छोटी-छोटी बातें
निखिल और निर्झर की कुछ सालों पहले ही शादी हुई थी। निर्झर जितने खुले हाथों से खर्चा करती थी, निखिल उतना ही पाई-पाई को पकड़कर चलने वाला था।
निर्झर का खर्चिला स्वभाव और निखिल का हर छोटी-छोटी बातों पर टोका-टाकी, ऐसे विरोधाभास स्वभाव के होने के कारण दोनों में आए दिन “तू-तू-मैं-मैं” हो ही जाती थी।
दोनों को ही लगता घरवालों ने क्या देखकर शादी कर दी, इससे तो ताउम्र कुंवारे रहते तो क्या ही अच्छा होता।
एक दिन ऐसे ही लड़-झगड़कर निखिल अपने दोस्त शिखर के पास पहुंचा।
“क्या हुआ निखिल, इतने गुस्से में क्यों हो? भाभी ने आज कुछ खाने को नहीं दिया?” शिखर ने पूछा।
“अरे, वो दुनिया-भर की मेरी पसंद की चीजें बनाकर खिलाती ही रहती है।” निखिल ने उसी गुस्से में कहा।
“फिर क्या, मायके में जाने की ज़िद्द कर रही हैं?”
“अरे नहीं, वो तो मायके में मेरे बिना जाती ही नहीं है,” निखिल ने गर्व से कहा।
शिखर ने कहा, “ओ हो! वो इतना ध्यान रखती है, फिर problem क्या है?”
“अरे यार, मैं उसके खर्चीले स्वभाव से परेशान हो गया हूँ, आए दिन कुछ न कुछ मंगाना है। जबकि सब भरा हुआ है उसके पास”
“जैसे क्या मंगा लिया भाभी ने?” शिखर को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर निर्झर ने ऐसा क्या मंगा लिया, जो निखिल इतना गुस्से से लाल हो गया है।
“अरे यार, उसके चचेरे भाई की शादी है, तो एक नयी dress, फिर उससे matching jewelry, आज उनके matching के footwear। उसकी तो list ही खत्म नहीं होती है!”
“देख भाई निखिल, ladies शादियां आने पर इतना खर्च करती ही हैं, उन्होंने कुछ ऐसा नहीं कर दिया है कि तू इतना आगबबूला हो रहा है।”
“तू उन्हें हर महीने एक fix amount क्यों नहीं दे देता है, उन्हें भी पता रहेगा कि वो कितना तक ख़र्चा कर सकती हैं, जो उनके होंगे जिसका तू कोई हिसाब नहीं मांगेगा।”
“Fixed amount, वो किसलिए? और हिसाब क्यों नहीं मांगू? यह अच्छा कहा तूने दोस्त।”
“देख निखिल, तू job करता है, तो तुझे भी तो month end पर salary मिलती है, जिसे तू अपने हिसाब से खर्च करता है, उसके लिए तुझसे कौन हिसाब मांगता है।”
“अरे तो मैं पूरे साल कड़ी मेहनत करता हूं, तब मिलती है salary।
“तो भाभी भी तो पूरे महीने तत्परता से घर के सारे काम तेरी पसंद के अनुसार ही करती रहती हैं। अगर एक fixed amount तू उन्हें अपनी मर्ज़ी से खर्च करने को दे देगा, छोटी-छोटी बातों को नहीं उठाएगा तो तेरी जिन्दगी में प्यार ही प्यार होगा। ऐसी छोटी-छोटी बातें ही घर से खुशियां छीन लेती हैं।”
निखिल का बहुत मन तो नहीं मान रहा था, पर वो शाम को जब घर गया तो निर्झर के लिए उसकी पसंद के समोसे लेकर गया।
निर्झर ने दरवाजा खोला, तो मुरझाई हुई थी। “निर्झर, देखो मैं तुम्हारे पसंद के समोसे लाया हूं। चाय बना लाओ, दोनों मिलकर खाएंगे।”
निर्झर एक cup चाय के साथ समोसे व एक plate ले आई।
“अरे! तुम अपने लिए नहीं लाई?”
“मेरा मन नहीं है,” धीरे स्वर में बोली निर्झर।
“अरे आ जाओ, इतने मन से तुम्हारे पसंद के समोसे लाया हूं. अच्छा चलो, आज एक ही cup से चाय पीते हैं।” यह कहते हुए उसने दस हजार निर्झर की ओर बढ़ा दिए।
“यह क्यों?” निर्झर ने बिना पकड़े ही पूछा
“अब से तुम्हें हर महीने दूंगा, जो पूरी तरह तुम्हारे हैं, जिन्हें तुम जैसे चाहो ख़र्चा करना, मैं छोटी-छोटी बातों को पूछकर अब तुमसे हिसाब नहीं मांगूंगा।”
मुरझाई हुई निर्झर फूल-सी खिल गईं, कि अब से वो कुछ रुपये अपनी मर्ज़ी से खर्च कर सकेगी, जिसका हिसाब भी नहीं देना। दोनों ने एक ही cup और plate से चाय और समोसा खाया।
निर्झर का खिला-खिला चेहरा देखकर निखिल समझ चुका था कि छोटी-छोटी बातों को छोड़ने और समझने से ही जिंदगी खुशहाल होती है।
फिर खर्चे को लेकर उनमें कभी झगड़े नहीं हुए...

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