Tuesday, 19 September 2023

Bhajan (Devotional Song) गणपति बप्पा आ रे आ रे

गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर आप सभी को Shades of Life की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं💐

गणपति जी का आगमन, होता है शुभ का आगमन , उत्सव का आगमन, खुशियों का आगमन....

गणेश जी के आगमन पर उनकी स्तुति करते हुए यह भजन साझा किया है, आइए इसका आनन्द लें....

गणपति बप्पा आ रे आ रे


 गणपति बप्पा आ रे आ रे,

तुझको हरदम दिल ये पुकारे।

आ रे, आ रे,  आ रे, आ रे...

गणपति बप्पा आ रे, आ रे,


गेंहू ज्वार का, आसन मैं बनाऊं।

लाल कपड़े से, उसे सजाऊं।

तेरे आने से,

खुशियाँ पधारे।


गणपति बप्पा आ रे आ रे,

तुझको हरदम, दिल ये पुकारे।

आ रे आ रे...


जल पंचामृत से, तुम्हें नहलाऊं।

अंग अंग पर, मैं हरषाऊं।

तेरे ही दर्शन के खातिर,

हमने कितने, दिन रात गुजारे।


गणपति बप्पा आ रे आ रे,

तुझको हरदम, दिल ये पुकारे।

आ रे, आ रे..


मोदक का मैं, भोग लगाऊं,

मोतीचूर का, लड्डू चढ़ाऊं.

तेरे आने से,

विध्न, दूर हों सारे।


गणपति बप्पा आ रे आ रे,

तुझको हरदम, दिल ये पुकारे।

आ रे आ रे...


धूप दीप नैवेद्य सजाऊं,

जन जन को दर्शन करवाऊं।

तुम्ही ही हो धरती के रक्षक,

तुम्ही कर्ता, धरता हमारे।


गणपति बप्पा आ रे आ रे,

तुझको हरदम, दिल ये पुकारे।

आ रे, आ रे..


हे विनायक, हे लम्बोदर,

हे गणेश, हे सर्वेश्वर।

कृपा दृष्टि तुम, हरदम रखना।

हम सदा से, भक्त तुम्हारे।


गणपति बप्पा आ रे आ रे,

तुझको हरदम, दिल ये पुकारे।

आ रे, आ रे, आ रे, आ रे....


🙏🏻🌹गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया🌹🙏🏻




Monday, 18 September 2023

Article: हरतालिका तीज - सर्वश्रेष्ठ व्रत व सर्वोच्च फल करने वाला

हरतालिका तीज - सर्वश्रेष्ठ व्रत व सर्वोच्च फल प्रदान करने वाला



आज हरितालिका तीज है, महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए, घर में सुख, शांति और समृद्धि के लिए रखती है।

कहा जाता है कि सुहागिनों द्वारा रखे जाने व्रत में यह सबसे कठीन और सर्वोच्च फल प्रदान करने वाला व्रत है। चलिए जानते हैं कि ऐसा क्यों कहा जाता है। और क्यों इस तीज का नाम हरतालिका तीज है।

हरतालिका तीज नाम क्यों

चलिए सबसे पहले यही जानते हैं कि क्‍यों पड़ा हरितालिका नाम? हरित का अर्थ 'हरण' होता है और तालिका का अर्थ 'सखी'।

माता पार्वती, भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थी। यह बात जब पार्वती जी की सखियों को पता चली, तो पार्वती जी का उनकी सखियों ने अपहरण कर लिया था। उन्हें लेकर वो कहीं चली गईं। ऐसे में माता पार्वती ने बालू का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की तपस्या में लीन हो गईं। और बहुत दिनों तक व्रत पूजन इत्यादि किया।

तब से ही इसे सुहागिन महिलाएं मनाती आ रही हैं। दूसरे शब्दों में "हर अर्थात शिव जी" को अपनी सखी पार्वती से अटूट बंधन में बांधने के लिए, पार्वती जी की सखियों द्वारा पार्वती जी का अपहरण होने के कारण इसे हरतालिका कहा जाता है। इसे भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाते हैं। शिव जी को पाने के लिए पार्वती माता ने सालों का कठिन व्रत रखा था। इसलिए व्रत को हरतालिका तीज व्रत के नाम से जाना जाता है। 

सर्वोच्च फल प्रदान करने वाला

हिंदू धर्म अनुयायियों के अनुसार, हरतालिका तीज भगवान शिव और देवी पार्वती के प्रेमपूर्ण बंधन को मनाने के लिए मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए विशेष व्रत रखा था। 

तो सोचिए, जिस व्रत को स्वयं माता पार्वती जी ने भगवान शिव शंभू, को पति रूप में पाने के लिए किया था और महादेव उन्हें पति रूप में मिल भी गये, उससे सर्वोच्च फल कौन सा मिल सकता है... 

इसके बाद किसी को बताने समझाने की जरूरत नहीं है कि क्यों हरतालिका तीज सर्वोच्च फल प्रदान करने वाला सर्वश्रेष्ठ व्रत है।

सबसे कठिन सुहागिनों का व्रत -  इस व्रत में 2½ दिन व्रत रखते हैं।

पहले दिन शाम से ही अन्न व नमक को छोड़ दिया जाता है। उस शाम को मीठा या फीका खाया जाता है। 

दूसरे दिन सुबह नहा-धोकर माता पार्वती व महादेव की पूजा की जाती है। दूसरे दिन की सुबह से ही निर्जला व्रत आरंभ हो जाता है, जो तीसरे दिन की सुबह तक रहता है।

शाम को अलग अलग लोग, अलग अलग भोग प्रसाद तैयार करते हैं। कोई इसके प्रसाद के लिए, गुझिया व भगवान जी के सारे गहने मैदे से बना कर ( चूड़ी, कंगन, पायल, हार व छत्र बनाते हैं) तल कर उसका प्रसाद तैयार करते हैं। वहीं कुछ लोग, ठेकुआ खजुरिया आदि बनाते हैं। तो कुछ लोग फूल मेवा मिठाई आदि का प्रसाद तैयार करते हैं। शाम को  स्त्रियां सोलह श्रृंगार करके, विधि विधान से पूजा करती हैं, कहानी सुनती सुनाती हैं, सुहाग लेती हैं। फिर पूरी रात भजन-पूजन इत्यादि किया जाता है, साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाता है कि दीपक पूरी रात प्रज्वलित रहे।

अगले दिन सूर्य उदय से पहले ही स्नान आदि कर के बाद आटे के हलुआ बना लिया जाता है।

 सूर्य उदय के साथ ही सूर्य देवता को अर्क देकर, आटे के हलुआ का भोग लगाया जाता है। फिर सुहाग लेकर, हलुआ का प्रसाद व जल ग्रहण कर के व्रत का पारण किया जाता है। फिर गुझिया आदि प्रसाद भी खाते हैं।

इस तरह से यह निर्जला व्रत पूर्ण होता है। इसमें दिन रात की आराधना की जाती है। अतः यह व्रत अन्य सुहागिनों वाले व्रत से ज्यादा कठिन है पर सर्वोच्च फलदाई भी है। 

कहते हैं इस व्रत को रखने वाली स्त्री भाग्यवान होती है, उसे अपने पति से बहुत अधिक स्नेह मिलता है, भौतिक व आध्यात्मिक सुख मिलता है। 

जिस भी स्त्री ने यह शुभ व्रत रखा है, उन सभी को दंडवत प्रणाम, हम सभी का व्रत फलीभूत हो।  महादेव और माता पार्वती से जो भी मांगा है,सबको मिल जाएं, अखंड सौभाग्य मिलें। प्रभू कृपा हम सब पर सदैव रहे।  

साथ ही उनके पति से यह अनुरोध है कि वह जरुर से इस बात को समझें कि उनकी पत्नी ने उनके लिए, उनकी लंबी आयु के लिए बहुत कठिन व्रत रखा है, वह अपने पति से बहुत स्नेह करती हैं उनकी फिक्र रहती है। तो आप भी उन्हें बहुत स्नेह दे, ध्यान रखें व उनकी छोटी-बड़ी इच्छाओं को पूर्ण कर दें।

हरतालिका तीज व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 माता पार्वती व महादेव की विशेष कृपा हम सभी व्रत रखने वालों पर, उनके पति पर रहे व उन पर भी रहे जो यह व्रत नहीं रखते हैं 🙏🏻

Friday, 15 September 2023

Memories : वो वक्त कुछ और था

वो वक्त कुछ और था

आज सुबह News देखने के लिए TV on किया तो सीधे news channel ना लगाकर channels बदल-बदल कर news channel तक जा रहे थे।

Channel बदलते-बदलते DD National channel आ गया। हम उसे भी बदलते उससे पहले ही उसमें आया कि आज दूरदर्शन स्थापना दिवस है। 

यह देख कर मन उन दिनों में पहुंच गया, जब सबके घरों में सिर्फ और सिर्फ एक ही channel आता था। DD National.

दूरदर्शन की स्थापना आज के ही दिन (15 September) सन् 1959 में दिल्ली में हुई थी। और 25 April 1982 में coloured TV channel आया था, जिसकी स्थापना मद्रास में की गई थी। आज दूरदर्शन को स्थापित हुए 64 साल पूरे हो गए हैं।

दूरदर्शन एक अकेला ऐसा channel है‌ जो government द्वारा संचालित किया जाता है। 

यही वो सबसे पहला channel है, जिसने black and white से coloured होने तक का सफर तय किया है।

उस समय हर घर में धीरे-धीरे रेडियो से टेलीविजन आने का दौर था।  या कहिए audio के साथ video भी देखे जाने का दौर.. हम लोगों को, घर में रहकर मनोरंजन का मजा कैसे लिया जाए, उसको सिखाने का सारा श्रेय, दूरदर्शन का ही है। 

पर फिर भी सबके घरों में TV नहीं था, इसलिए TV देखने जाना भी अलग ही खुशी देता था। और जिस दिन TV अपने घर आया था, उस दिन की खुशी तो पूछिए ही मत, वैसी खुशी तो आजकल का LED TV आने पर भी नहीं देता है। 

दूरदर्शन एक अकेला channel था, जिसका उस समय एक छत्र राज था। पर क्या नहीं था, जो उसमें ना आता हो, news, हिन्दी व English दोनों भाषाओं में, मूक-बधिर लोगों के लिए भी, कृषि दर्शन, संस्कृतिक कार्यक्रम स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम, फिल्म, हिन्दी, English, प्रादेशिक भाषाओं में, फिल्मी गाने, बहुत सारे zoner के serials, बच्चों से बुजुर्ग तक, पुरुषों से महिलाओं तक सबके लिए ही, वो भी एक से एक बेहतरीन, TV पर आने वाले सभी कार्यक्रम ऐसे होते थे, जिन्हें पूरा परिवार तो क्या पूरा मौहल्ला एक साथ देखता था। 

एक TV, एक channel और remote... Remote तो था ही नहीं, TV का remote तो हम में से ही कोई एक हो जाता था, जिसे TV बंद करना और खोलना होता था, क्योंकि channel बदलने का तो कोई स्यापा ही नहीं था ना... 

उस समय के सभी कार्यक्रमों की दो विशेषता थी, एक तो fix time और दूसरा बहुत ही सुकून के साथ बनाए जाते थे तो उन्हें देखने के लिए time की punctuality and discipline रहना जरूरी होता था, क्योंकि जो program छूट जाता था तो वो फिर एक हफ्ते बाद ही देखने को मिलता था। सुकून से बना था तो उन्हें देखकर  सुकून भी मिलता था। 

उस समय TV देखना मात्र, entertainment or time pass नहीं था, बल्कि pleasure time or family time होता था।

उस समय के एक-एक program classic थे, फिर वो चाहे news हो या serials, रंगोली, चित्रहार, फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, show theme, star trek, कच्ची धूप, रामायण, महाभारत, शक्तिमान, हम लोग, बुनियाद, विक्रम-बेताल, सिंहासन बत्तीसी, नुक्कड़, सुरभि, पोटली बाबा की, ब्योमकेश बख्शी, करमचंद, मालगुडी डेज, चंद्रकांता, सर्कस, फौजी, दादा-दादी की कहानियां, इन जैसे और भी बहुत सारे अच्छे-अच्छे programs.... जिन्हें देखकर हमारा स्वर्णिम बचपन बीता, वो वक्त कुछ और था...

पर जब हम लोग छोटे ही थे, तभी बहुत से private channels जैसे Zee TV, Star Plus, Sony, etc... भी आने शुरू हो गये थे। अब हम किसी भी दिन और किसी भी समय कोई सा भी program देख सकते थे। 

पर इतनी variety और no time boundation के कारण धीरे-धीरे entertainment का वो charm कहीं धूमिल हो गया।

अब घरों में number of Televisions , number of  TV channels थे। सब remote पर अपना control चाहते हैं। नतीजा मोहल्ला तो छोड़ दीजिए, अब परिवार के सभी सदस्य भी एक साथ TV नहीं देखते हैं।

एक पते की बात बताएं, सच्चा सुख साधनों की कमी में ही ज़्यादा होता है क्योंकि कुछ थोड़ी सी कमी, आपसी रिश्तों में नजदीकी ला देती है। क्योंकि जब कम होता है तो सबका ध्यान रखना ज़्यादा होता है कि कहीं कोई वंचित ना रह जाए।

In short साधन कम था, channel एक ही था, पर उसमें सबको सबकी पसंद का और बहुत अच्छा content कैसे दे दिया जाए, रिश्तों को कैसे आपस में समेट लिया जाए, जिसे आता था बस वही था दूरदर्शन... हमारा खूबसूरत बचपन...

दूरदर्शन दिवस पर उसके 64th birthday की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 

आज भी आता है दूरदर्शन, पर अब हम सिर्फ 15 August, 26 January और किसी राष्ट्रीय उपलब्धि में ही उसे देखते हैं, यह जानते हुए भी कि आज भी कहीं-ना-कहीं दूरदर्शन ही है जो संस्कार और संस्कृति देने में सक्षम है, सर्वश्रेष्ठ है.. 

पर क्या कभी हम लौट चलेंगे, अपने देश के पहले channel की तरफ, अपने बचपन की तरफ़... उस वक्त की तरफ जो कुछ और ही था... सुकून, प्रेम और अनुशासन से भरा, साधनों को पाने की अंधी दौड़ में जो शामिल नहीं था..😊