Friday, 28 June 2024

Story of Life : एक सच्चाई (भाग-4)

एक सच्चाई (भाग-1) व

एक सच्चाई (भाग-2) व

एक सच्चाई (भाग-3) के आगे…

एक सच्चाई (भाग-4)

अब समझ आ रहा था, क्यों चलता है उनका इतना सिक्का…

वही तो बाबा…

पर आप इतना परेशान क्यों थे?

बेटा पिछले पच्चीस साल, चाहे मेरी posting इस गांव में रही हो या कहीं और, पर ठकराल जी से मेरा जुड़ाव कुछ ऐसा हो गया था कि उनकी खबर मुझे रहती ही थी। साल दर साल उनके उपकार के ही किस्से सुने थे।

पर साथ ही एक और बात, कि कोई बाहर का इन्सान, उनके गांव के लोगों का बाल भी बांका नहीं कर सकता था।

बल्कि यह कहो कि आसपास के गांव के मुखिया, सरपंच, धनाढ्य लोग उनके नाम से भी खौफ खाते थे और साथ ही उनकी ख्याति से खार भी खाते थे।

पर आज जो मैंने देखा कि उसे देखकर मैं सिहर भी गया और मेरा जी मानवता और इंसानियत से भी भर गया।

ऐसा भी क्या हुआ बाबा?

बेटा तुम्हें तो पता ही है यह मेरी last posting है और बहुत request के बाद मुझे यह गांव मिला है।

दरअसल मैं ठकराल जी के सानिध्य में रहकर कुछ धर्म-कर्म के काम करना चाहता था।

तुम बड़ी हो गई तो तुम्हारे भविष्य की चिंता नहीं रह गई है। आखिरकार, अपना business जमा चुकी हो। 

और तुम्हारी शादी का पैसा भी जोड़ कर रख दिया है। तो उस बात की भी चिंता नहीं है।

इसलिए मैं आते से ही ठकराल जी से मिलने पहुंच गया।

पर पिछले दो दिन से वो मुझे मिल नहीं रहें हैं, ना जाने कहां चले गए?

पर अभी आज ही एक call आई, जिसने मुझे हर्षित और अचंभित दोनों कर दिया।

क्या call आई थी बाबा?

वो आदमी बोल रहा था कि अगर आप को ठकराल जी से मिलना है तो पुरानी हवेली में आ जाना, पर अकेले आना और हाँ, ना तो कोई हथियार लाना, ना ही वर्दी में आना।


आगे पढें, एक सच्चाई (भाग-5) में…

Thursday, 27 June 2024

Story of Life : एक सच्चाई (भाग-3)

एक सच्चाई (भाग-1) व

एक सच्चाई (भाग-2) के आगे…

एक सच्चाई (भाग-3)

मुझे बिठाकर, नौकर ठकराल जी को बुलाने चला गया…

ठकराल जी ने आते ही कहा, और दारोगा बाबू, आ गए…

कैसा लगा अपना गांव?

अरे ओ हरिया… दारोगा बाबू की आवभगत की तैयारी शुरू करो, कोई कमी नहीं रहनी चाहिए…

आ गए? अपना गांव?

अरे काहे हैरान हो रहे हैं? आइए बैठिए, साथ में बतियाते हैं।

उसके बाद हम दोनों वहीं सोफे पर बैठ गए।

अरे दारोगा बाबू, ई हमारा गांव है, यहां परिंदा भी फड़फड़ाता है तो हमें पता चल जाता है, फिर आप तो ठहरे दारोगा बाबू, आपके आने की आहट हमें नहीं होगी तो क्या बगल वाले गांव के सरपंच को होगी, बुझाया?

दूसरा जब आप इस गांव के दारोगा बाबू हैं तो अब तो यह गांव आपहि का हुआ ना?

बोलिए बोलिए, सही कह रहे हैं ना?

यह कह कर उन्होंने जोर से ठहाका लगाया...

मैंने सोचते हुए उनके समर्थन में सिर हिला दिया।

उसके बाद उन्होंने मेरी जो आवभगत की, कि पूछो मत...

इतनी variety और इतना amount, कि समझ ही नहीं आ रहा था कि दो लोगों के लिए खाना बना है या पूरी बारात के लिए?

आखिरकार, मुझसे रहा नहीं गया, मैंने पूछ ही लिया, ठकराल जी, इतना खाना...

अरे, दारोगा बाबू, जब पकवान बनेंगे तो दो लोगों के लिए थोड़ी ना बनेंगे, घर में इतने नौकर-चाकर हैं, वो क्या मुंह देखेंगे, उनके परिवार के लिए भी खाना-पीना जाएगा।

फिर गांव के स्कूल में भी तो बच्चों को पकवान की खुशबू आ रही होगी, तो उन्हें सूखे थोड़ी छोड़ सकते हैं। 

भाई, हमारा तो यही है कि जब पकवानों की हंडिया चढ़ती है तो सब की ही दावत होती है।

क्या बात है! ठकराल जी...

इंसानों के लिए इतनी दया, और पशु-पक्षी के लिए दहशत...

अरे, नहीं-नहीं दारोगा बाबू, यह सब हमारे शौक नहीं है, यह तो बाप-दादा के ज़माने के हैं, हम तो शराब-कबाब को हाथ तक नहीं लगाते।

आप ने शायद ध्यान दिया हो, एक भी पकवान nonveg नहीं था, ना आपको शराब दी थी हमने…

जी, गया था मेरा ध्यान, यह उत्कंठा तभी तो थी।

यह हवेली तो पूर्वजों की विरासत है, तो उसमें फेरबदल करना, उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली बात होगी, बस इसलिए सब वैसा ही चल रहा है।

ठकराल जी, के लिए जो कुछ भी मैंने सोचा था, वो उससे बिल्कुल विपरीत निकले, लंबे-चौड़े, हट्टे-कट्टे तो वो थे, पर उतने ही सौम्य, हंसमुख, दयालु और प्रेमी…

एक अलग ही अपनत्व था उनमें, कौन सोचता है, सबके बारे में इतना?

अब समझ आ रहा था, क्यों चलता है उनका इतना सिक्का…

वही तो बाबा…

पर आप इतना परेशान क्यों थे?


आगे पढ़ें, एक सच्चाई (भाग-4) में।

Wednesday, 26 June 2024

Story of Life : एक सच्चाई (भाग-2)

एक सच्चाई (भाग-1) के आगे…

एक सच्चाई (भाग-2)

बहुत पहले, जब तुम इस दुनिया में भी नहीं आए थे…

मेरी नई-नई posting हुई थी। नया ही जोश था, पुलिस महकमे में आने का।

मेरी शुरू से इच्छा थी कि पहली posting किसी गांव में हो, क्योंकि गांव में सुधार करने के लिए बहुत कुछ होता है।

पर जब इस गांव में आए तो पता चला, यहां पर ठकराल जी का सिक्का चलता है।

हर कोई उनका ही नाम ले रहा था। कानून की व्यवस्था का तो जैसे यहां पर दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था।

ठकराल जी का वचन ही यहां का कानून था। उनकी इच्छा के बिना पत्ता नहीं हिलता था। 

पर बाबा, ठकराल जी तो…

हां, हां, आगे सुन…

सबके मुंह की कही-सुनी बातों के बाद इच्छा हुई, उनसे भी जाकर मिलें, जिनका सब इतना नाम ले रहे हैं।

साथ ही मन में यह भी ठान कर गया कि चलता होगा इनका शासन, पर अब नहीं। 

अब तो वही होगा, जो कानूनी रूप से सही है, आज तक मेरा जैसा दिलेर, जांबाज और इमानदार अफसर मिला नहीं होगा।

आज तो इन्हें सरकारी गर्मी दिखानी ही पड़ेगी।

बस इसी सोच के साथ मैं उनकी कोठी पर पहुंच गया।

वहां पहुंचा तो देखा सारा नज़ारा किसी film से कम नहीं था।

बहुत ही विशाल और खूबसूरत कोठी, कोठी के द्वार पर ही बड़े-बड़े पिंजरे और उनमें बेहद खूंखार कुत्ते… कुत्ते क्या, किसी भेड़िए से कम नहीं थे और उनकी गुर्राहट, आह! शेर से कम नहीं पड़ रही थी।

यूँ तो मैं बहुत बहादुर हूँ, फिर भी जानवरों का क्या भरोसा, मैंने हाथ में डंडा लिया और बहुत ही एहतियात के साथ घर में प्रवेश किया।

गजब की शान थी, अंदर भी…

दीवारों पर शिकार किए गए शेर और अन्य जानवरों की खाल लगी हुई थी।

मुझे बिठाकर, नौकर ठकराल जी को बुलाने चला गया…


आगे पढ़ें, एक सच्चाई (भाग-3)