Thursday, 20 August 2020

अनहद नाद( भाग - 4)

 अब तक आप ने पढ़ा, अनहद नाद (भाग-1), अनहद नाद (भाग -2) अनहद नाद (भाग- 3).....

अब आगे........

अनहद नाद (भाग -4)


उन्होंने जवाब दिया- “इसका अर्थ है कि अब मैं कहीं भी रह सकता हूँI कहीं भी सो सकता हूँI सारा जहान मेरा है, 

सिवाय वीरेंद्र की ज़िन्दगी केI”

फिर कुछ देर के लिए ख़ामोशी छा गईI 

मैं उठी और अपने बैग से पानी की बोतल निकालकर अंकल की तरफ़ बढाईI

 उन्होंने पानी का एक घूंट पिया और बोतल को अपने सिराहने रख लिया I जैसे ही मैं उनके सामने बैठी फिर मेरा सवाल-

“अंकल घर तो आपका है न?”

मेरा सवाल अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि उन्होंने बीच में रोकते हुए....

 कुछ पन्नें मेरे सामने रख दिएI मैं एक-एक पन्ना पढ़ती गयी और पलटती गयीI मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल चुके थेI

वो पन्नें चीख-चीख कर कह रहे थे कि ‘अपने लिए जियो पर अपनों के लिए मत जियोI’

धोखे से वीरेंद्र अंकल ने कौशिक अंकल का सब कुछ अपने नाम कर लिया थाI कौशिक अंकल और आंटी से उनकी छत तक भी छीन ली थी, उन्हें इस संसार में अकेला कर दियाI

मेरे मन में यही आ रहा था कि कोई अपना भी इस हद तक नीचता पर उतर सकता है!

मैं अंकल से कुछ कह पाती इतने में चिड़ियों की चहचहाहट ने हमारा ध्यान भंग किया तो मैंने महसूस किया कि भोर हो चली हैI आसपास फिर से ज़िन्दगी की चहल पहल शुरू हो गयीI

अंकल उठे, अंदर गए........

आगे पढ़े अंतिम भाग, अनहद नाद ( भाग -5)


Disclaimer:

इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Wednesday, 19 August 2020

अनहद नाद (भाग -3)

अब तक आप ने पढ़ा, अनहद नाद (भाग-1) और अनहद नाद (भाग -2)......

अब आगे........

अनहद नाद- भाग 3


उनकी बातों और तनाव की गहराइयों को अंदर तक महसूस कर पा रही थीI  वे आगे बोले- “जब मैं ग्यारह वर्ष का था तभी से मैंने अपने घर को सम्भाल लिया था I”

अंकल के चेहरे पर एक संतुष्टि झलक रही थीI  पता चल रहा था कि उन्होंने अपने कर्त्तव्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया हैI अंकल का बोलना जारी था –

“गाँव मे मैं पहला लड़का था जिसकी नौकरी दिल्ली में लगी थीI नौकरी  की बात सुनते ही वीरेंद्र ख़ुशी से बोला- ‘अरे वाह भैया अब तो आप दिल्ली में रहोगेI 

मैं भी आपके साथ चलूँगाI आप जानते हो न मैं आपके बिना नहीं रह सकताI’

मैंने हामी भर दीI मेरे हामी भरते ही उसने पूरे गाँव में शोर मचा दियाI

‘हु हु हु  रे रे रे हुर्र….. मैं भी भैया के साथ शहर जा रहा हूँI’ तब से लेकर आज तक वीरेंद्र मेरे साथ ही हैI  

मैंने हमेशा उसका साथ दियाI हर चीज़ में हमेशा पहले उसको रखाI उसकी हर इच्छा का सम्मान किया। उसकी शादी भी मैंने अपने हाथों से ही कीI 

धीरे-धीरे उसके रवैये में बदलाव तो आ रहा था पर मैंने सोचा कि शायद समय की यही माँग हैI वक़्त के हिसाब से हमें भी बदलना चाहिएI”

मैंने उनको बीच में ही रोकते हुए कहा- “पर अंकल वीरेंद्र अंकल ने आज ऐसा क्या किया जो आपको इतनी निराशा हो रही हैI”

अंकल ने हँसते हुए कहा- “आज उसने मुझे अपने आप से आज़ाद कर दिया I”

“क्या?” मैं भौचक्की सी रह गई I

“आज़ाद कर दिया इसका क्या अर्थ है?” मैंने तपाक से पूछा......

आगे पढ़े, अनहद नाद (भाग - 4)....


Disclaimer:

इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।

Tuesday, 18 August 2020

अनहद नाद (भाग -2)

अब तक आप ने पढ़ा,

अनहद नाद (भाग-1)......

अब आगे........

अनहद नाद (भाग-2)



उनकी आवाज़  में कम्पन थाI इतना बोल कर वे फिर शांत हो गएI ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों वहाँ होकर भी वहाँ नहीं हैंI  कुछ देर बाद मैंने पूछा-

“आप कहना क्या चाहते हैं? आपके पास तो अपने इस सवाल का जवाब हमेशा रहता हैI


आप ही तो कहते हैं कि अगर दुनिया मे रिश्ते ही न हों तो अपनेपन का वजूद ही नहीं रहेगाI”

उन्होंने अपने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा- “आज मुझे अपनी कही बात ही सही नहीं लग रही या ये बात  मेरे ऊपर लागू ही नहीं होती I”

उनकी आँखों के आंसू बंद ही नहीं हो रहे थेI बार-बार उनके मुँह से बस यही शब्द निकल रहे थे कि

“तुम हमेशा अपने लिए ही जीना, पर कभी अपनों के लिए मत जीना I”

उनकी इस बात से यह तो साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि इन्हें किसी अपने ने अंदर तक तोड़  दिया है I उन्होंने लम्बी साँस लेते हुए अपनी पलकों को बंद किया और कमर को पीछे ले जाकर शांतचित्त बैठ गएI

मैं उनकी तरफ़ टकटकी लगाकर लगातार देखे जा रही थीI शायद मुझे आगे जानने की जिज्ञासा थी इसलिए उनके बोलने का इंतज़ार कर रही थीI

चारों तरफ़ कोई आवाज़ नहीं थी I अंकल ने गहरी साँस लेते हुए अपनी बात कहनी शुरू की – “तुम वीरेंद्र को को तो जानती  हो न?”

“जी जानती हूँ I वो तो आपके छोटे भाई हैंI” मैंने उनके सवाल का जवाब दिया I

अपनी बात पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा- “ठीक कहा, वो मेरा छोटा भाई ही है पर आज लग रहा है कि मैं उसे जानता ही नहींI”

“पर आप ऐसा क्यों कह रहें हैं? आख़िर बात क्या है?” मैंने पूछा…

उन्होंने कहना शुरू किया- “वीरेंद्र, मैं और मुन्नी हम दो भाई एक बहन हैं I हम अपनी माँ को चाची कहते हैं और पिताजी को पिताजीI हमारा बचपन कुछ अच्छा नहीं थाI

पिताजी के पास छोटा सा ही खेत थाI  वो ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं थे I चाची बिलकुल अनपढ़ थी और घर के नाम पर बस एक छप्पर डाली हुई थी......

मैं घर में सबसे बढ़ा हूँI  मैंने अपने माता पिता के कष्टदायक दिन देखे हैंI  इसलिए कभी नहीं चाहा कि उन कष्टों की छाया भी वीरेंद्र और मुन्नी पर पड़ेI”

वो कहते जा रहे थे और मैं एकाग्र होकर सुनती जा रही थीI 

आगे पढ़े, अनहद नाद (भाग - 3) में....


Disclaimer:

इस पोस्ट में व्यक्त की गई राय लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। जरूरी नहीं कि वे विचार या राय इस blog (Shades of Life) के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखक की हैं और यह blog उसके लिए कोई दायित्व या जिम्मेदारी नहीं रखता है।