Tuesday, 17 September 2019

Article : कौए के दिन


कौए के दिन

श्राद्ध-पक्ष, पितृपक्ष, या कनागत के दिन आ गए हैं। ये वो दिन हैं, जब लोगों को कोयल से ज्यादा कौए भाते हैं। वैसे तो ये काला काग और उसकी काएँ-काएँ किसी को फूटी आँख नहीं सुहाती है। पर जब बात कनागत की हो तो, लोग ढूँढ-ढूँढ कर कौए को भोजन खिलाते हैं।


पर क्या आपके मन में ये सवाल कभी नहीं आया, कि कौए को ही क्यों खिलाते हैं? तो आज आपको इस विषय में बताते हैं।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि पक्षियों में कौआ चंडाल का प्रतीक है, उसे यमराज जी का दूत माना गया है। अतः ये माना जाता है, ये हमारे पितरों के पास से आते हैं। जिसके कारण symbolic रूप में, इन्हें खिलाया गया भोजन हमारे पितरों तक पहुँच जाता है। उन्हें तृप्ति मिल जाती है।

गरुण पुराण में भी व्याख्या की गयी है, कि कौए को भोजन खिलाने से पितरों तक भोजन पहुँच जाता है।

कहा जाता है इंद्र भगवान के पुत्र जयंत ने सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था, तब भगवान श्री राम जी, ने उसे वरदान दिया था, कि तुम्हें(कौए) अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा।

पर ऐसा नहीं है, कि हिन्दू धर्म में केवल श्राद्ध पक्ष में कौए को भोजन कराना चाहिए, बल्कि रोज़ ही हमें भोजन को पाँच लोगों को अर्पण करना चाहिए।

पहले ईश्वर को, दूसरा गाय को, तीसरा कुत्ते को, चौथा कौए को, और पांचवा चींटियों को। ऐसा इसलिए कहा गया है, क्योंकि पूरा ब्रह्मांड पाँच तत्वों का बना है। जिसमें ईश्वर आकाश का, गाय धरती का, कुत्ता जल का, कौआ वायु का और चींटी अग्नि का प्रतीक मानी गयी है।

अगर आप पंडितों की सुनते हैं, तो वे, श्राद्ध में, पंडितों को भोजन व दान आदि करने की बात करते हैं।

माना जाता है, जब हम इस संसार में आते हैं, तो हमारे ऊपर पितृ-ऋण आ जाता है, जिन्हें पितृपक्ष के दिनों में पूजा-पाठ, दान, तर्पण से उतारा जाता है।

ये तो बात हुई शास्त्र, पुराणों और पंडितों की। 

पर जो प्यार, श्रद्धा, और विश्वास हम इन कौओं के प्रति अपने पूर्वजों के जाने के बाद दिखाते हैं, काश वही प्यार, श्रद्धा, और विश्वास माता-पिता के जीवित रहते ही दिखाएँ।

सच जानिए, कौओं को भोजन कराने से ज्यादा पुण्य माता-पिता की सेवा में है।

उनके इस दुनिया से जाने के बाद नहीं, उनके जीते-जी सेवा करके आप इस ऋण से मुक्त हो सकते हैं। और इससे सरल और उचित कोई भी विधि नहीं है।  

Related Post(s):

Article: पितृपक्ष, बस 15 मिनट... ( https://shadesoflife18.blogspot.com/2018/09/article-15.html?m=1 )

Monday, 16 September 2019

Story of Life: एहसास (भाग - 4)


एहसास (भाग - 4)

मालिनी बोली, Sorry Sir...
पर ऐसा ही treatment हम patient को देते हैं। जिसकी permission तो आप ने ही दी है।

डॉ मालिनी की ऐसी बात सुनकर डॉ नितीश कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले, डॉ मालिनी आप मुझ से इन सब बातों की हमेशा शिकायत करती रहीं, पर मैं, धन के लोभ में अंधा, कभी  patient की तकलीफ समझ ही नहीं सका। पर आप ने जब मेरे साथ भी वैसा किया, तो एक एक बात को समझ पा रहा हूँ।

आज से ये hospital फिर से वैसे ही चलेगा, जैसा डॉ अमर के सामने चलता था। सारे  doctors और staff को बता दें, जो ठीक से अपना काम नहीं करेगा, उसे निकाल दिया जाएगा। अब सभी ठीक से अपना काम करने लगे, और जो नहीं सुधरे उन्हें निकाल दिया गया।

डॉ नितीश को तुरंत अच्छे room में shift कर दिया गया, अच्छे से treatment भी शुरू हो गया। जिससे डॉ. नितीश जल्दी ही ठीक हो गए‌। 

अब से उन्होंने दो heads की post कर दी, एक वो खुद थे, और दूसरी head डॉ मालिनी थीं।

त्रिवेणी hospital फिर पहले-सा अच्छा हो गया। क्योंकि डॉ नितीश पर जब खुद पर पड़ी थी, तो उन्हें सबके दर्द का एहसास हो गया था। अब वो बहुत अच्छे से जान चुके थे, कि doctor सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं वरन समाज सेवा के लिए भी बनते हैं।

Saturday, 14 September 2019

Poem : हिन्दी दिवस में ही क्यूँ ?

हिन्दी दिवस में ही क्यूँ ?


हिन्दी, हिन्दी, हिन्दी,
इसकी गूंज, क्यों,
केवल हिन्दी दिवस,
में ही आती है?

बाकी दिन तो,
हिन्दी बोलने में भी,
किसी को रास,
नहीं आती है।

हिन्दी शब्दकोश का,
प्रचुर भंडार है,
अलंकार, मुहावरे, रस, छंद
इसमें अपार  हैं।

तो सोचिए ज़रा,
आखिर हिन्दी,
बोलने में, इतनी
शर्म क्यों आती है?

हिन्दी हर रिश्ते को,
एक अलग पहचान,
एक अलग अस्तित्व,
एक अलग ही मान,
दिलाती है। 

फिर क्या कारण है,
हमारी जिह्वा,
हिन्दी बोलने से,
कतराती है?

 विदेशी भाषाएं,
हमें खूब भाती है,
हिन्दी बोलते ही,
प्रतिष्ठा घट जाती है। 

आखिर क्यों हिन्दी,
अपने ही देश में,
मां भारती सा,
सम्मान नहीं पाती है?

हिन्दी पहचान है,
भारत की,
हिन्दी मान  है,
भारत की। 

तब हमें क्यों,
हिन्दी केवल,
हिंदी दिवस में ही,
याद आती है?

राष्ट्रीय हिन्दी दिवस के पावन  अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।

आज मैं  कविता के माध्यम से आप सब के समक्ष एक प्रश्न रख रहीं हूँ। 

कृपया एक बार सोचिएगा जरूर, अगर हम अपनी भाषा का सम्मान करेंगे, तभी दूसरे भी करेंगे।