Wednesday, 5 September 2018

Poem : Teacher - An artisan

On the auspicious occasion of Teacher's Day, my daughter Advika has created a poem for  a great person in  everyone's life, a TEACHER.


Teacher - An artisan

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.

A Potter makes pots
Out of mud and clay.
A teacher moulds learning
In students, the same way.

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.

A baker decorates a cake
Out of cream.
A teacher enables students
To achieve their dreams.

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.

A fashion designer
Designs a beautiful dress.
A teacher teaches
So that students get success.

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.

An architect makes buildings with bricks
So that they don't fall.
A teacher teaches students
How to walk and not to crawl.

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.

A watchmaker makes watches
So that you can be on time.
A teacher is the one who
Teaches to stand by bad time.

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.

A carpenter carves out wood
That makes it useful.
A teacher teaches students
Which makes their lives beautiful.

Teacher or an artisan
Both are the same.
What all is different is
Just there name.
Advika Sahai  

Tuesday, 4 September 2018

Story Of Life : जीवनसंगिनी (भाग -३)

अब तक आपने पढ़ा, पिया और रतन का विवाह हो जाता है, पिया को अपना मनचाहा ससुराल मिला। पर आये दिन रतन की job छूट जाने से सब की ज़िन्दगी में तनाव आ गया था, पर पिया ने हार नहीं मानी। अब आगे......   

जीवनसंगिनी (भाग -३) 

हम लोगों का परिवार teacher का परिवार है तो business भी सोने-चाँदी का नहीं, अध्ययन से जुड़ी चीजों का ही होगा।
जिसका अनुभव, तुम्हें, मुझे और पिता जी को भी है। तुम्हारे business के लिए हम दोनों customer लायेगें, पिता जी की जान पहचान भी हमारी मदद करेगी, बस तुम्हें जम के मेहनत करनी होगी, जिसमे तुम माहिर हो। और जहां तक रही पैसों की बात, मेरे पिता जी सस्ते में ब्याज पर पैसे दिलवा देंगे। जिन्हें हम चुकाएंगे। और हाँ पैसा भी अपनी जमा-पूंजी से कम लेंगे। जिससे घाटा होने पर हम उसे चुका भी पाएँ ।
पिया अपने मायके से मदद मांग कर, या सोने-चाँदी की दुकान खुलवा कर रतन को हमेशा के लिए उन पर निर्भर होता नहीं देखना चाहती थी।जब सब, यहाँ तक की रतन भी निराश हो चुका था, तब केवल वही थी, जिसे विश्वास था, कि रतन एक न एक दिन सब के सामने अपने-आप को prove कर देगा।
रतन और पिया बहुत से schools, colleges, और shops में गए, जिससे उन्हें पता चला कि उन्हें business के लिए क्या समान चाहिए, और कहाँ से माल उठाना होगा।
दोनों अपना business खड़ा करने में जुट गए। पिया सुबह कॉलेज निकल जाती, और घर आते ही business के लिए रतन का हाथ बंटाती। कभी रतन कमजोर पड़ता तो, वो उसमें दुगना उत्साह भरने में लग जाती।
दिन रात की मेहनत रंग लाने लगी। रतन का business चल निकला, अब रतन में भी जोश बढ़ने लगा था। उन लोगो ने अपने business का विस्तार करना शुरू कर दिया था। अब रतन को पिया की मदद की आवश्यकता पड़नी बंद हो गयी, वो अब सारे काम बखूबी करने लगा।
सब जगह रतन के चर्चे होने लगे। पर रतन ये अच्छे से जानता था, और उसे इसे स्वीकारने में कोई झिझक नहीं थी कि ये सब संभव हो सका है, तो केवल उसकी जीवनसंगिनी की वजह से, उसके विश्वास और सहयोग ने ही उसे ये मुकाम दिलाया था। 

Monday, 3 September 2018

Kids Story : विश्वास. (Devotional)


विश्वास


नन्हा सोनू अपनी माँ का लाडला एकलौता बेटा था। पिता के नहीं रहने से उसकी माँ, उसका व अपना गुजर-बसर लोगों के घर बर्तन धोकर किया करती थी। सोनू बड़ा ही होनहार व अपनी माँ का आज्ञाकारी बेटा था।
पिता के नहीं रहने के बाद से सोनू ने अपनी माँ से कभी किसी चीज़ की demand नहीं की। पर उसकी माँ जानती थी, कि उसके बेटे को पढ़ने का बहुत शौक है। अतः जैसे-तैसे पैसे जोड़ के वो अपने बेटे को पढ़ने भेजा करती थी। सोनू भी बहुत मन लगा के पढ़ाई करता था।
वहाँ साहूकार का बेटा रजत भी पढ़ता था। वो पढ़ने में एकदम zero था। सोनू पढ़ने में होनहार था, इसलिए वो सोनू से बहुत चिढ़ता था। आए दिन वो ऐसी हरकतें करता, जिससे सोनू को नीचा देखना पड़े। सोनू भी क्रोध का घूंट पी के रह जाता, क्योंकि उसकी माँ रजत के घर भी काम करती थी। और रजत की माँ बड़ी भली स्त्री थी, वो आए दिन सोनू की माँ की मदद किया करती थी। अतः सोनू अपनी माँ को भी स्कूल की बात नहीं बताता था। पर वो अंदर ही अंदर बहुत ही दुखी था। सोनू की माँ भाँप गयीं कि सोनू को कुछ बात सता रही है, जो वो उसे नहीं बता रहा है।
सोनू की माँ ने उससे कहा, बेटा जो तू मुझे नहीं बता पा रहा है, तू वहाँ कान्हा जी का जो मंदिर है ना। वहाँ जा कर अपनी बात कान्हा से बोल देना, वो तेरी सारी बातें सुनेगें भी, और तेरी सारी परेशानी दूर भी कर देंगे।
सोनू ने अब से बड़े विश्वास से कान्हा जी से सारी बातें बतानी शुरू कर दी। एक दिन सोनू स्कूल जा रहा था, तो उसे एक लड़का मिला, वो बड़ी मीठी धुन में बांसुरी बजा रहा था। सोनू उसके पास गया, और वहीं बैठ गया। जब उसने बांसुरी बजाना बंद किया तो, सोनू ने पूछा, तुम्हारा नाम क्या है?
वो लड़का बोला, कान्हा! सोनू सुन के हँसने लगा, बोला कान्हा! वो मंदिर वाले? हाँ!
वाह जी वाह, तब तो अब मंदिर जाने की जरूरत ही नहीं है। तुम मेरे दोस्त बनोगे? कान्हा बोले, हाँ बिलकुल, मैं तो तुम्हारा बहुत दिन पहले से दोस्त हूँ, जब से तुम अपनी माँ के कहने से मुझे सब बात बताते थे तबसे।
अब तुम किसी बात की चिंता मत करो, अब कोई तुम्हें कभी परेशान नहीं करेगा। बस तुम्हें एक बात का ध्यान रखना, चाहे जो भी हो, मुझ पर हमेशा विश्वास रखना।
सोनू अब बहुत खुश रहने लगा था, कि उसके पास एक ऐसा दोस्त है, जिसे वो अपने मन की सारी बात बता सकता था।
सोनू को खुश देखकर, रजत को बड़ी चिढ़न होती, उसने principal जी से कहा, जन्माष्टमी आ रही है। स्कूल में खीर बननी चाहिए। तो क्यों ना सब के घर से दूध मँगवा कर स्कूल में उत्सव मनाया जाए। principal जी को बात जँच गयी।
स्कूल में घोषणा कर दी गयी, सबको जन्माष्टमी में दूध लाना है, जो जितना ज्यादा दूध लाएगा, उसे उतनी ज्यादा खीर मिलेगी, और जो नहीं लाएगा, उसे खीर नहीं मिलेगी।
सोनू बहुत परेशान था, माँ के पास तो पैसा है नहीं, दूध कैसे लाएगी। उसे खीर बहुत पसंद थी। तभी उसे ख़्याल आया, क्यों ना कान्हा से मांगा जाए। बहुत संकोच करके उसने स्कूल जाने से पहले कान्हा से दूध मांगा, तो वो बोला, सोनू बड़ी देर कर दी आने में, अब तो सिर्फ इतना ही बचा है, कहकर एक बहुत ही छोटा दूध से भरा हुआ लोटा दे दिया।
सोनू पहले तो मायूस हुआ, फिर बोला मेरे लिए इतना भी काफी है। और बड़े विश्वास के साथ लोटा ले कर चल दिया। जब स्कूल पहुंचा, वहाँ सारे बच्चे बहुत बड़े बड़े बर्तन में दूध लाये थे। उसका छोटा सा लोटा देखकर रजत बहुत ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। उसे हँसता देखकर सारे बच्चे भी हंसने लगे। पर वो पूरे विश्वास से खड़ा रहा कि, कान्हा ने दिया है दूध, तो कम नहीं है। सबका दूध बहुत बड़े से बर्तन में डाला जा रहा था, अभी तक बर्तन आधा भी नहीं भरा था। जब सोनू की बारी आई, तो टीचर जी भी चिल्ला दिये, क्या सोनू मज़ाक कर रहा है क्या? इतना सा दूध देकर खीर खाना चाहता है, चल भाग यहाँ से। सोनू ने जाते जाते, अपने लोटे का दूध बर्तन में डाल दिया। उसके दूध डालते ही ना केवल बर्तन भर गया, बल्कि दूध बहुत तेज़ी से बहने भी लगा।
आपाधापी में और बर्तन लाये गए, स्कूल में जितने भी बर्तन थे, सब भर गए, पर दूध अभी भी बह रहा था।
सब हैरान थे। टीचर जी सोनू से पूछने लगे, कहाँ से दूध लाये हो, जो बढ़ता ही जा रहा है, उसने कहा, अपने दोस्त   कान्हा से।
सब बोले हमें भी कान्हा से मिलना है, सोनू सब को ले गया, पर वहाँ कान्हा नहीं मिले। जब सब चले गए, तब कान्हा आये। सोनू गुस्सा हो गया, तब क्यों नहीं आए थे? कान्हा बोले- क्योंकि मैं विश्वास करने वालों को ही दिखता हूँ, परीक्षा लेने वालों को नहीं।
सोनू भी स्कूल चला गया, बहुत ज्यादा खीर बनी थी, पूरे गाँव में बाँट दी गयी। अब सोनू को कोई परेशान नहीं करता था, सब जान चुके थे, सोनू के साथ कान्हा रहते हैं। पर ये केवल सोनू जानता था, कि जिस-जिस को भी कान्हा पर विश्वास है, कान्हा उन सब के साथ रहते हैं। उन्हें अपने साथ रखना है, तो ये विश्वास रखना होगा, कि जब वो साथ में हैं, तब कुछ कम नहीं पड़ेगा, कभी कुछ बुरा नहीं होगा।

क्या आपको है, इतना विश्वास !

बोलो बाँके बिहारी लाल की जय,  बोलो गिरिधर गोपाल की जय

नन्द के आनन्द भयो, जय कन्हैया लाल की

हाथी- घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की