Monday, 1 May 2023

Article; May Day

 May Day 



क्या है, यह May day?

यह 1 May को होता है, इसलिए इसका नाम May day या  Labor day  हैं

इसका दूसरा नाम मजदूर दिवस या श्रमिक दिवस भी है।

जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि यह क्या है? पर यह श्रमिक दिवस के रूप में कम और मजदूर दिवस के नाम से ज्यादा प्रचलित है।

जबकि यह प्रचलित, श्रमिक दिवस के रूप में होना चाहिए।

क्योंकि मजदूर से तात्पर्य होता है कि वो जो घर, पुल इमारत आदि बनाता है। 

पर यह दिवस सभी तरह के श्रमिक वर्ग को धन्यवाद देने के लिए निर्धारित किया गया है। 

इस श्रमिक वर्ग में, वो आते हैं, जो factory में काम करते हैं, फिर वो चूड़ियां बनाने का कारखाना हो या, steel plant वाले, बिस्कुट, केक, बनाने वाले हों या साबुन शैंपू बनाने वाले हो, या mine वाले, घर, पुल, इमारत वाले हो या, सुनार, लोहार आदि का काम करने वाले हो, restaurant में काम करने वाले हो या hospital में काम करने वाले हो, आदि.. ऐसे बहुत से लोग आते हैं। 

दूसरे शब्दों में जो base work करते हैं या नींव की ईंट का काम करते हैं, जिनके काम किए बिना, कुछ भी पूरा नहीं हो सकता, पर उन्हें ना तो कभी इसका कोई श्रेय दिया जाता है ना ही अच्छा पारश्रमिक (pay) दिया जाता है, वो हैं श्रमिक...

और इसी बात को आधार बनाकर यह निर्धारित किया गया कि कम से कम, एक दिन तो ऐसा रखा जाए, जिसमें उनको धन्यवाद किया जाए, जिनके बिना जीवन संभव नहीं है।

May Day, उन सभी को धन्यवाद देने का दिवस है।

बहुत से plants में workers के लिए एक program, organised किया जाता है, जिसमें उनके लिए रंगारंग कार्यक्रम, dinner, gifts और insensitive भी दिया जाता है। ऐसा सभी organization में होना चाहिए।

May Day के उपलक्ष्य में सभी श्रमिकों को सादर नमन, साथ ही उन सभी को प्रणाम, जो इनके उज्जवल भविष्य के लिए नित नए प्रयास करते रहते हैं। 

आपको भी कहीं कंगूरे की ईंट अच्छी लगे तो एक बार नींव की ईंट पर भी ध्यान दीजिएगा और यदि उस श्रमिक का पता चले, जिसने बनाया हो, तो एक बार उसकी प्रशंसा भी अवश्य कीजियेगा। 

आपके प्ररेणा से भरे हुए शब्द, किसी को अपने जीवन की सार्थकता प्रदान करेगा। 

Friday, 28 April 2023

Poem : ख़ामोशी की आवाज

 ख़ामोशी की आवाज




ख़ामोशी भी ख़ामोश नहीं रहती है,

गौर से गर सुनो तो,

ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है।

उसकी भी अपनी एक आवाज़ होती है, 

और गर सुन सके‌ कोई उसे,

तो बस वही जिंदगी होती है।


जब रखता है मासूम मन, 

अपने स्कूल में पहला कदम।

उसकी ख़ामोश निगाहें,

ढूंढती है अपना बचपन।

गर सुन लेता है, 

उनकी ख़ामोशी,

कोई कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक।

वो बन जाता है उनके,

सपनो का रक्षक।

बच्चे उनके सानिध्य में,

उज्जवल भविष्य बनाते हैं।

ऐसे शिक्षक उन्हें,

जिंदगी भर याद आते हैैं।


ख़ामोशी भी ख़ामोश नहीं रहती है,

गौर से गर सुनो तो,

ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है।


जब होती है बेटी विदा, 

तब पिता की आंखों में नमी,

और जुबान पर ख़ामोशी होती है,

वो ख़ामोशी बेटी से जुदा होने की,

सारी व्यथा कहती है।

गर सुन सके बेटी, यह तो,

वो पिता के और नजदीक होती है।


ख़ामोशी भी ख़ामोश नहीं रहती है,

गौर से गर सुनो तो,

ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है।


जब आती है नई नवेली दुल्हन, 

अपने ससुराल की दहलीज पर,

उसकी ख़ामोश नजर पड़ती है घर पर।

वो ख़ामोशी उसके मन में चलती, 

अनेकों उलझन को बंया करती है।

गर सुन सके उसकी सास यह, 

बहू उसके नज़दीक होती है।


ख़ामोशी भी ख़ामोश नहीं रहती है,

गौर से गर सुनो तो,

ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है।  


जब हो साजन या सजनी ख़ामोश,

कह ना सके लब से पर,

आंखें कहना चाहती हों बहुत कुछ,

तब उस ख़ामोशी को पढ़ लेना।

उनकी ख़ामोश व्यथा समझ लेना, 

जो यह समझ पाता है।

उनका जीवन सुख से भर जाता है,

उनकी अमर हो जाती प्रेम गाथा है।


ख़ामोशी भी ख़ामोश नहीं रहती है,

गौर से गर सुनो तो,

ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है।  


जब हो जाते हैं, मां-पापा बुजुर्ग, 

बच्चों के इंतजार में हो जाते ख़ामोश। 

गर सुन सके बच्चे उनकी ख़ामोशी, 

उनके स्नेह और आशीष के साथ,

सफलताओं के शीर्ष पर पहुंच जाते हैं,

जीवन में हर ख़ुशी पाते हैं।


ख़ामोशी भी ख़ामोश नहीं रहती है,

गौर से गर सुनो तो,

ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है। 


आप भी एक बार सुनिएगा, ख़ामोशी अपने माता-पिता, अपने सास-ससुर अपने पति, अपनी पत्नी, अपने बच्चे, अपने दोस्तों की, सच मानिए, जिस दिन से आप ख़ामोशी भी सुनने लगेंगे, आप की bonding उनसे और बढ़ जाएगी क्योंकि


ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है,

उसकी भी अपनी एक आवाज़ होती है।

और गर सुन सके‌ कोई उसे,

तो बस वही जिंदगी होती है।


बहुत सारे प्यार के साथ, अपने सभी viewers के लिए ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके जीवन में सुख शांति और सौहार्द्र बना रहे 🙏🏻


यह अप्रैल की last post है, तो सोचा कि पांच साल के पूरे होने पर यह कोशिश बढ़ा दें कि अपने viewers की ख़ामोशी भी सुन सके।

जिससे हम लोगों की bonding और मजबूत हो जाए, तो आज आपकी नज़र में ख़ामोशी की आवाज साझा की है 🙏🏻🙏🏻

Wednesday, 26 April 2023

Story of Life: अनूठी सोच (भाग -3)

अनूठी सोच (भाग -1) व

अनूठी सोच (भाग -2) के आगे...


अनूठी सोच (भाग- 3)


हर्षवर्धन जी की बात सुनकर, अमन ने कहा, यह फ़ैसला तो मेरे मां-पापा ही करेंगे। मैं उन्हें कल भेज दूंगा। 

अगले दिन अमन के मां-पापा नितिन और मालती, हर्षवर्धन जी के घर आ गए।

हवेली की चकाचौंध से दोनों की आंखें चुंधिया गईं। उन लोगों की हर्षवर्धन जी ने बहुत अच्छे से आवभगत की।

उसके बाद वे बोले, आपका बेटा बहुत होनहार है, उसमें सुसंस्कार कूट-कूट कर भरें हैं। अगर आप लोगों अनुमति दें तो मैं उसे अपना दामाद बनाना चाहता हूं।

नितिन और मालती, बिना कुछ कहे बस एकटक एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे।

मैं समझ गया आप की कश्मकश, मैं अमन को घर जमाई नहीं बना रहा हूं, इसके लिए उसने मुझसे पहले ही मना कर दिया है।

नितिन मालती दोनों ही बहुत खुश हो गए, इतने बड़े घर की इकलौती बेटी, बहू बनकर आएगी तो सम्पन्नता तो अपने आप घर आ जाएगी। इससे अच्छा तो कुछ भी नहीं हो सकता, दोनों ने बिना एक पल भी गवांए हां कर दी।

आप पहले श्यामली से तो मिल लेते, फिर...

मालती ने बीच में ही हर्षवर्धन जी की बात काटते हुए कहा, जी जब बच्चों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया तो देखना दिखाना क्या है। जिंदगी तो उन दोनों को एक दूसरे के साथ काटनी है। जब मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी...

एक महीने के बाद का शुभ मुहूर्त निकला। हर्षवर्धन जी ने बहुत ही भव्य तरीके से शादी के सारे आयोजन किए। 

बारात में शामिल जितने भी लोग थे, सब बोल रहे थे कि अमन की तो लाटरी निकल गई। कुछ ने श्यामली को देख कुछ नाक-भौंह भी सिकोड़े, पर फिर भव्य स्वागत देखकर आपस में इतना ही बोले, जहां करोड़ों मिल रहे हों, वहां इतना compromise तो करना ही पड़ेगा, फिर हमें क्या, हमें कौन सा निभाना है। हमें तो party के मजे लेने चाहिए, कौन ऐसी party फिर मिलनी है...

शादी हो गई, विदा की बेला आ गई। हर्षवर्धन जी ने बहुत सारे सामान और रुपए पैसे दिए।

तभी अमन ने हर्षवर्धन जी से कहा, पापा जी मैं यह सब कुछ नहीं लूंगा, दहेज नहीं जाएगा मेरे साथ... अगर आप को अपनी बेटी, सिर्फ शादी के जोड़े में विदा करनी हो तो ठीक है, अन्यथा आप अपनी बेटी को अपने पास ही रखें।

अरे बेटा जी, यह क्या कह रहे हो? तुमने मुझसे मांगा थोड़ी ना है, फिर यह दहेज कैसे हुआ? यह सब तो तोहफे हैं, जिस पर तुम दोनों का हक़ बनता है। बल्कि मेरी कंपनी पर भी...

आप को मेरी काबिलियत पर शक है?

कैसी बात कर रहे हो अमन? तुम्हारी काबिलियत और संस्कार को देखकर ही तो मैंने अपनी बेटी तुम्हें सौंपी है...

 पर मैं कुछ नहीं दूंगा तो दुनिया क्या कहेगी, कि इतने बड़े घर की लड़की और खाली हाथ विदा हो गयी...

पापा जी, क्या आप ईश्वर से भी बड़े हो गए हैं? 

क्या कह रहे हो अमन!

सोचिए, ईश्वर जिसके पास पूरा जहान है देने के लिए,  उसने हमें खाली हाथ भेजा, तो हम इंसानों की औकात क्या कि किसी को कुछ दें।

ईश्वर ने हमें जन्म के साथ दिया है, तो यह बहुत सारे रिश्ते... जो हमारा ध्यान रखते हैं, आशीर्वाद देते हैं, बहुत सारा स्नेह देते हैं और हमें कभी अकेला नहीं रहने देते हैं। 

आप भी मुझे अपना आशीर्वाद, स्नेह और साथ दीजिए, इनसे अनमोल कुछ भी नहीं... 

ओह अमन, मैंने तुम्हें सोना समझा था, पर तुम तो हीरा निकले.. मुझे तुम पर गर्व है, और इस बात का सुकून की मैंने तुम्हें अपनी बेटी के लिए चुनकर बिल्कुल सही निर्णय लिया है। 

साथ ही गर्व है, तुम्हारी अनूठी सोच पर... तुम चाहते तो रुपए के ढेर पर बैठ सकते थे। पर तुमने उस नश्वर चीज़ को ठुकरा कर अनमोल रिश्तों, आशीर्वाद, स्नेह और साथ को चुना... तुम्हारी जैसी अनूठी सोच अगर सबकी हो जाए तो दहेज प्रथा जैसी समाजिक कुरीति का जड़ मूल से नाश हो जाए...

सब अमन के फैसले से बहुत खुश थे और अमन की अनूठी सोच पर उसे बधाई दे रहे थे। 

बस मां दुःखी थीं कि बेटे ने हाथ आए मौके को गंवा दिया, साथ ही उन्हें इस बात का भी अफसोस था कि उनके इतने खूबसूरत बेटे के लिए कैसी सी बहू मिली है! ... ना माया मिली ना राम...

हर्षवर्धन जी, मालती के मन की बात समझ गये, वो बोले समधन जी, आप अफसोस ना करें, आपने कोई घाटे का सौदा नहीं किया, आप का बेटा होनहार है और मेरी बेटी गुणी...मेरा विश्वास कीजिए, बहुत जल्दी आप मुझसे भी बड़ी हवेली में रहेंगी और साथ ही बहुत सम्मान और प्यार भी मिलेगा आपको जिंदगी भर... फिर मैं तो हूं ही, आप सबका साथ देने के लिए...

हर्षवर्धन जी की बात सुनकर मालती भी बहुत खुश हो गई, उसे भी अपने होनहार बेटे और उसकी अनूठी सोच पर नाज हो गया...