Wednesday, 4 March 2020

Stories of Life : स्नेह भवन (भाग -3)

स्नेह भवन (भाग -1) और
स्नेह भवन (भाग -2) के आगे ...

स्नेह भवन (भाग -3)

“वो इस घर की पुरानी मालकिन हैं।”

“क्या? मगर ये घर तो हमने मिस्टर शांतनु से ख़रीदा है।”

“ये लाचार बेबस बुढ़िया उसी शांतनु की अभागी माँ है, जिसने पहले धोखे से सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर ये घर हमें बेचकर विदेश चला गया, अपनी बूढ़ी मां स्नेहा जी को एक वृद्धाश्रम में छोड़कर......

छी!… कितना कमीना इंसान है, देखने में तो बड़ा शरीफ़ लग रहा था।”

ऋषि  का चेहरा वितृष्णा से भर उठा. वहीं नीरजा  याद्दाश्त पर ज़ोर डाल रही थी।

“हां, याद आया. store room  की सफ़ाई करते हुए इस घर की पुरानी नेमप्लेट दिखी थी।उस पर ‘स्नेह भवन’ लिखा था, वहीं एक राजसी ठाठ-बाटवाली महिला की एक पुरानी फ़ोटो भी थी।
उसका चेहरा ही इस बुढ़िया से मिलता था, तभी मुझे लगा था कि इसे कहीं देखा है।

मगर अब यह यहां क्यों आती हैं?


क्या घर वापस लेने? पर हमने तो इसे पूरी क़ीमत देकर ख़रीदा है।” नीरजा  चिंतित हो उठी।

“नहीं, नहीं. आज इनके पति की पहली बरसी है। ये  उस कमरे में दीया जलाकर प्रार्थना करना चाहती हैं, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी।”

ये क्या बात हुई ? “इससे क्या होगा, मुझे तो इन बातों में कोई विश्वास नहीं.” नीरजा तुनक कर बोली।

“तुम्हें न सही, उन्हें तो है और अगर हमारी हां से उन्हें थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाती है, तो हमारा क्या घट जाएगा?” ऋषि शांत स्वर में बोला।

“ठीक है, आप उन्हें बुला लीजिए।” अनमने मन से ही सही, मगर नीरजा  ने हां कर दी।

स्नेहा जी आ गईं. क्षीण काया, तन पर पुरानी सूती धोती, बड़ी-बड़ी आंखों के कोरों में कुछ जमे, कुछ पिघले से आंसू. अंदर आकर उन्होंने ऋषि और नीरज  को ढेरों आशीर्वाद दिए।

नज़रें भर-भरकर उस पराये घर को देख रही थीं, जो कभी उनका अपना था। आंखों में कितनी स्मृतियां, कितने सुख और कितने ही दुख एक साथ तैर आए थे।

वो ऊपरवाले कमरे में गईं, कुछ देर आंखें बंद कर बैठी रहीं। बंद आंखें लगातार रिस रही थीं।

फिर उन्होंने दीया जलाया, प्रार्थना की और फिर वापस से दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगीं, “मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी।सोचा था, अर्थी पर ही जाऊंगी, मगर…” स्वर भर्रा आया था।

“यही कमरा था मेरा। कितने साल हंसी-ख़ुशी बिताए हैं यहां अपनों के साथ, मगर शांतनु के पिता के जाते ही…” आंखें पुनः भर आईं।

ऋषि और नीरजा  नि:शब्द बैठे रहे. थोड़ी देर घर से जुड़ी बातें कर स्नेहा जी भारी क़दमों से उठीं और चलने लगीं।

पैर जैसे इस घर की चौखट छोड़ने को तैयार ही न थे, पर जाना तो था ही।
उनकी इस हालत को वो दोनों भी महसूस कर रहे थे।

एकदम से जाने क्या सोचकर नीरजा की आँखों में एक चमक सी आ गयी“आप ज़रा बैठिए, मैं अभी आती हूं.” , वो  स्नेहा जी  को रोककर कमरे से बाहर चली गई और इशारे से ऋषि  को भी बाहर बुलाकर कहने लगी......

आगे पढें  स्नेह भवन(भाग -4) में......

Tuesday, 3 March 2020

Stories of Life : स्नेह भवन (भाग -2)

स्नेह भवन(भाग -1) के आगे ...


स्नेह भवन (भाग -2)

दो दिन बाद ऋषि  tour  से वापस आया, तो नीरजा ने उस बुढ़िया के बारे में बताया. ऋषि को भी कुछ चिंता हुई, “ठीक है, अगली बार कुछ ऐसा हो, तो guard  को बोलना वो उसका ध्यान रखेगा, वरना फिर देखते हैं, पुलिस complain  कर सकते हैं.” कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए.

नीरजा  का घर को दोबारा ढर्रे पर लाकर नौकरी करने का संघर्ष  जारी था, पर इससे बाहर आने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी।

एक दिन सुबह नीरजा  ने छत  से देखा, guard  उस बुढ़िया के साथ उनके main- gate पर आया हुआ था. ऋषि  उससे कुछ बात कर रहा था।

पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी-सी लग रही थी।

नीरजा  को लगा उसने यह चेहरा कहीं और भी देखा है, मगर कुछ याद नहीं आ रहा था।

बात करके ऋषि  घर के अंदर आ गया और वह बुढ़िया main-gate  पर ही खड़ी रही।

“अरे, ये तो वही बुढ़िया है, जिसके बारे में मैंने  तुम को बताया था. ये यहां क्यों आई है?” नीरजा  ने चिंतित स्वर में ऋषि  से पूछा?

“बताऊंगा तो आश्चर्यचकित रह जाओगी. जैसा तुम उसके बारे में सोच रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है. जानती हो वो कौन है?”

नीरजा  का विस्मित चेहरा आगे की बात सुनने को बेक़रार था.......

आगे पढें, स्नेह भवन (भाग -3) में ....

Monday, 2 March 2020

Stories of Life : स्नेह भवन

स्नेह भवन

बच्चे और पति दोनों को उनके school  और office भेजने के बाद नीरजा कपड़े उठाने छत पर आई, उसने कुछ कपड़े अभी तार से उतारे ही थे  कि उसकी  नज़रें थोड़ी दूर एक पेड़ की ओट में खड़ी बुढ़िया पर ठहर गईं।

ओह! फिर वही बुढ़िया, क्यों इस तरह से  मेरे घर की ओर ताकती है?’


यह कौन है? और मेरे घर को ऐसे क्यों देखती रहती  है? मन में शंकाएं पनपने लगीं. इससे पहले भी नीरजा  उस बुढ़िया को तीन-चार बार notice  कर चुकी थी.

इस घर में shift हुए उन्हें साल भर भी नहीं हुआ था, इससे पहले  वो गाज़ियाबाद में रहते थे, साथ में सासू माँ भी थीं। नीरजा की नौकरी बहुत अच्छी चल रही थी, उसे बच्चों की चिंता नहीं थी। बच्चे दिन भर दादी के साथ जो रहा करते थे। 

नीरजा की माँ तो पहले ही नहीं थीं, पर जब से माँ जी स्वर्गलोक चली  गईं, पूरे परिवार से बड़े बुजुर्गों का साया ही चला गया। 

उनके जाने से वो घर, पूरे परिवार को बहुत दुखी करता था, सबका अपने काम में मन लगना बंद हो गया था। एक दिन ऋषि ने नीरजा से कहा, मुझे दिल्ली में अच्छी job मिल रही है, माँ के जाने से यह घर तो अब वैसे भी रास नहीं आता। अगर तुम्हें ठीक लगे तो हम दिल्ली में घर ले लें?

जैसा तुम को ठीक लगे, नीरजा बोली। 

मैंने वहाँ के school में भी छोटू, मिनी के admission की  बात कर ली है।  बस एक ही problem है, तुम्हारे लिए manage करना difficult होगा, क्योंकि तुम्हारा office दूर पड़ेगा। 

तुम उसकी चिंता मत करो, मैं उसे छोड़ रही हूँ। 

क्यों ?

अब जब बच्चों की दादी नहीं हैं, तो इन्हें कौन देखेगा, बहुत difficulty होती है। 

पर वो job तुम्हें बड़ी मेहनत के बाद मिली है। 

कर क्या सकते हैं? मैंने भी मन पर पत्थर रखकर, ये बात बोली है ,  दुख से भरी नीरजा बोली। 

कुछ दिनों में ही वो दिल्ली आ गए ।  इस job में ऋषि official tour में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गया।  छोटू और मिनी का admission भी हो गया , नए school में  वो दोनों भी धीरे धीरे adjust हो रहे थे। लेकिन नीरजा, आए दिन अपनी नौकरी को miss  करती थी,  बरसों की मेहनत को यूं छोड़ देना आसान नहीं होता। 

फिर भी वो adjust करने की कोशिश कर रही थी। 

पर रोज़, रोज़ इस अनजानी ,विचित्र बुढ़िया का दिखना, कहीं ना कहीं नीरजा को डराने भी लगा,  कहीं छुपकर घर की टोह तो नहीं ले रही? वैसे भी इस इलाके में चोरी और फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण कोई नई बात नहीं है. सोचते-सोचते नीरजा  परेशान हो उठी.......

आगे पढ़ें, स्नेह भवन(भाग- 2) में