो कुछ ऐसा करें, कि माँ को घर घर काम ना करना पड़े।

उसने पता किया, कि एक पार्लर में 5 हजार का course कराने के बाद वहीं काम करने का मौका भी मिल जाता है।

सरला के सपने बड़े थे, उसने सोचा पार्लर का काम सीख कर वो खुद का पार्लर खोल लेगी।

पर माँ के पास इतने पैसे नहीं थे। तो सरला की माँ ने कहा, कुछ महीने का दिनभर का काम कर लो। पैसे जोड़ लेना, तो अपने सपने भी पूरे कर लेना।

सपना ने दो महीने के लिए काम पकड़ लिया, अब वो घर में नहीं रहती थी।

चंचला इस बात से बहुत खुश थी, अब माँ सब मेरे लिए ही लाएगी।

इधर कुसुम को कपड़े नहीं मिल रहे थे।

दिन गुजरते गये, चंचला की Birthday आने वाली थी, वो माँ से बोली, एक हफ्ते पहले ही बता दें रही हूँ, मुझे नयी frock चाहिए। हमेशा ही दीदी के छोड़े कपड़े पहने हैं, उस दिन नहीं पहन सकती।

माँ ने एक घर से अच्छी सी frock मांग ली। Frock देखकर चंचला बहुत खुश हुई।

वो अपनी birthday वाले दिन, इतराती हुई frock पहन कर उसी appartment में चली गई, जहाँ से माँ वो frock लायी थी।

सारे बच्चों ने उसका बहुत मज़ाक उड़ाया, और कहा, यह तो birthday में भी दूसरों के दिए हुए कपड़े पहनती है।

उसे आज पहली बार पता चला कि दीदी भी कभी नये कपड़े नहीं पहनती थी, उसका दिल टूट गया,वो रोती रोती घर आ गई।

सरला दो महीने बाद, आज वापस आ गई थी। चंचला को रोता देखकर  सरला बोली, माँ जहाँ जहाँ भी काम करती हो, उन सारे बच्चों को बोल देना आज़ हम शाम को चंचला की Birthday करेंगे, सब आ जाएं।

क्या बोल रही हो सरला, वो सब बहुत अमीर हैं, कोई नहीं आएगा। और अगर आ गये, तो हमारी गरीबी का बहुत मज़ाक उड़ाएंगे।

कोई नहीं उड़ाएगा, बस बुला लेना सबको, यह कहकर वो, चंचला को लेकर घर से निकल गई।

2 घंटे बाद दोनों लौटे तो उनके हाथ में बहुत सारे packets थे।

शाम को सारे बच्चे आ गये। चंचला बहुत सुन्दर red frock, red shoes और सब पहनकर बिल्कुल लाल परी लग रही थी।


Party में cake, pizza, burger and cold drink सब थे। सारे बच्चे चंचला और party की बहुत तारीफ करते हुए चले गए। चंचला बहुत खुश थी।

जब सब चले गए, चंचला अपनी dress change करने चली गई।

माँ, सरला से बोल रही थी, बेटा तुमने कितनी मेहनत से पैसे कमाए थे, अपने सपने के लिए, वो सब टूट गए।

सरला बोली, माँ सपने की टूटन से दिल की टूटन ज्यादा चुभती है। आज जो चुभन चंचला को हुई है, वही चुभन मैंने बहुत बार महसूस की है।

सपने के लिए,  मैं कल से फिर चली जाऊंगी, पैसे भी आ जाएंगे। पर मेरी छोटी का दिल आज ही जुड़ना ज़रुरी था।

चंचला, सब अन्दर से सुन रही थी, उसकी दीदी उसे कितना प्यार करती है, उसके लिए उसने अपना सपना तोड़ दिया। 

जबकि चंचला उससे हमेशा चिढ़ती थी,  सरला का उसे छोटी बोलना..... तो उसे बर्दाश्त ही नहीं था।

पर आज उसे अपनी दीदी, माँ से भी ज्यादा अच्छी लग रही थी। वो रोती हुई सरला से चिपक गई।

क्या हुआ छोटी? अब क्यों रो रही है?

दीदी आप बहुत अच्छी हैं, मुझे बहुत प्यार करती हैं, अब मैं कभी किसी बात की जिद्द नहीं करुंगी, आप का सपना जल्दी पूरा होगा। पर मैं अब आप से दूर नहीं रहना चाहती हूँ। आप को अपने काम से हर रविवार की छुट्टी लेनी होगी।

सरला ने कहा, बिल्कुल छोटी। पहले रोना बन्द करो, मैं तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकती।

चंचला बोली, मेरी दीदी सबसे best. फिर दोनों खिलखिलाने लगीं।

Sunday, 27 September 2020

Short Stories : बेटी भी हो आत्मनिर्भर

 बेटी भी हो आत्मनिर्भर



आज बेटी दिवस पर, सबसे पहले यह विचार आया कि, बेटी का आत्मनिर्भर होना कितना आवश्यक, कितना सार्थक?

यह आत्ममंथन चल ही रहा था कि माला आ गई।

सोचा लो हो गया, विचार-मंथन.......

अब यह आ गई है तो, पहले इसे काम बताएं, फिर इससे पूरे मोहल्ले के समाचार सुनें।

वो जब भी आती, बिना यह देखे कि मैं क्या कर रही हूँ, सुन रही हूँ, नहीं सुन रही हूँ, उसका मोहल्ला समाचार शुरू हो जाता।

पर आज सोचा, वो कुछ बोले, उससे पहले, मैं ही पूछ लेती हूँ।

क्यों माला, तेरे सूरज और चंदा कैसे हैं?

दोनों अच्छे हैं दीदी। आज मेरे बच्चों की याद कैसे आ गई?....

अरे, कुछ नहीं..... बस वैसे ही सोचा। 

अब तो दोनों बड़े हो चुके हैं। 

क्या सोचा है?

किस बारे में?.......

चंदा के बारे में। बड़ी हो गई है तो क्या ब्याह के बारे में नहीं सोच रही हो?

नहीं दीदी, मेरी बेटी बड़ी होशियार है। सोच रहीं हूँ, उसे कालेज भेज दूँ, पढी-लिखी होगी तो कोई अच्छी नौकरी कर लेगी, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी।

शादी का क्या है, आज नहीं तो दो चार साल में कर ही दूंगी।

पर आत्मनिर्भर रहेगी तो शान से रहेगी, वरना मेरी तरह ही चौके-चूल्हे  में खो जाएगी।

बस मेरे पास जमा पूंजी कम है,  तो कैसे बेटा-बेटी दोनों को योग्य बनाऊँ, वही समझ नहीं आ रहा।

सारे रिश्तेदार कह रहे हैं, बेटे पर पैसा लगा, बुढ़ापा सुधर जाएगा।

तब क्या करने का सोचा है?......

दीदी, सोचती हूँ, पहले बेटी का भविष्य ही सुधार लूँ।

जो मेरे पास ना रहेगी, उसको मजबूत बनाना ज्यादा जरूरी है।

मेरे बुढ़ापे के कारण मेरी बेटी का जीवन गर्त में नहीं जाना चाहिए।

फिर बेटे का क्या?

उसे तो मेरे पास ही रहना है, जल्दी ही उसके लिए भी पैसे जमा कर लूंगी।

यह कह कर वो काम में लग गयी, साथ मेरी सोच को सुदृढ़ कर गयी, कि बेटी को आत्मनिर्भर बनाना आवश्यक भी है और सार्थक भी।

जब वो अनपढ़ होकर इस दिशा में इतनी दृढ़ है।

तो हम क्यों सोचते हैं, बेटी को आत्मनिर्भर बनाते समय होने वाले खर्च के विषय में?

जैसे study loan लेकर बेटा भविष्य बना सकता है, बेटी भी।

जिसे अपनों से दूर होकर, एक नयी दुनिया बसानी है, गैरों को अपना बनाना है, उसका आत्मनिर्भर होना, उसके जीवन के लिए बहुत आवश्यक है।

जैसे एक पढ़ी लिखी लड़की दो परिवार को सुदृढ़ बनाती है, वैसे ही आत्मनिर्भर लड़की पूरे समाज में दोनों परिवारों को मान दिलाती है।