Friday, 16 February 2024

Story of Life: निर्लज्ज (भाग -3)

 निर्लज्ज (भाग-1)  और 

निर्लज्ज (भाग - 2) के आगे... 

निर्लज्ज (भाग - 3) 

कठिन से कठिन परिस्थितियों को मुंह तोड़ कर जवाब देने वाली तृषा भी, यह सुनकर अंदर तक बुरी तरह से हिल गई। पति का असमय जाना तो उसने बर्दाश्त कर लिया था, पर कार्तिक! नहीं भगवान इतना निर्दयी नहीं हो सकता.. इसकी कल्पना से ही उसके दिमाग की नसें फटी जा रही थीं... 

जब सब संयत हुए तो यह सोचा जाने लगा कि क्या किया जाए, क्योंकि एक तो तबीयत ख़राब होने के कारण कार्तिक सुचारू रूप से नौकरी नहीं कर सकता था, दूसरा दवाइयों और इलाज़ के लिए भी बहुत पैसा चाहिए था। 

तृषा बोली कि मैं सोच रही हूं, फिर से अचार पापड़ का business शुरू करते हैं ,उससे कुछ पैसे मिलेंगे तो सब संभालना आसान होगा। 

तृषा की बात से पहली बार श्वेता भी सहमत थी। उसने अचार पापड़ बनाने और बेचने में तृषा की मदद करनी शुरू कर दी। 

तृषा के हाथ में बहुत स्वाद था और पहले वाले customer तो चाहते ही थे कि तृषा फिर से अचार पापड़ बनाने लगे, तो उन लोगों का Business जल्दी ही ठीक-ठाक चलने लगा। 

उससे घर का खर्च तो निकलने लगा, पर इलाज और दवाइयों के लिए हाथ अभी भी tight चल रहा था।

कुछ हफ्ते ही बीते थे कि तृषा की तबीयत भी खराब रहने लगी, जब देखो तब उसे उल्टियां होने लगे, चक्कर आने लगे। खाने की इच्छा भी बहुत बार नहीं करता।

शुरू-शुरू में तो कुछ नहीं, पर कुछ दिन बाद श्वेता की मौसी लता कुछ दिन के लिए रहने आयी। 

वो बहुत प्रपंची और नाटक बाज थी, उन्हें भांपते देर नहीं लगी कि तृषा pregnant है।

जैसे ही उन्होंने यह बात, श्वेता को बताई, तो उसने हंगामा मचा दिया। 

उस दिन कार्तिक घर पर नहीं था, तो बस श्वेता ने मौके का फ़ायदा उठाया और लगी, अपनी सास को बुरा भला कहने।

कैसी निर्लज्ज स्त्री हैं आप? जिस उम्र में लोग पूजा पाठ करते हैं, आप उस उम्र में बच्चा पैदा करना चाह रही है। अपनी तो कोई इज्जत है नहीं और हमारी मट्टी में मिलाएं पड़ी हैं। 

आने दीजिए, कार्तिक को सब बताती हूं, क्या क्या गुल खिला रही हैं आप...

आगे पढ़े निर्लज्ज (भाग -  4) में ..

Thursday, 15 February 2024

Story of Life : निर्लज्ज (भाग -2)

निर्लज्ज (भाग-1) के आगे...

निर्लज्ज (भाग - 2)


जब वो लोग उठकर जाने लगे तो श्वेता के पिता ने, तृषा के पैर पकड़ लिए कि ऐसे ना जाएं, मेरी नौकरी का आखिरी महीना चल रहा है, फिर retirement हो जाएगा, तब रिश्ता होना और कठिन हो जाएगा। 

हमें आप और आपका बेटा दोनों बहुत पसंद आए हैं, आप से बेहतर, हमारी बेटी को दूसरा रिश्ता नहीं मिल सकता...

तृषा बहुत ही कोमल और सरल हृदय की थी, उसे श्वेता के पिता का यूं कहना, मन में कहीं कचोट गया और वो हां कर के आ गई।

कार्तिक ने घर आकर कहा, मां आपने हां क्यों कह दिया। 

तृषा बोली, बेटा उनसे ना कह कर आना, एक पिता के दिल को बहुत दुःखी कर देता। तुम परेशान मत हो, जब श्वेता हमारे घर में आएगी तो तुम्हारा प्यार पाकर हमारे घर में ढल जाएगी।

तृषा ने दान-दहेज के लिए साफ़ मना कर दिया। शादी के लिए ख़र्चा भी बराबर बांटने को बोल दिया, साथ ही बहुत कम बाराती लेकर गई। 

इन सब कारणों से श्वेता की शादी इतनी अच्छी और धूम से हुई कि, जिसकी कल्पना ना तो श्वेता ने की थी और ना ही उसके घर में किसी ने...

श्वेता के पिता ने तो इसके लिए तृषा का ना जाने कितनी बार आभार व्यक्त किया...

श्वेता ससुराल आ गई और चंद ही दिनों में उसने अपने तेज स्वभाव को दर्शाना प्रारंभ कर दिया। 

वो job करती थी तो उसने कहा दिया कि वो working है तो घर का कुछ भी काम नहीं करेगी। कार्तिक को यह बिल्कुल मंजूर नहीं था कि मां अकेले काम में लगी रहें।

पर तृषा ने ही कहा कि घर में कलह नहीं होनी चाहिए, घर का काम ही कितना होता है, वो अकेले संभाल लेंगी। वैसे भी अभी श्वेता के सुख वाले दिन हैं।

अब कार्तिक क्या ही बोलता? पर इस बात से श्वेता को ऐसी जीत मिली थी कि अब तो वो अपनी हर मनमानी मनवाने लगी। 

और कुछ दिनों बाद, तो उसने नौकरी भी छोड़ दी, कहने लगी मैंने शादी, जिंदगी भर नौकरी करने के लिए नहीं की थी और खर्चे... वो तो इतने अनाप-शनाप करती थी कि कार्तिक को अकेले के दम पर घर चलाना मुश्किल लगने लगा था।

उसके ऊपर कर्ज़ा बढ़ने लगा, tension और श्वेता की मनमानी से वो बहुत दुःखी रहने लगा और फिर उसको और तोड़ने के लिए, उसे कैंसर हो गया।

जब उसने घर आकर मां और श्वेता को बताया, तो नकचढ़ी श्वेता सकपका गई, उसने कभी नहीं सोचा था कि उसके सपने यूं चकनाचूर होंगे।

और कठिन से कठिन परिस्थितियों को मुंह तोड़ कर जवाब देने वाली तृषा भी, यह सुनकर अंदर तक बुरी तरह से हिल गई। पति का असमय जाना तो उसने बर्दाश्त कर लिया था, पर कार्तिक! नहीं भगवान इतना निर्दई नहीं हो सकता.. इसकी कल्पना से ही उसके दिमाग की नसें फटी जा रही थी...

आगे पढ़े निर्लज्ज भाग -3 में....

Wednesday, 14 February 2024

Poem : एक पुष्प

 एक पुष्प 



लेकर चला पुष्प एक वो,

 प्रिया को ललचाने को। 

आज क्षण आया है वो,

नेह उस पर लुटाने को।


थोड़ा ठहर जा क्षणभर,

विचार कर ले तनिक भर।

क्या उससे पहले नहीं है,

कुछ फ़र्ज़ तेरे निभाने को।


पुष्प एक कर देना अर्पित,

विद्या ज्ञान की देवी को।

जिससे ज्ञान बुद्धि हो जाग्रत,

उचित मार्ग में जाने को।


पुष्प एक चढ़ा देना तुम,

पुलवामा के अमर शहीदों को।

जिसने प्राण निछावर कर दिए,

जीवन तुम्हें दिलाने को।


फिर कर लेना प्रेम की वर्षा,

प्रिया को अपनी रिझाने को। 

जिसने अर्पण किए दिन-रैन।

सर्वोपरि तुम्हें बनाने को।


आप सभी को बसंतोत्सव की हार्दिक

शुभकामनाएं 💐🙏🏻

माता सरस्वती की कृपा हम सब पर बनी रहे 🙏🏻🙏🏻 

पुलवामा के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि🙏🏻

Happy valentine's day 💞