Wednesday, 26 April 2023

Story of Life: अनूठी सोच (भाग -3)

अनूठी सोच (भाग -1) व

अनूठी सोच (भाग -2) के आगे...


अनूठी सोच (भाग- 3)


हर्षवर्धन जी की बात सुनकर, अमन ने कहा, यह फ़ैसला तो मेरे मां-पापा ही करेंगे। मैं उन्हें कल भेज दूंगा। 

अगले दिन अमन के मां-पापा नितिन और मालती, हर्षवर्धन जी के घर आ गए।

हवेली की चकाचौंध से दोनों की आंखें चुंधिया गईं। उन लोगों की हर्षवर्धन जी ने बहुत अच्छे से आवभगत की।

उसके बाद वे बोले, आपका बेटा बहुत होनहार है, उसमें सुसंस्कार कूट-कूट कर भरें हैं। अगर आप लोगों अनुमति दें तो मैं उसे अपना दामाद बनाना चाहता हूं।

नितिन और मालती, बिना कुछ कहे बस एकटक एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे।

मैं समझ गया आप की कश्मकश, मैं अमन को घर जमाई नहीं बना रहा हूं, इसके लिए उसने मुझसे पहले ही मना कर दिया है।

नितिन मालती दोनों ही बहुत खुश हो गए, इतने बड़े घर की इकलौती बेटी, बहू बनकर आएगी तो सम्पन्नता तो अपने आप घर आ जाएगी। इससे अच्छा तो कुछ भी नहीं हो सकता, दोनों ने बिना एक पल भी गवांए हां कर दी।

आप पहले श्यामली से तो मिल लेते, फिर...

मालती ने बीच में ही हर्षवर्धन जी की बात काटते हुए कहा, जी जब बच्चों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया तो देखना दिखाना क्या है। जिंदगी तो उन दोनों को एक दूसरे के साथ काटनी है। जब मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी...

एक महीने के बाद का शुभ मुहूर्त निकला। हर्षवर्धन जी ने बहुत ही भव्य तरीके से शादी के सारे आयोजन किए। 

बारात में शामिल जितने भी लोग थे, सब बोल रहे थे कि अमन की तो लाटरी निकल गई। कुछ ने श्यामली को देख कुछ नाक-भौंह भी सिकोड़े, पर फिर भव्य स्वागत देखकर आपस में इतना ही बोले, जहां करोड़ों मिल रहे हों, वहां इतना compromise तो करना ही पड़ेगा, फिर हमें क्या, हमें कौन सा निभाना है। हमें तो party के मजे लेने चाहिए, कौन ऐसी party फिर मिलनी है...

शादी हो गई, विदा की बेला आ गई। हर्षवर्धन जी ने बहुत सारे सामान और रुपए पैसे दिए।

तभी अमन ने हर्षवर्धन जी से कहा, पापा जी मैं यह सब कुछ नहीं लूंगा, दहेज नहीं जाएगा मेरे साथ... अगर आप को अपनी बेटी, सिर्फ शादी के जोड़े में विदा करनी हो तो ठीक है, अन्यथा आप अपनी बेटी को अपने पास ही रखें।

अरे बेटा जी, यह क्या कह रहे हो? तुमने मुझसे मांगा थोड़ी ना है, फिर यह दहेज कैसे हुआ? यह सब तो तोहफे हैं, जिस पर तुम दोनों का हक़ बनता है। बल्कि मेरी कंपनी पर भी...

आप को मेरी काबिलियत पर शक है?

कैसी बात कर रहे हो अमन? तुम्हारी काबिलियत और संस्कार को देखकर ही तो मैंने अपनी बेटी तुम्हें सौंपी है...

 पर मैं कुछ नहीं दूंगा तो दुनिया क्या कहेगी, कि इतने बड़े घर की लड़की और खाली हाथ विदा हो गयी...

पापा जी, क्या आप ईश्वर से भी बड़े हो गए हैं? 

क्या कह रहे हो अमन!

सोचिए, ईश्वर जिसके पास पूरा जहान है देने के लिए,  उसने हमें खाली हाथ भेजा, तो हम इंसानों की औकात क्या कि किसी को कुछ दें।

ईश्वर ने हमें जन्म के साथ दिया है, तो यह बहुत सारे रिश्ते... जो हमारा ध्यान रखते हैं, आशीर्वाद देते हैं, बहुत सारा स्नेह देते हैं और हमें कभी अकेला नहीं रहने देते हैं। 

आप भी मुझे अपना आशीर्वाद, स्नेह और साथ दीजिए, इनसे अनमोल कुछ भी नहीं... 

ओह अमन, मैंने तुम्हें सोना समझा था, पर तुम तो हीरा निकले.. मुझे तुम पर गर्व है, और इस बात का सुकून की मैंने तुम्हें अपनी बेटी के लिए चुनकर बिल्कुल सही निर्णय लिया है। 

साथ ही गर्व है, तुम्हारी अनूठी सोच पर... तुम चाहते तो रुपए के ढेर पर बैठ सकते थे। पर तुमने उस नश्वर चीज़ को ठुकरा कर अनमोल रिश्तों, आशीर्वाद, स्नेह और साथ को चुना... तुम्हारी जैसी अनूठी सोच अगर सबकी हो जाए तो दहेज प्रथा जैसी समाजिक कुरीति का जड़ मूल से नाश हो जाए...

सब अमन के फैसले से बहुत खुश थे और अमन की अनूठी सोच पर उसे बधाई दे रहे थे। 

बस मां दुःखी थीं कि बेटे ने हाथ आए मौके को गंवा दिया, साथ ही उन्हें इस बात का भी अफसोस था कि उनके इतने खूबसूरत बेटे के लिए कैसी सी बहू मिली है! ... ना माया मिली ना राम...

हर्षवर्धन जी, मालती के मन की बात समझ गये, वो बोले समधन जी, आप अफसोस ना करें, आपने कोई घाटे का सौदा नहीं किया, आप का बेटा होनहार है और मेरी बेटी गुणी...मेरा विश्वास कीजिए, बहुत जल्दी आप मुझसे भी बड़ी हवेली में रहेंगी और साथ ही बहुत सम्मान और प्यार भी मिलेगा आपको जिंदगी भर... फिर मैं तो हूं ही, आप सबका साथ देने के लिए...

हर्षवर्धन जी की बात सुनकर मालती भी बहुत खुश हो गई, उसे भी अपने होनहार बेटे और उसकी अनूठी सोच पर नाज हो गया...

Tuesday, 25 April 2023

Story of Life: अनूठी सोच (भाग - 2)

 अनूठी सोच (भाग -1) के  आगे

अनूठी सोच (भाग - 2) 



एक दिन उसने अमन से अपने प्यार का इज़हार कर दिया... 

इतने दिनों के साथ से अमन भी मन ही मन श्यामली को चाहने लगा था।

पर अचानक से श्यामली का इज़हार सुनकर वो सकपका गया कि इतने बड़े घर की लड़की और मैं... कोई तैयार नहीं होगा। 

उसने बड़े प्यार से श्यामली को समझाया कि जो तुम सोच रही हो, वो नामुमकिन है, कोई तैयार नहीं होगा, यह सोचकर तुम सिर्फ अपने दिल को ही दुखाओगी... 

मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती...

वैसे भी आज तक मुझे किसी ने नज़र उठा के भी देखा है? एक तुम्हीं हो, जिसने मेरे मन को समझा है। 

ऐसा नहीं है श्यामली, तुम इतने बड़े घर की बेटी हो, कोई भी तुम्हें अपना जीवनसाथी बना लेगा...

तो तुम क्यों नहीं? 

तुम समझा करो श्यामली... 

ऐसा कुछ भी तुम्हारे पापा जी को पता चलेगा, तो उन्हें लगेगा कि मैं तुम्हें पढ़ाने नहीं, बल्कि फंसाने आया था...

श्यामली के पिता, हर्षवर्धन जी ने श्यामली और अमन की सारी बातें सुन ली थी...

उन्होंने अमन से कहा, बेटा तुम्हे क्या लगता है, मुझमें इंसान पहचानने की क्षमता नहीं है? 

अरे सर आप!..

बाकी तुम सही कह रहे थे, कि रुपए के बल पर मैं किसी को भी अपना दामाद बना सकता हूं।

पर वो सब मेरे पैसों से शादी करेंगे, कोई मेरी बेटी को प्यार नहीं करेगा और बिन प्यार, जीवन व्यर्थ है।

तुम पहले हो जिसने मेरी बेटी का रंग-रूप नहीं देखा बल्कि इसके गुणों को देखा। वैसे यह कहना ज्यादा उचित होगा कि ना केवल देखा, बल्कि इसके गुणों को निखारा भी है।

मैं बहुत खुश रहूंगा, अगर तुम मेरे दामाद बनोगे। 

श्यामली तो मेरी इकलौती बेटी है, तो मेरी सारी धन-संपत्ति भी उसी की है और तुम्हारे सुरक्षित हाथों में मुझे उसे सौंपते हुए अत्याधिक सुकून मिलेगा।

हर्षवर्धन जी की बात सुनकर, अमन ने कहा, यह फ़ैसला तो मेरे मां-पापा ही करेंगे। मैं उन्हें कल भेज दूंगा।

आगे पढें, अनूठी सोच (भाग- 3) में...

Monday, 24 April 2023

Story of Life: अनूठी सोच

अनूठी सोच  


अमन, बहुत ही होनहार, ऊंचे-लंबे कद का आकर्षक युवक था। उसके पिता बहुत ही साधारण सी नौकरी करते थे अतः घर चलाने के लिए वो tuition करता था। एक दिन उसके दोस्त ने उसे बहुत अमीर घर की लड़की को tuition पढ़ाने को कहा। अमन खुशी-खुशी राज़ी हो गया और अगले दिन उस घर में पहुंच गया।

बहुत ही विशाल और भव्य हवेली थी। कुछ देर अमन वहीं खड़ा रहा और हवेली को निहारता रहा। मानो अपने मन को टोह रहा हो कि क्या वो इस हवेली में जाने लायक है? फिर उसने अपने मन से इस विचार को झटका और अंदर चला गया।

जब घर के मालिक को पता चला कि अमन पढ़ाने आया है, तो उसका बहुत भव्य स्वागत किया गया। 

उसके बाद उन्होंने श्यामली को आवाज़ लगाई। श्यामली बहुत ही साधारण से नैन नक्श वाली सांवली लड़की थी, साथ ही उसके मुख के आधे मुख पर कालिमा (लहसुन) भी छाई  थी, जो उसके रुप को और मधम कर देती थी। 

कोई भी लड़का श्यामली को नहीं देखता था, जिसकी श्यामली को कभी कभी ग्लानि भी होती थी। 

अमन ने श्यामली को एक क्षण देखा, फिर अपना परिचय देकर, उससे काॅपी और किताब निकालने को कहा...

और उसके बाद से ही शिष्या और गुरु का रिश्ता अपनी रफ़्तार से बढ़ चला...

अमन का ज्ञान और श्यामली की लगन काम आई, इस साल श्यामली ने अपने कॉलेज में top किया, साथ ही उसकी कविता की book भी publish हुई, जिसके लिए भी श्यामली को अमन ने ही प्रोत्साहित किया था।

Actually tuition पढ़ाते समय ही अमन ने यह समझ लिया था कि श्यामली बहुत ही अच्छी कविता लिखती है।

उसका एक दोस्त, विनय publication में था, तो उसने श्यामली की कुछ कविताएं दिखाई।

जिन्हें देखकर, विनय बोला, यह बहुत अच्छी कविताएं हैं और अगर ऐसी और मिल जाए तो इन कविताओं की पूरी एक किताब ही छाप दें।

इसके बाद पढ़ाने के साथ साथ, अमन ने श्यामली को कविताएं लिखने को भी प्रेरित किया। 

जिसका ही नतीजा था कि आज श्यामली की कविताओं का संकलन छपा था...

कविताएं इतनी अच्छी थीं कि उसकी धूम मच गई साथ ही श्यामली के मन में अमन के लिए प्रेम के अंकुर फूट गये।

एक दिन उसने अमन से अपने प्यार का इज़हार कर दिया...

आगे पढ़े अनूठी सोच (भाग-2) में...