Friday, 6 September 2019

Story Of Life : खुशियों की गाड़ी


खुशियों की गाड़ी


पुनिया मेरे घर काम करती थी, उसका पति रिक्शा चलाता था।काम में तो पुनिया बहुत होशियार थी, ईमानदार भी थी। बस उसमें कमी थी तो एक ये ही कि, वो आए दिन पैसे मांगा करती थी।

गरीब समझ कर मैं भी दे दिया करती थी, पर कभी कभी गुस्सा भी हो जाया करती, पुनिया कभी तो महीना पूरा हो जाने दिया कर। 

पर उसका हमेशा एक ही जवाब होता, मेमसाहब मेरा मर्द रिक्सा चलाता है। तो एक सी कमाई नहीं होती है, फिर घर चलाने के लिए पैसा तो चाहिए ही।

अरे तो बोला कर ना, कि और ज्यादा चक्कर लगाया करे।  

मेमसाहब, बहुत मेहनत लगती है, रिक्सा चलाने में। मेरा मर्द तो बहुत ही चक्कर लगाता है, पर सवारी ही ज्यादा पैसा नहीं देती है। ऊपर से रिक्सा से पहुँचने में टेम भी लगता है, तो बहुत से लोग जाना भी नहीं चाहते।

एक दिन तो पुनिया ने हद ही कर दी, बोली मेमसाहब 10 हज़ार रुपए उधार दे दो।

क्या कहा, दस हज़ार! समझ भी रही है, क्या बोल रही है तू?

हाँ मेमसाहब, दे दो ना, सारी ज़िंदगी तुम्हारी गुलामी करूंगी।अबकी जो देंगी, फिर कभी उधार नहीं लूँगी।

अरे! तेरी तो इतनी तनख्वा भी नहीं है। फिर दस हज़ार कम होते हैं क्या?

मेमसाहब, पूरे पाँच महीने बिन पैसे के काम कर दूँगी। दे दो ना, मैं अपनी पायल, बाली सब आप के पास रख दूँगी।

अरे तो, सुनार के पास जा ना।

नहीं है, किसी और पर विश्वास, मेरे लिए सिर्फ आप हैं।

उसकी ऐसी बात सुनकर मैंने बिना पायल, बाली रखे उसे, दस हज़ार दे दिये।

अगले दिन जब पुनिया आई, तो उसके चहरे की रंगत ही अलग थी। बोली मेमसाहब मेरे मर्द ने गाड़ी ले ली है। कल मुझे भी घुमाया उसमें, बहुत मज़ा आ गया। मेमसाहब आप बहुत अच्छी हैं, सब आपके कारण हो सका।

छोटे बाबा आप मेरे मर्द की गाड़ी में घूमोगे? वो मेरे बेटे की तरफ मुखतिब होते हुए बोली। मेरा बेटे को घूमना बहुत पसंद है, उसने झट से हाँ कर दिया।

वो मुझसे बहुत चहकते हुए बोली, मेमसाहब चलो ना नीचे मेरा मर्द खड़ा है, एक चक्कर छोटे बाबा को घूमा देगा।

बेटे और उसकी इतनी इच्छा देखकर मैं चल दी।

नीचे उसका पति अपने सजे हुए सुन्दर से रिक्शे के साथ खड़ा था। मैं चौंक गयी, ये तो रिक्शा ही है! अरे मेमसाहब आपके लिए रिक्सा होगा, हम लोगों की तो गाड़ी ही है, कहकर उसने मेरे बेटे को रिक्शे में बैठा दिया।

मैं वहीं खड़ी उनके लौटने का इंतज़ार कर रही थी। 

थोड़ी देर बाद वो लोग लौट आए, बेटे के चहरे पर कार में बैठने से ज्यादा खुशी अभी दिख रही थी। क्योंकि कार में तो वो रोज़ बैठता था, रिक्शा उसके लिए नया था।

पुनिया बोली, देखा ना मेमसाहब हम कितनी जल्दी लौट आये। मेरे मर्द की गाड़ी सर्र से दौड़ जाती है। पुनिया की खनकती हुई आवाज़ ही उसकी ख़ुशी बयां कर रही थी। उसके पति ने रिक्शे में मशीन लगवा ली थी। फिर सोचा सच ही तो बोल रही है पुनिया, उसके लिए तो गाड़ी ही है।

अब पुनिया का पति अधिक दूरी तक भी रिक्शा चला रहा था, और सवारी से भी अधिक पैसे मिल रहे थे, तो पुनिया ने दो महीने में ही दस हज़ार वापिस लौटा दिये।

सच खुशियाँ छोटी छोटी बातों से भी मिल जाती है। आज मैं भी खुश हूँ, कि मैंने उस दिन उसे दस हज़ार रुपये दे दिये थे। 

उसके बाद कभी उसे उधार मांगने की जरूरत नहीं पड़ी, और उसके चहरे पर हमेशा सुकून की खुशी भी थी। 

क्योंकि उसके मर्द की गाड़ी जो आ गयी थी, या शायद उसकी खुशियों की गाड़ी।

Thursday, 5 September 2019

Poem : गुरु और शिष्य


शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर सभी गुरुओं को मेरा शत शत नमन 

गुरु और शिष्य



गुरु और शिष्य का,
कैसा पावन नाता है। 
ना जुड़ा रक्त से, ना बंधन से ,
फिर भी जन्मों सा जुड़ जाता है॥

गुरु सारे अवगुण, दूर कर,
हमारे गुणों को चमकाता है।
कभी माँ बन प्यार लुटाता है,
कभी पिता सा सीधी राह दिखाता है॥

हो सरल मार्ग, या कठिन डगर
जीवन जीना सिखलाता है। 
असफलता से सफलता तक,
गुरु हमको ले जाता है॥

हम क्यों आए, इस दुनिया में
ये गुरु हमे बताता है।
जीवन को जीने लायक, 
गुरु ही बनवाता है॥

गुरु और शिष्य का,
कैसा पावन नाता है। 
ना जुड़ा रक्त से, ना बंधन से,
फिर भी जन्मों सा जुड़ जाता है॥


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Wednesday, 4 September 2019

Article : Tremendous Traffic Rules


Tremendous Traffic Rules

कल शाम bike से पति के साथ बाज़ार जाना हुआ, तो दिल्ली में अलग ही नज़ारा दिखाई दिया। हर two wheeler वाला helmet लगाए हुए था, आश्चर्य तो मुझे तब हुआ, जब सारे पीछे बैठे वाले भी helmet लगाए हुए थे।

हम दोनों हमेशा ही helmet पहन कर जाते हैं, पर कल से पहले कितने ही बगल से अपनी जुल्फें लहराते निकल जाते थे।

जो car में थे, सब seat belt लगाए हुए थे, कोई भी mobile पर बात नहीं कर रहा था।

कोई भी traffic light jump नहीं कर रहा था, ना कोई आड़ा-तिरछा चला रहा था, फुटपाथ पर केवल पैदल लोग ही चल रहे थे।

ऐसा नज़ारा देखकर लग रहा था, अगर ऐसा ही चलता रहा, तो जल्दी ही traffic jam की problem solve हो जाएगी। accidents काफी हद तक कम हो जायेंगे। फिर तो India आने वाले लोग पूछेंगे, ये India ही है क्या?

पर कल का नज़ारा देखकर जितनी खुशी हुई, उतना ही दुख भी हुआ। लोगों को अपनी सुरक्षा की परवाह नहीं थी, उनमें बस डर था तो चालान कटने का।

क्यों है आपको उस धनराशि की अधिक परवाह, जो चालान कट जाने पर चली जाएगी? जबकि गया हुआ धन तो आप मेहनत करके पुनः भी प्राप्त कर सकते हैं।

पर आप ने कभी सोचा है, दुर्घटना होने से शारीरिक क्षति या जीवन अंत हो जाए, तो फिर आप धरती आसमान एक कर लें, यथावत नहीं मिल सकता है।

तो जो हम वापस पा सकते हैं, उसकी इतनी परवाह, और अपनी सुरक्षा की बिल्कुल नहीं!  आखिर क्यों?

आपको ईश्वर का धन्यवाद देना चाहिए, कि उन्होंने आपको मानसिक और शारीरिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ बनाया है। उनसे पूछिये, उन पर क्या बीतती है, जो या तो जन्म से या दुर्घटना ग्रस्त होकर अपने अंगों से या अपनों से वंचित हो गए?

आप traffic rules ना मानने पर fine देख रहें हैं, और हमें सरकार द्वारा हम लोगों की सुरक्षा में लिया हुआ कदम दिख रहा है।

तो ज्यादा अच्छा ये नहीं होगा, बढ़े हुए चालान पर रोष व्यक्त करने के बजाय, सरकार का धन्यवाद दें, और साथ ही हम अपनी सुरक्षा पर ध्यान दें।

क्योंकि जान है, तो जहान है। चालान कटने के डर से नहीं, अपनी सुरक्षा के लिए और अपने अपनों के लिए, traffic rules follow करें। फिर आप भी कहेंगे what "Tremendous Traffic Rules"