Friday, 17 March 2023

Story of Life : मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-5)

 मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-1) 

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2) 

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3)

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-4) के आगे...


मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-5) 



बहू को बुला लूं? वो भी कहां जाना चाहती थी...  फिर मन बदल लिया, अगर बेटे-बहू को पता चलेगा तो बहू वापस आ जाएगी, फिर उनके वैवाहिक जीवन का क्या होगा...

रैना, संयम के साथ दिल्ली पहुंच गई । घर पहुंच कर सामान set करने में उसने सबसे पहले मंदिर स्थापित किया। फिर सारे सामान set किए।

अगली सुबह, रैना चार बजे ही नहा-धोकर पूजा अर्चना करने लगी। घंटी की आवाज से संयम की नींद खुल गई।

अरे रैना, रात से ही तुमने क्या शुरू कर दिया?

रात कहां, चार बज गए हैं, पूजा अर्चना का समय हो गया है। संयम बोला, क्या हो गया है तुम्हें ?

कुछ नहीं, और यह कहकर वो पूजा पाठ में मग्न हो गई।

अब तो जो त्यौहार आता रैना, मां से पूछकर, सब कुछ बहुत विधि-विधान से करती। 

संयम, रैना से बोलता भी, मां कौन सा यहां हैं जो तुम इतना टिटींबा पाल लेती हो...

रैना हर बार, बस एक बात ही बोलती, मुझे मां ने अपने विश्वास पर दिल्ली भेजा है, तो मैं उसे कैसे तोड़ सकती हूं? तुमने मुझे से पहली रात को ही कहा था कि मां का बहुत मान है और वो मेरे कारण कम नहीं होना चाहिए... 

तब से वो बात, मेरे लिए हर बात से पहले रहती है...

संयम बोलता तो जरूर था, पर रैना का घर के रिति-रिवाजों को मानते रहना, कहीं ना कहीं उसे अच्छा बहुत लगता था। 

इधर रैना अपनी सास पर और गायत्री जी अपनी बहू पर जान छिड़कती थीं।

जब भी वो लोग घर पहुंचते, उनके स्वागत के लिए बहुत लोग हमेशा घर पर मौजूद होते थे। क्योंकि मां 15 दिन पहले से ही सबको बताने लगती थी कि उनका बेटा-बहू घर आ रहे हैं। वो 15 दिन पहले से ही बेटा-बहू के आने की तैयारी में जुट जातीं। 

घर में जब भी रैना और संयम पहुंचते हमेशा VIP वाली feelings आती। मां के हाथों से बने ढेरों पकवान खाने के बाद तो उनका लौटने का मन ही नहीं करता, पर आना भी जरूरी था संयम के लिए। 

कुछ दिनों बाद, रैना मां बनने वाली थी। रैना ने कहा कि मैं घर जाऊंगी, संयम ने उसके मायके का टिकट करा दिया। रैना ने कहा नहीं, मैं मां के पास रहूंगी, अभी बच्चे के लिए उनसे अच्छा कोई नहीं।

गायत्री जी ने बड़े लग्न से रैना के वो चालीस दिन पूरे किए। उसे एक कदम नीचे नहीं रखने दिया। रैना के खान-पान से लेकर बच्चे और रैना के हर तरह के काम और देखभाल की। सभी काम पूरे नियम कानून से ही किए।

दूसरे बच्चे के समय, रैना घर नहीं जा पाई तो, गायत्री जी सारे तामझाम के साथ उन लोगों के पास पहुंच गईं और सभी काम पूरे नियम कानून से ही किए। किसी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी।

उनके जाने के बाद कुछ दिन के लिए, रैना की मम्मी आईं।

उन्होंने रैना से कहा कि, बेटा दूसरे बच्चे के समय मुझे बुला लेती...

रैना ने कहा, मां मैं आज आपको एक बात बताती हूं, मेरी सुहागरात में जब संयम ने कहा कि मुझे सुबह चार बजे उठना है, मुझे तुम पर और पापा पर बहुत क्रोध आया था कि मेरी शादी कैसी जगह कर दी, इतनी पूजा पाठ भी किसलिए? और ऊपर से यह कहकर भेज दिया कि वहीं के रंग में रंग जाना।

पर मैं धीरे धीरे इस घर में रमती गई‌ और साथ ही जानती गई कि मेरी सास कितनी अच्छी हैं। मां मैं कब उन जैसी बन गई, मुझे पता ही नहीं चला। 

अपने ससुराल में हमारा हमेशा भव्य स्वागत होता है, वो नहीं होती तो कैसे होता? कैसे 15 दिन पहले से हमारे आने की सबको ख़बर होती? कैसे हम मां के हाथों के इतने पकवान खाते।

मां, मुझे पता ही नहीं चला, कब मेरी सास ही मेरी सांस बन गईं, मुझे उनके बिना अपनी जिंदगी ही संभव नहीं लगती है।

मां इसके लिए आप और पापा का भी thank you...

क्योंकि आप ने रमने को ना कहा होता तो, अपने घर से बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों में, मैं शायद ढल नहीं पाती...

बेटी, हम जहां भी रहें, अगर वहां कि परिस्थितियों में ढल गए, तभी जीवन सुखद लगता है। और जब बात दो लोगों के बीच के सामंजस्य की हो तो, कोशिश दोनों तरफ से होने से ही संबंधों में प्रगाढ़ता आती है,  प्रेम बढ़ता है।

मुझे गर्व है कि मेरी बेटी सुख दे भी रही है और पा भी रही है...


आज की कहानी, पुराने जमाने की नहीं बल्कि आज के ही परिवेश की है, यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं,वास्तविक कहानी है। यह कहानी एक सफल सास-बहू के ताने-बाने की कहानी है जो एक दूसरे के पूरक बन गये... 

उन दोनों को ही मेरा प्रणाम 🙏🏻

Thursday, 16 March 2023

Story of Life: मेरी सास ही मेरी सांस (भाग- 4)

 मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-1) 

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2) 

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3)


मेरी सास ही मेरी सांस (भाग- 4)


मां बोली, अकेले जाएगा कि बहू को भी ले जाएगा?

पर रैना तो आपके पास..

मेरे लिए शादी की थी, भोलेनाथ? 

चल मैं ही बोल देती हूं रैना को... 

रैना बेटा, जल्दी से तैयारी कर लें, संयम के साथ तुम भी दिल्ली जा रही हो।

दिल्ली... पर मैं तो आपके साथ रहूंगी...

मेरे तो बेटा-बहू दोनों ही भोलेभंडारी हैं। शादी हुई है तुम दोनों की एक दूसरे के लिए, ना कि मां-पापा के लिए...

अच्छा मां, कहकर रैना अपने कपड़े pack करने लगी।

अरे यह क्या बांवरी, तुम्हरा पति गांव देहात में नौकरी नहीं करता है जो साड़ी पर साड़ी रखती जा रही है। 

कुछ अच्छी साड़ी और कुछ सूट रख लो, और हां संयम बहू को कुछ ढ़ंग की jeans and western dress भी दिला देना। 

रैना बड़े आश्चर्य से अपनी सास को देख रही थी, कितनी खुली सोच की हैं मां...

अरे ऐसे क्या देख रही हो, तुम दिल्ली में जो चाहे पहनो, मुझे कोई ऐतराज नहीं है, बस ध्यान रखना कि dress ऐसी हो, जो कि मर्यादा में हो।

और एक बात याद रखना,  यहां जब भी आओगी, साड़ी ही पहननी है। 

जी मां, हमेशा याद रखूंगी...

घर में सब गायत्री जी से बहुत डरते हैं, पर रैना ने सारे डर को भूलाकर गायत्री जी के गले लगा गई। मां ने भी बहू को बहुत सारा प्यार किया। 

संयम बड़े अचरज से मां को देख रहा था, कोई मां के गले से भी लग सकता है। मैंने यह हिम्मत कभी क्यों नहीं की...

थोड़ी देर बाद मां बोली, अब छोड़ मुझे, वरना यहीं रुकना होगा। रैना ने झट छोड़ दिया, सभी जोर जोर से हंसने लगे।

रैना संयम के साथ दिल्ली चली गई। उन लोगों के जाने के बाद गायत्री जी अपने कार्यों में यथावत लग गई पर संयम और रैना के जाने से उन्हें बहुत खाली खालीपन महसूस हो रहा था।

वो सोचने लगी कि बेटा तो हर बार जाता था पर कभी ऐसा नहीं लगा, फिर इस बार क्यों?

बहू को बुला लूं? वो भी कहां जाना चाहती थी... 

आगे पढ़े...मेरी सास ही मेरी सांस (भाग- 5) अंतिम भाग में..

..

Wednesday, 15 March 2023

Story of Life: मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3)

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-1) 

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-2)

मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-3) 


अपने मायके में सबसे देर से उठने वाली रैना, आज उठकर, नहा-धोकर तैयार थी। 

शायद सबने उसकी सास का जो खाका खींचा था, उसी का असर था। 

संयम के साथ रैना भी पूजा के लिए मंदिर में आ गई थी और आते से ही सबके चरणस्पर्श करने लगी।

ठहर जाओ बहू, हमारे घर में सबसे पहले ठाकुर जी के चरणस्पर्श करते हैं, उनकी पूजा अर्चना करते हैं, उसके बाद ही किसी और के पैर छूते हैं। 

जब भजन कीर्तन शुरू हुआ तो रैना से भी भजन गाने को कहा गया, तो उस ने कान्हा जी का एक बहुत ही सुरीला भजन गाया।

सब वो भजन सुनकर मंत्र मुग्ध हो गये।

बहू को सुबह सुबह मंदिर में देखकर और भजन सुनकर, सब गायत्री जी से बोली रहे थे। मान गए जिज्जी, आपको बहुत ही संस्कार वाली बहू मिली है।

गायत्री जी, बड़े गर्व और प्यार से रैना की तरफ देख थी।

आज पहली रसोई भी थी, पर रैना को कुछ समझ नहीं आ रहा था, ऊपर से नींद के झोंके आ रहे थे, सो अलग।

अभी वो सोच ही रही थी कि क्या बनाए, तब तक गायत्री जी अंदर आ गई थी।

वो बोलीं, बिटिया हमने बहुत सारी चीजों की तैयारी कर दी है, तुम बस झटपट सब गर्म करके अच्छे से लगा दो। 

मीठा तो तुम्हें ही बनना होगा, पर हां सूजी भी भूनी रखी है, उसमें चीनी भी मिली रखी है, तुम उसे खूब सारे घी और मेवे के साथ तैयार कर लो।

हम जा रहे हैं, नहीं तो सबको लगेगा हम ही सब कर रहे थे।तुम सब लाकर dinning table सजा देना...

यह कहकर गायत्री जी चलीं गईं पर रैना के लिए सब आसान कर गईं।

कुछ देर में ही रैना ने सारी dinning table सजा दी। सबने जब नाश्ता खाया तो हर तरफ से वाह-वाह के स्वर सुनाई दे रहे थे। 

अरे भाई संयम, तुम्हारी पत्नी ने तो पहले ही दिन में मैदान जीत लिया।

सच भाभी, बड़े गुणों वाली बहू ढूंढी है आपने संयम के लिए।

रैना को झोली भर भर कर आशीर्वाद और नेग मिल रहे थे। 

आज रैना को जो भी तारीफ मिल रही थी, उसमें गायत्री जी का भी हाथ था। पर उन्होंने वो किसी को नहीं बताया...

एक से दो दिन में सारे मेहमान चले गए। पर सुबह चार बजे उठने का नियम नहीं बदला...

पर बस सुबह उठकर नहा-धोकर पूजा अर्चना ही करना होता था, बाकी के काम तो सुघड़ गायत्री जी इतनी जल्दी निपटा देती थीं कि जब तक कोई सोचे कि क्या काम करना है, काम ख़त्म हो चुका होता था। 

घर के काम निपटने के चंद घंटे बाद से ही लोगों का तांता लगने लगता था, कोई मुहूर्त पूछने आता, कोई पूजा पाठ के नियम कानून... 

आस-पास कहीं भी कोई भी पूजा पाठ व्रत त्यौहार होते और मां के नाम की गुहार लग जाती। 

मां नियम कानून में रची-बसी ही दिखती। रैना समझ गई थी कि उसकी सास का कितना मान है, साथ ही कि बस नियम कानून पर विशेष ध्यान देना है और जीवन सुखद रुप से कट जाएगा।

एक हफ्ते में रैना को सुबह उठने से परेशानी होना बंद हो गई थी बल्कि अब तो उसे सुबह उठने के फायदे नज़र आने लगे थे। 

उसको बचपन से ही सिर दर्द की परेशानी थी, जो अब जल्दी उठने के कारण ठीक हो गई थी।

संयम को वापस दिल्ली लौटना था, उसने मां से कहा कि, मुझे जाना होगा।

मां बोली, अकेले जाएगा कि बहू को भी ले जाएगा? 

आगे पढ़े मेरी सास ही मेरी सांस (भाग-4) में....