Wednesday, 8 May 2019

Story Of Life : मजबूरी का सौदा (भाग-2)


अब तक आपने पढ़ा, कांता बहुत गरीब औरत है, जो अपने बीमार बच्चे को डॉ. समीर को दिखाना चाहती है, पर clinic बन्द होने के कारण दुखी है। क्योंकि Sunday को डॉ. घर में देखते हैं, जो बहुत दूर है, तभी वहाँ सरजू रिक्शेवाला आ जाता है...... 

अब आगे.....    

मजबूरी का सौदा (भाग-2) 


तो चलो, हम छोड़ देंगे, सरजू ने अपनेपन से बोला। पर हमारे पास पैसे नहीं है, तुमको देने के लिए, सरजू भैया। सिर्फ 700 रूपया हैं, डॉ. की फीस और दवा के लिए। अरे भौजी, पराया ना करो। बाद में दे देना, और नहीं भी दोगी, तो भी चलेगा। कितना तो तुम सबके काम आती हो, आज जा कर तो हमें मौका मिला है।

सरजू, कांता और मंगलू, डॉ. समीर के घर की ओर बढ़ गए।

डॉ. के घर पहुँचने पर वो डॉ. समीर से मिले।
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वो गौर वर्ण के ऊंचे लंबे कद के थे। उनके चहरे पर आत्मविश्वास का एक अलग ही तेज था। वो शायद इसलिए, क्योंकि उन्होंने अब तक ना जाने कितने मरीज़ों को ठीक किया था। उन्होंने अंदर आने को कहा, आवाज़ में कठोरता का भान था, और साथ ही नियम से बंधे होने का भी पुट था।

कांता अंदर घुसते से ही बोलने लगी, डॉ. बाबू हम बहुत दूर से बड़ी उम्मीद के साथ आए हैं। इतनों को ठीक किया है, मेरे मंगलू को भी ठीक कर दीजिये।

डॉ. समीर बहुत ही रूखे स्वर में बोले, मेरी 1 हज़ार रुपए फीस है।उतने रुपए लाई हो?

हज़ार रुपया..... नहीं डॉ. बाबू मैं गरीब मजबूर औरत हूँ, मेरे पास 
इतने रुपए कहाँ हैं? मैं तो बड़ी मुश्किल से 700 रुपए, आपकी फीस और दवाई के लिए लाई हूँ। आप 500 रुपए ले लीजिये।


डॉ. समीर बोले आज Sunday है, आज मैं हज़ार रुपए ही लेता हूँ।कह कर सामने लगे board को दिखा दिया, जहां लिखा था Sunday 1000, अन्य दिन 500। कल आना तब 500 रुपए ले लूँगा।

कैसी बात कर रहे हैं, डॉ. बाबू, कल तक तो ना जाने मंगलू का 
क्या होगा? आप आज ही देख लो ना।  बहुत मजबूर हूँ मैं, बड़ी दूर से उम्मीद बांध कर आई हूँ, गरीब हूँ, देख लो ना बाबू।

क्या डॉ. समीर कांता की मजबूरी को समझ कर 500 रुपए में मंगलू को देख लेंगे? पढ़ते हैं मजबूरी का सौदा (भाग-3)

Tuesday, 7 May 2019

Poem : अक्षय तृतीया का त्यौहार


अक्षय तृतीया का त्यौहार 





अक्षय तृतीया के
पावन अवसर पर
भरता है, अक्षय भंडार  
जाने ये सारा संसार
स्वर्ण-रजत से भरा रहे
आपका सुख- परिवार
पर साथ कुछ और
चाह भी हम करते हैं
हे विष्णु देव
हे लक्ष्मी माता
क्या स्वर्ण-रजत से ही
आप भंडारे भरते हैं?
जल की एक एक बूँद
को तरस रहा सारा संसार
क्या भर सकता है?
उसका भी अक्षय भण्डार
जब पूजा करना स्वर्ण की
एक पात्र में, रख लेना जल भी
आज तो है, वो पास हमारे
रह सके पास, वो कल भी
हो जाए प्रभु की दृष्टि अपार
भरा रहे जल का भी भण्डार
आप सभी को शुभ रहे
अक्षय-तृतीया का त्यौहार 

Monday, 6 May 2019

Story Of Life : मजबूरी का सौदा


मजबूरी का सौदा


कांता बहुत ही गरीब औरत थी, वो लोगों के घर बर्तन धोने, व साफ-सफाई करने का काम करती थी। उसके दो बेटे थे, पर पैसे की तंगी के कारण अच्छा पोषण व दवा का अक्सर आभाव ही रहता था। अतः आए दिन वो बीमार रहते थे।

एक दिन कांता के बड़े बेटे की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गयी।
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वो इधर- उधर सब जगह इलाज़ करवाती फिर रही थी, पर कहीं भी लाभ नहीं मिल रहा था। तब किसी ने बताया, डॉ. समीर बहुत ही अच्छे doctor हैं, वो जिसको देख लेते हैं, उसे भगवान का आशीर्वाद मिल जाता है। वो फिर यमराज के घर से भी लौट आता है।

डॉ. समीर की ऐसी तारीफ सुनकर कांता उनके clinic भागी चली गयी। जब वो वहाँ पहुंची, तो देखा, डॉ. समीर का clinic बंद है। ये देखकर कांता के मन में अपने बेटे को बचाने की उम्मीद भी जाती रही। वो बेहद थके पाँव से घर लौटने लगी। तभी पीछे से किसी ने कहा, dr. समीर को दिखाने आई थीं?

जी, आप जानते हैं, कहाँ मिलेंगे?

हाँ, आज Sunday है ना। आज वो केवल अपने घर में ही patient देखते हैं।

अपने उम्मीदों को बंधते देख वो बोली, आप मुझे बता देंगे, वो कहाँ रहते हैं?

वो आदमी कांता को रास्ता बता कर चला गया। घर बहुत दूर था, 
और कांता के पास जाने का कोई साधन नहीं था। वो खुद तो जैसे-तैसे चली जाती, पर बीमार बेटे को कैसे ले जाती?

अभी वो इसी उधेड़बुन में थी, कि तभी सरजू अपना रिक्शा ले कर वहाँ से निकल रहा था। कांता को देखते ही बोला, ऐ भौजी, मंगलू को लेकर क्या कर रही हो, डॉ. बाबू के clinic के आगे?

तुमसे क्या छुपा है सरजू भैया, मंगलू बहुत ही बीमार हो गया है, उसी को दिखाने के लिए आए थे, पर आज तो डॉ. बाबू सिर्फ अपने घर में ही देखते हैं। तो कैसे जाएँ? वही सोच रही थी।

क्या सरजू कांता की मजबूरी का सौदा करेगा? या उसको दुख से उबरने में साथ देगा।जानते हैं- मजबूरी का सौदा (भाग 2)