Wednesday, 21 October 2026

India's Heritage : Sindoor Khela

(I) Navratri Ending :

कल नवरात्रि पर्व का समापन विजयादशमी पर्व के हर्षोल्लास के साथ हो गया। पर क्या सब जगह हो गया?

नहीं। पर कहाँ रह गया था? पश्चिमी बंगाल और बंगाली समाज में आज विजयादशमी पर्व था।

उनका विजयादशमी पर्व को लेकर अलग cultural recognition है।

विजयादशमी पर्व पर विशेष रूप से सिंदूर खेला किया जाता है।

क्या होता है सिंदूर खेला?

दुर्गा माता के आगमन का बंगाली समाज में क्या पर्याय है? आज इसी को India's Heritage segment में share कर रहे हैं…

सिंदूर खेला


(II) The Ritual :

सिंदूर खेला West Bengal और Bengali community में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन (विजयादशमी) को मूर्ति विसर्जन से ठीक पहले मनाई जाने वाली एक प्रमुख और पारंपरिक रस्म है।

इसका शाब्दिक अर्थ है ‘सिंदूर का खेल’।

इस रस्म से जुड़ी कुछ मुख्य बातें और परम्पराएँ हैं, आइए जानते हैं कि वो क्या हैं?


(III) Major Details :

  • Farewell of Maa Durga- ऐसा माना जाता है कि दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा अपने मायके (पृथ्वी) आती हैं, उनके भव्य स्वागत के लिए जगह-जगह पूजा-पंडाल तैयार किए जाते हैं। षष्ठी से लेकर विजयादशमी पर्व तक रोज पंडाल में माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है, खिचड़ी, पूड़ी-सब्जी इत्यादि का दोपहर में भोग प्रसाद खाया जाता है। शाम से रात तक विभिन्न भव्य और cultural programmes होते हैं। रात में खाना मुख्यतः विभिन्न पंडालों में दुर्गा माता के दर्शन के दौरान बाहर ही खाया जाता है। और विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा को मायके से ससुराल (कैलाश) लौटने से पहले विदा किया जाता है।
  • Debi Boron- Immersion से पहले महिलाएँ माँ दुर्गा की आरती करती हैं, पान के पत्ते से माँ के मुखमंडल को स्पर्श करती हैं तथा उनके माथे व चरणों में सिंदूर व मिठाई अर्पित करती हैं। इस अनुष्ठान को ‘देबी बोरोन’ कहा जाता है।
  • Applying Sindoor- माँ को सिंदूर चढ़ाने के बाद महिलाएँ आपस में एक-दूसरे के माथे, गालों और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं। जो ऐसा प्रतीत होता है, मानो सिंदूर से “होली” के समान खेला जा रहा है।
  • Traditional Outfits- बंगाली समाज में red border वाली सफेद saree को विशेष मान्यता प्राप्त है। और हर शुभ अवसर जैसे दुर्गा पूजा, विवाह, पूजा-पाठ इत्यादि में इसे पहना जाता है। दुर्गा पूजा वहाँ का सबसे बड़ा त्यौहार व उत्सव है।
  • इस उत्सव में महिलाएँ आमतौर पर लाल border वाली सफेद साड़ी (‘लाल पाड़ साड़ी’) और हाथों में शंख और लाल चूड़ियाँ (‘शंखा-पोला’) पहनती हैं।
  • Dhol & Dance- जैसे Punjab में ढोल, वैसे ही Bengal में ढाकी को विशेष स्थान दिया गया है। और हर शुभ अवसर पर ढाकी वाले को बुलाया जाता है। अतः षष्ठी में मातारानी की मूर्ति की स्थापना के साथ ही ढाकी वाले आ जाते हैं और विजयादशमी पर्व पर मूर्ति विसर्जन तक रहते हैं। इस रस्म के दौरान पारंपरिक ढाकी (ढोल) की थाप, शंखनाद और उल्लास का माहौल होता है।
  • Importance- यह रस्म महिलाओं द्वारा एक-दूसरे के सुहाग की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख और समृद्धि की कामना के लिए मनाई जाती है।

बोलो दुग्गा माई के जोय!