Sunday, 10 February 2019

Poem : बसंतपंचमी का त्योहार


बसंतपंचमी का त्योहार





माँ सरस्वती की कृपा अपार
कृपा से ही, चलता सारा संसार
उनकी वन्दना हेतु, पुष्प लिए
नर-नारी, बच्चे सब हैं तैयार

शिक्षा की देवी हैं माता
गीत संगीत, सब उनसे ही आता
जिस पर नहीं गर, कृपा माँ की
अशिक्षा के तम में, घिर जाता   

आनंद और प्रमोद उन्हीं से
जीवन का हर बोध उन्हीं से
जो विद्या के मंत्र ना जाने
उसके जीवन के क्या माने

विद्या नर को नर बनाए
हर जीव से अलग कराये
शिक्षा ही सबमें, मान दिलाये  
जीवन में, सुख-सम्मान दिलाये

अंजली में पुष्प लिए
पुष्पांजलि, देने को तैयार
माँ की कृपा, बने सभी पर
शुभ हो सबके लिए
बसंतपंचमी का त्योहार

Friday, 8 February 2019

Kids Story : आलस

समस्या : जब बच्चा आलसी हो
आलस

एक चिड़िया थी, उसके दो बच्चे थे, चुनमुन और मुनमुन। चुनमुन बहुत ही आलसी था, जबकि मुनमुन में सब सीखने की इच्छा रहा करती थी, साथ ही वो सब काम बहुत अच्छे से करने की कोशिश भी किया करता था।
जब दोनों बच्चे बड़े हो गए, तो माँ ने उन्हें उड़ना सिखाना शुरू कर दिया। मुनमुन तो ऊंची ऊंची उड़ान भरना  सीख गया। पर चुनमुन अपने आलस में ही पड़ा रहा करता था। नतीजा चुनमुन सिर्फ एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक ही उड़ पता था।
मुनमुन के ऊंची ऊंची उड़ान भरने के कारण, अब वो बहुत अच्छा-अच्छा अपनी पसंद का खाना खाने लगा था। जबकि चुनमुन अभी भी वही खाता था, जो माँ लाती थी।
जब दोनों बच्चे बड़े हो गए, तो माँ ने कहा, अब अपना अपना खाना खुद ढूंढो। ये कह कर माँ उड़ गयी। मुनमुन भी उड़ गया, पर चुनमुन अभी भी उसी डाल पर बैठा रह गया।
माँ और मुनमुन के जाने से चुनमुन भूखा रहने लगा। कभी उसे कुछ मिलता था कभी नहीं, जिससे वो दुबला होता जा रहा था, साथ ही कमजोर भी हो रहा था। उससे वो और ज्यादा आलसी होने लगा। अब तो उसे एक पेड़ से दूसरे तक जाने का भी मन नहीं करता था। वहाँ एक साँप रहता था, उसे चुनमुन के आलस के बारे में पता चल गया। 
तो उसने चुनमुन को खाने का मन बना लिया और वो चुनमुन की तरफ बढ़ने लगा।साँप को देखकर चुनमुन थरथर काँप रहा था। पर वो अपना आलस नहीं छोड़ पा रहा था। तभी वहाँ मुनमुन आ गया। उसने चुनमुन को कहा, भाई आज तो आलस छोड़ दो, नहीं तो ज़िंदगी से हाथ धोना पड़ेगा।
मुनमुन के बार-बार ऐसा कहने से चुनमुन ने अपना आलस छोड़ दिया और वो उसके साथ दूसरे पेड़ तक उड़ गया, जिससे साँप उसे नहीं खा पाया।
मुनमुन ने चुनमुन से कहा, भाई आलस छोड़ के मेरे साथ दूर उड़ चलो, नहीं तो, आज नहीं तो कल तुम्हें ये साँप जरूर से खा जाएगा। आप मेरे साथ थोड़ा-थोड़ा उड़ो, फिर ज्यादा-ज्यादा उड़ेंगे। तो आप भी ऊंची ऊंची उड़ान उड़ लेंगे।
चुनमुन को लगा, मुनमुन सही कह रहा है, आज अगर वो नहीं आता, तो साँप उसे जरूर से खा जाता। आलस से कुछ नहीं मिलेगा।
उसने अपना आलस छोड़ दिया, और कुछ ही दिन में वो भी ऊंची उड़ान भरने लगा। अब वो बहुत खुश रहने लगा। अपनी पसंद का खाना खाता, जहां मन, वहाँ उड़ कर पहुँच जाता। तो उसे सारी दुनिया बहुत अच्छी लगने लगी। उसने मुनमुन को बहुत सारा धन्यवाद दिया, कि तुम नहीं होते तो मैं हमेशा आलस ही करता रहता, और कभी नहीं समझ पाता, कि दुनिया कितनी अच्छी है।  

Thursday, 7 February 2019

Article : भारतीय पद्धति( system) क्यों बेहतर


भारतीय पद्धति(system) क्यों बेहतर

आज के इस article का topic पढ़ कर बहुतों के दिमाग में ये चल रहा होगा, अब आज किस पद्धति को बेहतर कहा जा रहा है, और क्यों?
तो आज मैं आप से उस के विषय में बात करने जा रही हूँ, जिसका अस्तित्व भारत से धीरे धीरे कम होता जा रहा है, जबकि अगर scientifically देखा जाए तो यही पद्धति ही सबसे सही होती है।
यहाँ मैं एक भारतीय पद्धति के विषय के बात कर रही हूँ 
पर कौन सी? आखिर बात किसकी चल रही है?
यहाँ Indian commode की बात कर रहे हैं। आजकल western commode का इतना ज्यादा चलन होता जा रहा है, कि अब हर जगह western commode होने लगे हैं।
पर Indian toilets बेहतर क्यों?
सबसे पहला तो ये है कि Indian toilets use करने में हमारा जो posture होता है, scientifically देखा जाए, तो वही intestine clear करने और stool pass करने का सबसे सही posture है। इससे ही intestine और stomach proper way में function करते हैं।
Indian toilets use करने में ही एक के द्वारा दूसरे को urine(UTI) और intestinal infection होने की संभावना भी कम होती है।
Indian toilets use करने में समय भी कम लगता है, साथ ही उस समय में इंसान सिर्फ stool ही pass करता है, जबकि western में लोग घंटों लगाते हैं, कुछ कुछ तो अपने साथ पढ़ने के लिए paper आदि भी ले जाते हैं। जो कि unhygienic है   
और सबसे बड़ी बात, कि आजकल लोगों में घुटनों की समस्या भी बढ़ती जा रही है, जिसका एक कारण Indian toilets use ना करना भी है।
पहले लोगों में गठिया की problem या तो नहीं होती थी, या काफी उम्र में जाकर होती थी। पर आज कल घुटनों की problem दिन पर दिन बढ़ती जा रही है।  इसका कारण आजकल की life-style ही तो है। पहले की दिनचर्या में हम घुटनों का बहुत ज्यादा प्रयोग करते थे।
दिन के सब से पहले काम में Indian toiletries use करते थे। फिर खेती के काम के लिए कई बार उठते बैठते थे। घरों में ladies चक्की चलाने में, मसाला पीसने में, खाना बनाने में घुटनों में ही बैठा करती थी। उसके बाद भोजन भी लोग ज़मीन में squatting(पालथी मार के बैठकर) ही किया करते थे।
इन सब कामों में ही लोगों का स्वतः ही योग हो जाया करता था। इसलिए उन्हें अलग से exercises करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, और लोग स्वस्थ भी रहते थे।
पर आधुनीकीकरण के कारण अब हम सारे काम या तो खड़े खड़े ही करने लगे हैं, या कुर्सी में बैठ कर करने लगे हैं।  सीढ़ियों का प्रयोग भी कम हो गया है, उसकी जगह भी lift या escalator ने ले ली है। जिससे आराम तो बहुत हो गया है, पर घुटनों व शरीर का band बज गया है।
तो एक काम कीजिये, अपने घरों में western pot के साथ ही एक Indian pot भी अवश्य रहने दें, और उन्हें भी alter net days में जरूर से use कीजिये, और बच्चों को भी जरूर भेजिये।
यकीन मानिए भारतीय पद्धति में होने वाली बहुत सी क्रियाओं को अगर आप देखेंगे तो पाएंगे कि  scientifically वही सबसे सही होगी, सबसे बेहतर होगी।