Tuesday, 17 September 2024

Article : Popularity Ganpati Bappa ki

Popularity गणपति बप्पा की..

यूं तो भारत अनेकानेक देवी-देवताओं की पवित्र पावन भूमि है, पर फिर भी अलग-अलग states में अलग-अलग देवी-देवताओं की मान्यता है।

जैसे बंगाल व पंजाब में मातारानी की, महाराष्ट्र में गणपति बप्पा की, south में, भगवान विष्णुजी, लक्ष्मी माता व मुरुगन जी की, और north में भगवान शिव, भगवान श्री कृष्ण, भगवान श्री राम और हनुमान जी को अधिक मानते हैं।

हालांकि, अब तो सभी जगह, सभी states के लोग रहते हैं, इसलिए लगभग पूरे भारत में सभी देवी-देवताओं के आगमन और उनके विसर्जन की धूम रहती है।

लेकिन जब आज अनंत चतुर्दशी है तो गणेश जी पर ही पूरा article अर्पित हो, इतना तो बनता है। 

वैसे भी महादेव व माता पार्वती जी के लाडले पुत्र हैं, तो सभी देवी-देवताओं के लाडेश्वर भी ठहरे।

तो गणेश जी को दंडवत प्रणाम के साथ आगे का article बढ़ाते हैं...

हाँ तो, हुआ ऐसा कि हमारी लाडली बिटिया रानी, ज़रा बड़ी हुई तो, उन्हें दो देवताओं ने बड़ा आकर्षित किया। 

पहले तो कृष्ण जी और दूसरे गणेश जी...

तो बस madam जी तो थीं छोटी, तो खुद तो कुछ कर नहीं सकतीं थीं, पर हुक्म पूरा चला लेती थीं।

तो बस जन्माष्टमी पर्व पर मम्मी के द्वारा सिखाई दुनिया भर की चीज़ का भोग लगाते थे पर बिट्टो रानी ने मक्खन भी जुड़वा दिया, कि बिन मक्खन के कान्हा जी का कैसा भोग? तो बस अब तो हर जन्माष्टमी पर्व पर मक्खन भी जरुर बनता है।

और दूसरे, हमारे गणपति महाराज..

अब हम लोग तो ठहरे North Indian, तो north के भगवान श्री राम, श्री कृष्ण, बम-बम भोले और हनुमान जी वाले... 

तो गणेश जी का आगमन तो बस दिपावली पूजन में माता लक्ष्मी जी के साथ ही करते थे। 

पर हमारी छोटी madam, फैल गई, कि नहीं भाई, हम तो हर गणेश चतुर्थी में गणपति बप्पा को बैठाएंगे और मोदक का भोग भी लगाएंगे।

बस तब से नियम बन गया, गणेश चतुर्थी में गणपति बप्पा को बैठाने और मोदक का भोग लगाने का... 

हमारे पतिदेव की प्यारी दीदी, मुंबई में रहती हैं, एक बार जब मुंबई जाना हुआ, तो बिटिया रानी को उनकी बुआ जी ने, मोदक बनाने का सांचा दे दिया।

बस उसके बाद से बप्पा के लिए, बनने वाले टेढ़े-मेढ़े मोदक, सांचे में ढल कर सुडौल और सटीक बनने लगे। 

उससे लगा कि, बप्पा को भी, हमारा उनका आगमन कराना बहुत अच्छा लगा, तभी तो मोदक के सांचे को हमारे पास पहुंचा दिया।

सिलसिला यूं ही चलता रहा, गणपति बप्पा के आगमन पर हम हर साल कुछ अलग तरह के मोदक बनाते और चतुर्दशी को जिसमें बप्पा का विसर्जन होता है, अर्थात वो फिर से अपनी माँ की गोद में पहुंच कर अठखेलियां करने लगते हैं।

उस दिन भी हम पूजा अर्चना करते।

पर इस बार, आंखों का treatment चल रहा है तो हमें लगा, मोदक बनाना शायद संभव न‌ हो पाए। एक दिन पहले, वैसे ही हरतालिका तीज़ के व्रत पूजन पाठ के लिए गुझिया बना चुके थे, हर बार की तरह..

पतिदेव बोले, इस साल मोदक वो लेते आएंगे...

हमने भी, बड़े अकड़ कर कहा, यह दिल्ली है, मुम्बई नहीं...

यहां दुनिया भर की मिठाई मिल सकती है, मोदक नहीं... अगर एक भी मोदक आप ले आएं तो उसे हम समझ लेंगे कि लोग बप्पा को यहां भी आमंत्रित करते हैं। 

शाम को office से घर लौटते समय, पतिदेव का phone आ गया, यहां 25 varieties के Modak मिल रहें हैं, कौन से वाले लाने हैं?

25....आय हाय! इतनी variety तो सिद्धी विनायक मंदिर में नहीं मिलते हैं, जितने कि यहां मिल रहें हैं... 

हमारे तो स्वर ही बदल गये, बड़े मधुर स्वर में हम ने पूछा, क्या varieties हैं, और भइया, पतिदेव तो शुरू हो गये, एक के बाद एक, मोदक की variety का नाम बताने में...

ओहो, ऐसा लग रहा था कि, किसी restaurant या hotel का menu बता रहे हैं। सच बता रहे हैं, किसी variety की मिठाई नहीं बची थी, जो मोदक न बन चुकी हो। वो भी बताते-बताते, हंसने लगे, कि यहां सारी मिठाइयां, मोदक बन चुकी हैं। तुम तो बस यह बताओ कि तुम्हें अपने गणपति बप्पा को किस taste की मिठाई के मोदक से प्रसन्न करना है?

आहा! गणपति बप्पा ने तो हमें ही पशोपेश में डाल दिया था, खैर variety थी, तो बप्पा जी को एक तरह के मोदक से क्यों प्रसन्न किया जाए...हमने चार varieties के मोदक मंगवा लिए।

गणपति बप्पा की popularity ने हमारी सारी अकड़ निकाल दी, उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मुम्बई हो या दिल्ली या कोई और शहर, गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक हर जगह, सिर्फ और सिर्फ गणपति बप्पा की ही धूम रहती है।

और popularity कि तो क्या ही कहें, super popularity है भाई...

बस इतना ही कह सकते हैं कि गणपति बप्पा, आप तो छा गए हैं ...

अपनी कृपा सदैव हम सब पर बनाए रखियेगा 🙏🏻🙏🏻


    गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या 🙏🏻😊

Saturday, 14 September 2024

Article : हिंदी के लिए महापुरुषों के कथन

आज हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में हिंदी के विषय मे कुछ महापुरुषों के द्वारा कहे हुए कथन साझा कर रहे हैं। 

देश‌ की आजादी के साथ ही, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया जाए, यह प्रस्ताव भी पारित किया गया था।

परन्तु इस प्रस्ताव के साथ ही यह भी हुआ कि कुछ राज्य, जो कि हिंदी भाषी नहीं थे, वो इसके लिए, किसी भी तरह से तैयार नहीं थे।

तो यह निर्धारित किया गया कि, हिंदी को फिलहाल राजभाषा में ही रखा जाए और कालान्तर में उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान कर दिया जाएगा। पर यह अंतहीन इंतज़ार ख़त्म ही नहीं हो रहा है, जिसके कारण आज तक भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। ऊपर से हमारे आधुनिक बनने की होड़, एक विदेशी भाषा, अंग्रेजी को वो दर्जा देती जा रही है।

बस हिंदी दिवस के अलावा और कोई दिन नहीं होता है, जब हिंदी को विशेष समझा जाए। 

जबकि हिंदी के लिए महापुरुषों के कथन, सिर-माथे वाले हैं, आइए उन्हें जाने, शायद उसके बाद आप के मन में भी हिंदी के लिए वो सम्मान जग जाए और हिंदी को न्याय मिल जाए और राष्ट्रभाषा होने का सम्मान भी...

हिंदी के लिए महापुरुष के कथन


हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।

~चन्द्रबली पाण्डेय


है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी॥

~मैथिलीशरण गुप्त


जिस भाषा में तुलसीदास जैसे कवि ने कविता की हो, वह अवश्य ही पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती।

~महात्मा गाँधी


हिंदी भारतवर्ष के हृदय-देश स्थित करोड़ों नर-नारियों के हृदय और मस्तिष्क को खुराक देने वाली भाषा है।

~हज़ारीप्रसाद द्विवेदी


हिंदी को गंगा नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा।

~विनोबा भावे


हिंदी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।

~सुभाष चन्द्र बोस


हिन्दी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है।

~सुमित्रानंदन पंत


आज पूरा विश्व हिंदी भाषा की शक्ति को पहचान रहा है।

~नरेंद्र मोदी


आप लोगों को लग रहा होगा कि भारत के इन महापुरुषों में मोदीजी का नाम कैसे आ गया। तो उस के लिए बस इतना ही कहना चाहेंगे, कि मोदीजी हमारे भारत देश के सफल और आदरणीय प्रधानमंत्री हैं, और वे हिन्दी और संस्कृत के विकास और उत्थान के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उन्होंने NEP syllabus के माध्यम से हिंदी और संस्कृत को CBSE board के विद्यालयों में compulsory language कर दिया है, जिससे सिर्फ इन भाषाओं का ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सम्पूर्ण देश का भी विकास हो रहा है।

क्योंकि जिस कूटनीति से अंग्रेजों ने education system के द्वारा हिन्दी, संस्कृत व भारतीय संस्कृति को destroy करना चाहा था, यह उसी का मुँहतोड़ जवाब है, और ऐसा करना अतिआवश्यक भी था।

धन्य हैं, यह सब महापुरुष और इनकी सोच....

आप भी इनकी तरह सोच रखें और हिंदी को विशेष सम्मान दें, उसका अधिकाधिक उपयोग करें, जिससे हिंदी को उसका सही स्थान मिल सके। और भारत को उसकी राष्ट्रभाषा...


जय हिन्दी, जय हिन्द 🇮🇳

Wednesday, 11 September 2024

Article : कुछ पल सनातन के

हमारे पतिदेव के जन्मदिवस में इस बार सोचा, उन्हें कुछ ऐसा birthday gift दिया जाए, जिससे वो अपना बचपन फिर से जी लें।

ऐसा gift, इसलिए सोचा, क्योंकि हर एक के लिए बचपन के पलों से मीठा और सुखद कुछ नहीं होता है।

हमने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के व महाकालेश्वर के दर्शन का program plan किया।

महाकाल जी से तो, आप सभी परिचित होंगे, पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से शायद कुछ लोग अनभिज्ञ हों।

कुछ पल सनातन के



1. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग :

भगवान शिव-शंभू के 12 ज्योतिर्लिंग हैं, उनमें से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भी एक है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग जाने का विचार, इसलिए आया, क्योंकि हमारे ससुर जी वहां के आश्रम से जुड़े हुए थे। और उस आश्रम में अक्सर परिवार के साथ जाया करते थे। उन्हीं गुरुदेव जी का एक आश्रम बाराबंकी में भी है।

हमारे पतिदेव शादी के दूसरे साल में ही हमें हमारे ददिहाल ले कर गए थे, वहीं पर हमारे परिवार द्वारा आस्था रखे जाने वाले चच्चा जी महाराज की समाधि भी है। चच्चा जी महाराज, हमारे परनाना, हमारे पूरे परिवार के गुरु, ईश्वर या यूं कहें कि सर्वत्र हैं, जिनके कारण हमारे पूरे खानदान का आस्तित्व है।

इनका हमें वहां लेकर जाना, हमारी सम्पूर्ण ज़िंदगी की सर्वश्रेष्ठ जगह है 🙏🏻

तो अब बारी हमारी थी, उसी तरह की आस्था वाली जगह, जिससे उनका परिवार जुड़ा है, उसे चुनने की...

और वो है ओंकारेश्वर 🙏🏻

जब ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जाएं और महाकालेश्वर के दर्शन ना करें, यह तो संभव ही नहीं था। तो वहां भी गये।

आज आप को ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन के विषय में बताते हैं, आगे महाकालेश्वर के विषय में बताएंगे।

जैसा कि धार्मिक स्थल पर बहुत अधिक भीड़ होती है, वही हमें वहां भी मिली।

बहुत भीड़ होने के बाद भी सब बहुत systematic था, सभी श्रद्धालु अपनी-अपनी जगह पर बिना धक्का-मुक्की किए बम-बम भोले, हर हर महादेव का स्वर नाद करते हुए आगे बढ़ रहे‌ थे, इससे भक्ति और जोश का ऐसा माहौल बना कि कब हम लोग ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के सामने पहुंच गए, ज्ञात ही नहीं हुआ। 

महादेव जी के बहुत अच्छे दर्शन हुए, उसके बाद हम लोग ममलेश्वर महादेव जी के मंदिर में गये।

ममलेश्वर महादेव 

वहां पर ओंकारेश्वर मंदिर के बनिस्पत काफ़ी कम भीड़ थी। वहां भी सब शिव मय था।

दोनों जगह दर्शन करके, ऐसा लगा, मानो जीवन में वो पा लिया, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। परम सुख, परम आनन्द...

भोले भंडारी का हर दर ऐसा ही होता है, जहां माथा टेका और सर्वत्र पा लिया..🙏🏻

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिग के दर्शन के लिए हम श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम में रुके थे। क्योंकि पापा जी (हमारे ससुर जी) ओंकारेश्वर में आने पर सदैव यहीं रुका करते थे।

2. आश्रम की व्यवस्था :

हम लोग दिल्ली से by train खंडवा तक, वहां से by Cab से श्री मार्कण्डेय आश्रम  पहुंचे थे। दिल्ली से ओंकारेश्वर तक की कोई सीधी train नहीं है...

श्री मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, ओंकारेश्वर में पहुंच कर पता चला कि भक्तों के रहने की व्यवस्था ऊपर के कमरों में थी और संतों के रुकने की व्यवस्था नीचे के एक बड़े से कमरे में थी।

कमरे में पहुंच कर देखा कि एक पलंग था, जिसमें सिर्फ एक व्यक्ति ही सो सकता था, उसके अलावा बाकी तीन गद्दे, चादर, तकिया इत्यादि सब था।

कमरे में सुविधा के नाम पर बस एक tube light और एक fan था। Attached bathroom भी था। सब कुछ बेहद साफ-सुथरा...

मतलब no AC, no TV, साथ ही signals भी weak, तो mobile भी लगभग किसी काम का नहीं था, means entertainment का कोई साधन नहीं था।

वह आश्रम बिल्कुल नर्मदा नदी के किनारे बसा हुआ था। नर्मदा नदी की कल-कल की ध्वनि अलग ही तरह के सुख का एहसास दे रही थी। उसके साथ ही नदी के दूसरे छोर पर ओंकार पर्वत था। बेहद हरियाली से आच्छादित और शंकराचार्य जी की विशाल मूर्ति, जिससे कमरे से बाहर देखने पर अद्भुत दृश्य दिखाई देता था।

मतलब सर्वश्रेष्ठ जीवनयापन का सब साधन, उस आश्रम में मौजूद था। और उसको सम्पूर्णता दे रहा था, उस आश्रम का माहौल और शिव शंभू मय वातावरण.. 

जिसका एहसास आपको सम्पूर्ण article पढ़कर होगा...


3. आश्रम के समयबद्ध नियम :

आश्रम था, तो नियम भी थे और वो भी एकदम पक्के, मतलब जो जिस समय होना है, वो उसी समय ही होगा। वहां समय और नियम का पाबंद होना ज़रूरी था।

सुबह 5:30 बजे शिव शंभू जी की सुबह की वंदना-आरती होती थी।

6:00 से 6:30 बजे तक नाश्ता वितरण किया जाता था। उसके बाद आपको जो भी साधना, योग इत्यादि करना हो, वो कर सकते हैं। या ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जाना हो तो, जा सकते थे।

11 बजे से भोजन वितरण हो जाता था। तत्पश्चात सभी विश्राम या अन्य कार्यकलापों को कर सकते हैं।

संध्या समय 7 बजे से शिव जी की आरती, संध्या, पूजा-अर्चना, शिव महिम्न स्तोत्र पाठ, सत्संग इत्यादि होता है, जो कि 8:30 बजे तक होता है। उसके बाद रात्रि भोजन वितरण किया जाता है।


4. महादेव की अराधना :

आश्रम में भी शिव जी का विशाल मंदिर था।महादेव जी की हर पूजा-अर्चना, खूब बड़े-बड़े घंटे-घड़ियाल, ढोल, नगाड़े, शंखनाद के साथ होती है, साथ ही सभी मंत्र और आरती इत्यादि भी तेज स्वर में होती है।

आप आश्रम के किसी भी कोने में हों, किसी भी कमरे में हों, आपकी आत्मा शिव स्तुति से पवित्र अवश्य हो रही थी।

एक अलग ही माहौल, सब बस शिव ही शिव मय.. उससे इतर कुछ भी नहीं...

मतलब आप हर पल सनातन को जी रहे हैं। नर्मदा नदी पर डुबकी लगाना, ईश्वरीयता के और करीब ले जा रहा था।


5. भोजन का सारांश (summary):

एक नियम और था, आपको नाश्ता व खाना खाने के बाद, अपने बर्तन स्वयं धोने होते थे।

नाश्ता, खाना पूर्णतः सात्विक था, पर बहुत स्वादिष्ट, साथ ही complete diet वाला, अर्थात, दाल, रोटी, सब्जी, चावल, सलाद, चटनी, अचार, मीठा सब कुछ। वो भी जो जितना खाना चाहें। 

वहां भोजन बनाने वाले और वितरण करने वाले सभी इस भाव में भोजन खिलाते थे, मानो सभी अतिथि, शिव भक्त हैं।

नियम यह भी था कि खाना खाते समय, मोबाइल नहीं लाना है, ना ही बात करनी है, भोजन जो कि प्रसाद है, उसे पूर्ण सम्मान दें, साथ ही प्रयास करें कि भोजन रूपी प्रसाद छोड़ा ना जाए। उतना ही लें थाली में कि व्यर्थ ना जाए नाली में 🙏🏻

हम लोगों ने उनसे श्रमदान की बात भी कही, पर उन्होंने साफ इंकार कर दिया, मानो कह रहें हों, अतिथि देवो भव:


6. आगे की योजना :

वहां entertainment के लिए आधुनिक युग का कुछ नहीं था, पर सच जानिए, उसकी आवश्यकता भी नहीं लग रही थी।

नियम कठोर थे, पर किसी पर भी थोपे नहीं जाते थे। 

हम लोग नाश्ता करने के पश्चात् ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने चले गए थे।


उसके बाद दोपहर के भोजन के समय हम लौट आए।

भादो मास चल रहा है तो, बीच-बीच में वर्षा तेज हो जाती, कभी झिसी पड़ती।

हमने सोचा लिया, अगले दिन माता अन्नपूर्णा और विकट हनुमान जी के दर्शन के बाद, (यह दोनों मंदिर आश्रम से बहुत नज़दीक थे)सारा समय आश्रम में रहकर, कुछ पल सनातन के बिताएंगे।


7. सनातन धर्म :

और सच बता रहे हैं, हमारे पतिदेव को तो आनंद आना ही था। बचपन के पलों को जो जी रहे थे। पर हमें और दोनों बच्चों को भी वहां विशेष आनन्द आ रहा था।

शायद उसका कारण था, सनातन सत्य है, कठोर भी है, पर वहां बाध्यता नहीं थी, स्वतंत्रता थी, स्वच्छंदता थी। 

उन पलों को जीने के लिए, शायद ज़िन्दगी के जितने भी पल मिले, कम ही हैं।

आप से सिर्फ इतना कहना कि अगर आप ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए जाएं, तो ऐसी जगह ही रुकिएगा, जहां पर नर्मदा नदी का तट रहे, क्योंकि मां नर्मदा के सानिध्य के बिना दर्शन अधूरे हैं और शिव शंभू की कृपा भी...


8. निशुल्क आश्रम / आवास :

हमें आश्रम में रुकने के लिए, कोई भी धन-राशि नहीं देनी थी। फिर भी हम लोग स्वेच्छा से धन राशि देकर आए। और आप सबसे भी अनुरोध है कि, अगर आप ऐसे स्थान पर जा रहे हैं, जहां धन-राशि नहीं देनी है…

तो अपने सामर्थ्य के अनुरूप धन राशि अवश्य दें, जिससे आश्रम की सभी गतिविधियां, सुचारू रूप से चल सके।

वहां उपस्थित ओंकार पर्वत की परिक्रमा भी की जाती है, पर समय के आभाव के कारण, हम वो नहीं कर सके।

मन तो इतना अधिक प्रसन्न था, कि वहां से ना जाएं, ऐसा ही लग रहा था।

पर ऐसा संभव नहीं था, अगले दिन हम अपने गंतव्य के लिए, मतलब महाकाल जी के दर्शन के लिए निकल गये...

वो पल भी सुखद थे, आपको उनके विषय में भी बताएंगे...


हर हर महादेव...

जय ओंकारेश्वर महाराज...

जय ममलेश्वर महादेव...

जय जय महाकाल...